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महाशिवरात्रि: शिव एक अद्भुत कविता हैं, उन्हें पत्थर समझ कर मत देखिए

आधुनिक भौतिकी ने इस बात का ख़ुलासा किया है कि हर एक "सबएटॉमिक पार्टिकल" न केवल एक "एनर्जी डांस" करता है

Puneet Sharma Updated On: Feb 13, 2018 07:10 PM IST

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महाशिवरात्रि: शिव एक अद्भुत कविता हैं, उन्हें पत्थर समझ कर मत देखिए

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले,गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्.

डमड्डमड्ड्मड्ड्मन्निनादवड्ड्मर्वयं,चकार चण्डताण्डवं तनोतु न: शिव:शिवम्॥

ये है शिव तांडव स्त्रोत, जिसका रचयिता रावण को बताया जाता है. असली क्रेडिट किसका है, ये कौन जाने. ख़ैर! बचपन में यही स्त्रोत था, जिसे पढ़-पढ़ के मुझे शब्दों में छुपे संगीत का ज्ञान हुआ था. फिर इसी तरह के स्त्रोत लिख-लिख के मुझे गीत लिखना आया. सोलह पदों का यह पूरा स्त्रोत अपने आप में काव्यात्मक और संगीतमय दोनों है. नाटक के शुरूआती दिनों में, नाट्यशास्त्र का एक मंत्र सिखाया जाता है.

अई उण रल ऋक एओड एैऔच् हयवरट लनम

एमद्दड नम झबइ घडदश जबघड़-डःस 

खफ छठथा चटतव कपय ष-श-स-र हलः

ये मंत्र ध्वनियों का जादू समझाते हैं. जिन्हें नाट्य शास्त्र में, शिव के डमरू से निकली प्रथम ध्वनि कहा जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार इस ध्वनि से सारे शब्दों का जन्म हुआ था. इसका अगर आप सही तरह से उच्चारण कर सकें, तो आप एक ही मंत्र में संस्कृत दोनों के सभी वर्णों का उच्चारण कर लेते हैं.

कई लोग इस लेख से चकित हो सकते हैं लेकिन उससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता. आस्तिक और धार्मिक लोगों को शिव अलग तरह से आकर्षित करते हैं, लेकिन शिव इससे इतर भी हमेशा ही एक किरदार के रूप में बहुतों को आकर्षित किया है. यदि शिव को देव नहीं, केवल एक किरदार भी मानें. तो वो किसी आदिवासी सभ्यता से उठाया गया किरदार लगते है. औघड़, आदिवासी और अर्धनरनारीश्वर जैसे रूपकों से लबरेज़, इससे ज़्यादा जीवंत प्रमुख देवता किसी और धर्म के साहित्य में नहीं मिलता.

शिव को शायद इसीलिए प्राचीन भी कहा गया है. यानि जो पहले से मौजूद था और उसकी उत्पत्ति इतनी पुरानी है कि उसका किसी को भी सही ज्ञान नहीं है. वेदों में शिव को लेकर जितनी भी मीमांसाएं हुई हैं, वो सब कम जान पड़ती हैं. इसका कारण यह भी है कि वेद सिर्फ संस्कृत में उपलब्ध रहे और संस्कृत को अपने लोभ के लिए इस्तेमाल करके पंडितों ने उसका सर्वनाश कर दिया. उसे आमजन की भाषा नहीं बनने दिया. जब किसी शंबुक से उसे साधना चाहा, मर्यादा पुरुषोत्तम टाइप के लोगों ने उसकी हत्या कर दी. यही कारण रहा है कि मैं हर तरह के शुद्धतावादी लोगों को दूर से नमस्कार करके निकल जाना चाहता हूँ. हर शुद्धतावादी आख़िर में भाषा, कला, संस्कृति और विचारधारा को सिर्फ़ नुकसान ही पहुंचाता है. शिव का किरदार, मुझे शुद्धता से काफ़ी दूर लगता है और इसलिए पसंद भी आता है. हर पौराणिक किरदार की तरह उसकी भी काफ़ी कमियां और गलतियां हैं लेकिन शिव का किरदार किन्हीं मर्यादा पुरषोत्तमों की तरह उसे ख़ुद पर से झाड़ता नहीं है.

