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पुण्यतिथि विशेष: लता मंगेशकर ने छपवाए थे जिनके बच्चों की शादी के कार्ड

मदन मोहन को लता मंगेशकर अपना भाई मानती हैं. मदन मोहन की मौत के बाद जब उनके बच्चों की शादी का समय आया तो लता मंगेशकर ने यह कहते हुए लोगों को बुलाया था-लता मंगेशकर आपको निमंत्रण देती है...

Updated On: Jul 14, 2018 09:28 AM IST

Shailesh Chaturvedi Shailesh Chaturvedi

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पुण्यतिथि विशेष: लता मंगेशकर ने छपवाए थे जिनके बच्चों की शादी के कार्ड

हकीकत फिल्म की नज्म है – मैं ये सोचकर उसके दर से उठा था.. अदालत फिल्म की गजल है – जाना था हमसे दूर... दस्तक फिल्म में एक गाना है, जो व्हिस्पर यानी फुसफुसाते हुए गाया गया है – तुमसे कहूं एक बात परों से हल्के-हल्के.. खासतौर पर हल्के-हल्के शब्द. फिल्म मौसम में गालिब के शेर पर बनाया गया गीत है – दिल ढूंढता है, फिर वही फुरसत के रात-दिन. इस गाने में फुरसत शब्द पर ध्यान दीजिए. हंसते जख्म का तुम जो मिल गए हो. इस गाने में संगीत के बदलते अंदाज पर ध्यान दीजिए. मेरा साया का नैनों में बदरा छाए.. शास्त्रीय संगीत की बात होने पर यह गीत जरूर याद आता है.

उदाहरण इतने हैं कि शब्द कम पड़ जाएं. इन सभी गानों, गीत, नज्म, गजल का संगीत एक ही आदमी ने दिया है. वो हैं मदन मोहन. लता मंगेशकर उन्हें मदन भैया कहती हैं. उन्हें गजलों का शहजादा बताती हैं. नौशाद जैसे संगीतकार उनकी एक गजल के बदले अपना पूरा संगीत कुर्बान करने को तैयार हो जाते हैं. अनपढ़ की गज़ल – है इसी में प्यार की आबरू  के लिए नौशाद ने कहा था कि मदन मोहन की इस रचना के लिए मेरा पूरा संगीत कुर्बान.

युवा पीढ़ी उन्हें वीर ज़ारा फिल्म से याद कर सकती है, जो 2004 में रिलीज हुई थी. उनकी मौत के करीब 30 साल बाद. वो कंपोजिशन, जो मदन मोहन फिल्मों में इस्तेमाल नहीं कर पाए, उन्हें वीर ज़ारा में इस्तेमाल किया गया. ध्यान रखिए, शायद वो संगीत 70 के दशक का होगा, उसके बावजूद 2004 में भी फिल्म का साउंड ट्रैक सबसे लोकप्रिय रहा.

ये सारी बातें मदन मोहन के संगीत की गहराई बताती हैं. उस दौर में गीतों की लोकप्रियता के लिए बिनाका गीतमाला बहुत अहम था. अमीन सायानी इसे पेश करते थे. मदन मोहन का कोई गीत कभी नंबर वन नहीं रहा. वो कभी बाजार के संगीतकार नहीं बन पाए. उन्हें कभी फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं मिला. उनके बेटे संजीव कोहली ने एक इंटरव्यू में कहा था कि गीतमाला में अनपढ़ फिल्म का गीत आपकी नजरों ने समझा नंबर दो पर आया. यही उनका बेस्ट था. मदन मोहन के दिल में हमेशा ये कसक रही कि वो नंबर वन नहीं हो पाए. गीतमाला में भी और फिल्मफेयर में भी. वो कसक इस कदर थी कि जब फिल्म दस्तक के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला, तो उन्होंने लेने से इनकार कर दिया. संजीव कुमार ने उन्हें मनाया. उनसे कहा कि अगर आप नहीं लेंगे, तो मैं भी अवॉर्ड लेने नहीं जाऊंगा. उसके बाद ही मदन मोहन अवॉर्ड लेने गए.

वहां भले ही बाजार की दुनिया के नंबर वन नहीं रहे हों, लेकिन संगीत प्रेमियों के दिलों में उनकी जो जगह थी, वो बीतते समय के साथ और मजबूत ही हुई है. 1975 में उनका निधन हुआ था. आज भी उनके गाने ताजा लगते हैं. उनके पार्थिव शरीर को अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना और राजेंद्र कुमार ने कंधा दिया था, जिसकी तस्वीरें अखबारों में छपी थीं.

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लता जी उनके बेटे संजीव से कहती रही हैं कि कुछ लोगों को जन्म कुंडली उनके जाने के बाद शुरू होती है. जाहिर है, उनकी यह बात अपने मदन भैया के बारे में ही है. लता जी उन्हें कितना मानती थीं, इसका एक किस्सा है. मदन जी की मौत के कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी की मौत हो गई. लता जी लगातार बच्चों का ध्यान रखती थीं. मदन जी के दो बच्चों की शादी हुई है. बेटे और बेटी की. दोनों की शादी के कार्ड छपे, जिस पर लिखा था – लता मंगेशकर आपको निमंत्रण देती है...

