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सत्यमेव जयते को सबसे पहले लोकप्रिय महामना ने ही किया

हालांकि एक शोध का दावा है कि काशी हिंदू विश्विद्यालय की स्थापना में मदन मोहन मालवीय के योगदान को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है

Avinash Dwivedi Updated On: Nov 12, 2017 01:38 PM IST

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सत्यमेव जयते को सबसे पहले लोकप्रिय महामना ने ही किया

25 दिसंबर, 1861 को महामना संस्कृत पंडित के घर में जन्मे थे. पांच साल की उम्र से ही उनकी संस्कृत शिक्षा की शुरुआत हो गई थी. उनके पूर्वज मालवा, मध्यप्रदेश से थे. इसलिए उन्हें 'मालवीय' कहा जाता था. वैसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हमारे एक प्रख्यात शिक्षक का दावा था कि 'मालवी' को वक्त बीतने के साथ मालवीय कर दिया गया. मालवीय जी के पिता पंडित बैजनाथ भागवात पुराण का पाठ किया करते थे और इससे मिली दक्षिणा से ही उनके परिवार का गुजारा होता था.

एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय से संस्थापक

स्वतंत्रता सेनानी मालवीय जी को एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) की स्थापना का श्रेय जाता है. जानकारी के हिसाब से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी को विचार से विश्वविद्यालय के रूप में शक्ल लेने में दस साल से ज्यादा वक्त लगा था. प्रस्ताव के रूप में 1905 में इस पर पहली बार चर्चा हुई थी. इसके बाद मालवीय जी जो कि तब वकालत किया करते थे, उन्होंने अपनी वकालत छोड़ दी और जनवरी, 1911 में उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए एक मिशन की शुरुआत की. उनका उद्देश्य था विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 1 करोड़ रुपये जुटाना.

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1915 की शुरुआत तक उन्होंने 50 लाख रुपयों का इंतजाम भी कर लिया था. कहा जाता है कि मालवीय जी ने इस प्रयास के दौरान कई बार लोगों की झिड़कियां और दुत्कार सुनीं और शवयात्राओं में फेंके जाने वाले पैसों को भी उठाया. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के लिए उनका प्रयास तब रंग लाया जब 4 फरवरी, 1916 को लॉर्ड हार्डिंग ने विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया. हालांकि एक हालिया शोध में एक रिसर्चर का दावा है कि मालवीय से कहीं ज्यादा योगदान इस विश्वविद्यालय की स्थापना में दरभंगा के तत्कालीन राजा रामेश्वर सिंह और होमरूल लीग की स्थापना करने वाली एनी बेसेंट का था. इस रिसर्चर ने ये भी माना है कि बाद में लिखे गये इतिहास में मालवीय जी के योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया.

हिंदू महासभा के सबसे उदारवादी नेता

मालवीय जी अखिल भारतीय हिंदू महासभा के भी एक सदस्य थे. ये संगठन वैसे तो कट्टर हिंदूवादी संगठन माना जाता था पर मालवीय जी इस संगठन की सबसे उदारवादी आवाजों में से एक थे. मालवीय जी साथ ही साथ कांग्रेस पार्टी के भी सदस्य थे. मालवीय हिंदू महासभा के सदस्य होने के बावजूद हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्के समर्थक थे. कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में 1913 में उन्होंने कहा था, 'भारत हिंदू, मुस्लिमों, सिखों, पारसियों और बाकी सभी का है. कोई भी एक समुदाय बाकियों पर प्रभुत्व नहीं जमा सकता. तुम्हारे हाथ में 5 उंगलियां हैं. अगर तुम अंगूठा काट दो तो हाथ की ताकत का केवल दसवां हिस्सा बाकी रहेगा.  इस तरह काम करो कि सब एक हों… आपसी विश्वास बनने दो. हमें ऐसा संविधान और क़ानून बनाने होंगे कि चाहे जैसी भी परिस्थिति हो, कोई भी किसी दूसरे से न डरे.'

हिंदू महासभा के ही सदस्य केशवराम बलिराम हेडगेवार भी थे, जिन्होंने बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना की. इसके सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे, जिन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की थी जो वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (BJP) का पूर्वरूप था.

'महामना' मालवीय और भारत को उनके योगदान

मालवीय जी को कई उपाधियां मिली हुई थीं. रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें 'महामना' की उपाधि दी थी. महात्मा गांधी ने उन्हें 'प्रात: स्मरणीय' और 'देवता पुरुष' कहा था. मालवीय जी को 'धर्मात्मा', 'कर्मयोगी' और 'भिखारियों के राजकुमार' जैसे संबोधनों से भी पुकारा जाता था.

वह मालवीय जी ही थे, जिन्होंने 'मुंडकोपनिषद्' की की सूक्ति 'सत्यमेव जयते' को प्रचलित किया था. इसका अर्थ है, 'केवल सत्य की विजय होती है'. बाद में इस सूक्ति को भारत के 'राष्ट्रीय सूक्त वाक्य' के रूप में स्वीकारा गया और भारत के 'सरकारी प्रतीक चिन्ह' के नीचे इसे लिखा देखा जा सकता है.

 

मालवीय जी भारत के तत्कालीन प्रमुख लेखकों और पत्रकारों में से थे. 1907 में उन्होंने हिंदी भाषा की एक साप्ताहिक पत्रिका 'अभ्युदय' की शुरुआत की थी. 1909 में अंग्रेजी अखबार 'लीडर' और 1910 में हिंदी की मासिक पत्रिका 'मर्यादा' की भी शुरुआत की थी. मालवीय जी 1924 से 1946 तक 'हिंदुस्तान टाइम्स' अखबार के बोर्ड के चेयरमैन भी रहे थे. 1936 तक इन्होंने अखबार के हिंदी अखबार में सेवायें भी दी थीं.

सियासत में महामना और उनकी विरासत

मालवीय जी जीवन में चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने. 1909 में लाहौर, 1918 में दिल्ली, 1930 में पुन: दिल्ली और 1932 में उन्होंने कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन का नेतृत्व किया. मालवीय जी असहयोग आंदोलन के मुख्य नेता थे. उन्होंने खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने पर कांग्रेस का विरोध भी किया था. उन्होंने स्वदेशी आंदोलन शुरु किया और 1932 में 450 अन्य कांग्रेसी स्वयंसेवकों के साथ गिरफ्तार किये गये. बाद में मालवीय जी ने कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस नेशनलिस्ट पार्टी का गठन किया था और 1934 के आम चुनावों में उनकी पार्टी ने 12 सीटों पर जीत भी दर्ज की थी.

मालवीय जी ने इलाहाबाद जिला स्कूल में एक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी. मालवीय जी भारत में स्वयंसेवक कल्चर (स्काउट कल्चर) की शुरुआत करने वाले थे. उन्होंने 1917 में इलाहाबाद में सेवा समिति स्काउट असोसिएशन की शुरुआत की थी. 12 नवंबर, 1946 को मालवीय जी का देहांत हो गया पर उनकी विरासत वाराणसी में 'सर्वविद्या की राजधानी' कहे जाने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं आज भी आगे ले जा रहे हैं.

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