भक्तों से परेशान भंडारी

यही कारण है कि वैष्णवों को शिव से कभी लगाव नहीं रहा और जब पूरा हिंदू धर्म ही वैष्णव सम्प्रदाय के हाथों में चला गया, तो उन्होंने शिव को भी अपने ही रूप में रंगना चाहा. लिंग और योनि के प्रतीक शिवलिंग के जैसा कोई दूसरा रूपक किसी भी धर्म में नहीं है इसलिए शिव का रूपक प्रचलित धर्म की रेखाओं के भीतर समाता नहीं हैं. उसे हर बार किसी दूसरे रूपक से ढकने की कोशिश की जाती रही है, मगर शिव अपने मूल रूप में ही इतने अराजक हैं कि उन पर चढ़ने वाले चोले ख़ुद-ब-ख़ुद फिसलते चले जाते हैं. फिर भी अर्धनरनारीश्वर के रूप में यह शिव की एक हार तो है कि उनके सबसे ज़्यादा भक्तों ने, अपने भीतर की नारी को लगभग ख़त्म ही कर दिया है.

क्वांटम फिज़िक्स और शिव

आख़िरी बार शिव के रूपक का सही इस्तेमाल मैंने ब्रम्हांड की उत्पत्ति को जानने के लिए बने "लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर" पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री में देखा था. दरअसल यूरोपियन आर्गेनाईजेशन ऑफ न्यूक्लियर रिसर्च (CERN) के सामने, शिव की नटराज की मुद्रा में तांडव करती हुई प्रतिमा लगी है. जिसे CERN ने "कॉस्मिक डांस" कहा है यानि खगोलीय नृत्य. धार्मिक लोग बड़े नीरस होते हैं, घर में मूर्तियां रख लेते हैं लेकिन उसके रूपक को नहीं समझना चाहते.

भौतिक विज्ञानी फ्रिट्जॉफ कैपरा ने अपनी किताब "ताओ ऑफ फिजिक्स" में समझाया है: "शिव का नृत्य सभी अस्तित्वों के आधार का प्रतीक है. इसी समय, शिव हमें याद दिलाता है कि दुनिया के बहुस्तरीय प्रकार मौलिक नहीं, बल्कि केवल भ्रामक हैं और हमेशा बदलते रहते हैं. आधुनिक भौतिकी ने दिखाया है कि सृजन और विनाश की जो लय है, वो सिर्फ़ ऋतुओं के बदलने और प्राणियों के जन्म और मृत्यु को ही व्यक्त नहीं करती, बल्कि वह सभी अजैविक पदार्थों का सार भी है. क्वांटम फ़ील्ड थिअरी के अनुसार, निर्माण और विनाश का नृत्य पदार्थों के अस्तित्व का आधार है. आधुनिक भौतिकी ने इस बात का ख़ुलासा किया है कि हर एक "सबएटॉमिक पार्टिकल" न केवल एक "एनर्जी डांस" करता है, बल्कि वह स्वयं एक "एनर्जी डांस" भी है; सृजन और विनाश का एक धड़कती हुई प्रक्रिया. आधुनिक भौतिकविदों के लिए, शिव का नृत्य सबएटॉमिक पार्टिकल्स का नृत्य है, वह हर एक अस्तित्व और सभी प्राकृतिक घटनाओं का आधार है."

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दिक्कत यह है कि यह सब शिव की एक रूपक के रूप में काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, कोई वैज्ञानिक थ्योरी नहीं. कल को हो सकता है कि इस आर्टिकल को किसी वैज्ञानिक थ्योरी की तरह लिख के कोई पोस्टकार्ड न्यूज़ या ऑपइंडिया जैसी वेबसाइट्स पर लगा दे. फिर लोग शेयर करने लगें कि "क्वांटम थ्योरी की खोज हमारे यहाँ लाखों साल पहले हो चुकी थी" या "पश्चिम ने भगवान शिव से चुराया था क्वांटम विज्ञान".

दरअसल जिन लोगों को काव्य की समझ नहीं होती, वो रूपकों को ही सत्य मान लेते हैं. अभी कल ही  मैंने अपनी एक कविता की कुछ पंक्तियां, एक मलयालम फ़िल्म की अभिनेत्री, प्रिया प्रकाश के लिए अपनी पोस्ट पर डाली थी.

उसके चेहरे पे आज़ाद मछलियां थी दो, छपाके मार के दरिया बहा रहीं थी वो, पिया गालों से पानी प्रेम नीलकंठ हुआ, तेज हंसिए की तरह मुस्कुरा रही थी वो

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अच्छा हुआ कि साथ में प्रिया प्रकाश का फ़ोटो उपलब्ध था, नहीं तो सीधे शब्दों को पढ़कर और उनका सीधा अर्थ लगाकर, न जाने लोग किस प्राणी की कल्पना कर लेते. अंतिम बात बस यह है कि शिव का किरदार एक कविता था, हमने उसे बस एक पत्थर बना के रख दिया.

( लेखक हिंदी सिनेमा के गीतकार हैं)

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