अब मदन मोहन के जन्म की कहानी. इराक में बगदाद के नजदीक कुर्दिस्तान एक जगह है. यहीं उनका जन्म 5 जून 1924 को हुआ. पिता राय बहादुर चुन्नीलाल और मां भगवती. रायबहादुर अकाउंटेंट जनरल थे. आसान शब्दों में समझ लें कि वहां की पुलिस का हिस्सा थे. 1932 में मदन मोहन जी का परिवार अपने देश वापस आ गया. अपने शहर चकवाल, जो पंजाब के झेलम जिले में था. दरअसल, इराक को ब्रिटिश राज से आजादी मिली. मदन जी के पिता को विकल्प दिया गया कि वो जॉब छोड़ दें या इराक. उन्होंने इराक छोड़ने का फैसला किया. चकवाल में ही उन्होंने गाना शुरू किया. फिर परिवार लाहौर आ गया. यहां मदन मोहन ने क्लासिकल म्यूजिक सीखा.

कुछ समय बाद मदन मोहन का परिवार बंबई आ गया. वे बंबई (अब मुंबई) में मरीन ड्राइव के पास रहने लगा. वहां से जद्दन बाई का घर बहुत करीब था. जद्दन बाई यानी प्रख्यात अदाकारा नरगिस जी की मां. जद्दन बाई बहुत अच्छी गायिका थीं. उनके घर पर महफिल जमा करती थी. मदन जी अपने पिता से छुपकर रात में गाने सुनने चले जाया करते थे. लगभग सुबह हो जाती थी. मदन जी पीछे के दरवाजे से चोरी-छुपे वापस अपने कमरे में चले जाया करते थे. मां-बाप को कभी पता नहीं चला कि उनका बेटा पूरी रात घर में नहीं रहता.

1943 में एक साल की मिलिटरी ट्रेनिंग के बाद उन्होंने आर्मी जॉइन कर ली. वहां दो साल काम किया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ी. उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ में नौकरी की. बात है 1946 की. 1947 में उनका ट्रांसफर दिल्ली हो गया. लेकिन काम लखनऊ से अलग था. यहां पेपरवर्क का काम था, संगीत से जुड़ा नहीं. उन्होंने फिर बंबई आने का फैसला किया. वो भी एक्टर बनने. लेकिन कुछ समय बाद समझ आ गया कि एक्टिंग नहीं, उनकी मंजिल संगीत निर्देशन है.

राय बहादुर चुन्नीलाल फिल्म इंडस्ट्री के बड़े असरदार लोगों में थे. लेकिन वो अपने बेटे के फिल्मों में आने से बेहद खफा थे. मदन मोहन ने घर से दूरी बना ली. कई रातें भूखे पेट फुटपाथ पर सोते हुए बिताईं. मदन जी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि एक बार तो पांच दिन बगैर खाए रहना पड़ा था. संगीतकार के तौर पर मदन मोहन को पहला ब्रेक मिला फिल्म आंखें में, जो 1950 में आई. इस फिल्म सहित कुछ फिल्मों में उन्होंने गाने भी गाए. मदन जी ने फिल्म के प्राइवेट प्रीव्यू के लिए पिता को बुलाया. मदन जी अपने पिता को उनकी गाड़ी तक छोड़ने आए. पिता गाड़ी में बैठे, तो मदन जी ने देखा कि उनकी आंखों से आंसू बह रहे हैं. उन्होंने कहा – बेटा, तुम सही रास्ते पर हो. मैं भगवान से तुम्हारी कामयाबी की दुआ करूंगा.

गायक मदन मोहन को तो लोगों ने कोई खास भाव नहीं दिया, लेकिन संगीतकार मदन मोहन को सिर आंखों पर बिठा लिया. उसके बाद तो जैसे हिट फिल्मों और गानों की झड़ी लग गई. वैसे असली पहचान उन्हें 1958 में आई फिल्म अदालत से मिली. जाना था हमसे दूर, यूं हसरतों के दाग, उनको ये शिकायत है कि हम... जैसे अमर गीत और ग़ज़ल इसमें थे.

बड़े शौकीन मिज़ाज थे मदन मोहन. उन्हें बॉडी बिल्डिंग का बड़ा शौक था. यहां तक कि वो दारा सिंह को यह कहकर छेड़ते थे कि आपसे बेहतर मसल्स मेरी हैं. खेलना बहुत पसंद था. बॉक्सिंग करते थे. बिलियर्ड्स खेला करते थे. क्रिकेट तो बहुत अच्छा खेलते थे. तैराकी और बॉल रूम डांसिंग भी पसंद थी.

1964 का साल मदन मोहन के लिए खास था. इसमें आप की परछाइयां, गजल, हकीकत, जहांआरा, पूजा के फूल, सुहागन और वो कौन थी जैसी फिल्में आईं. वो कौन थी में एक गाना था नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.. इसकी धुन मदन मोहन के दिमाग में 12 साल से थी. सही शब्दों का इंतजार था, जो इस फिल्म में मिले.

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1970 में फिल्म आई दस्तक. इसमें उन्हें बेस्ट म्यूजिक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. बैंया ना धरो, माई री मैं कासे कहूं और हम हैं मता-ए कूचा-ओ... जैसे गाने उन्हें अलग स्तर पर ले गए. फिर हीर रांझा.. हंसते जख्म, जिसके एक गाने में तीन अलग-अलग मूड थे. गाना था – तुम जो मिल गए हो.. इस गाने की एक और कहानी है. मोहम्मद रफी गाना गाने वाले थे. उससे ठीक पहले मदन मोहन ने रफी का रिकॉर्ड हुआ एक गाना सुना. महबूब स्टूडियो की बात है. वो बेहद खफा हुए. उन्होंने अगले दिन रफी साहब को बुलाया और कहा कि आपको क्या हो गया है? आपकी आवाज में क्या कोई दिक्कत है? रफी साहब की आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा कि मुझसे कई लोग ऐसा कह चुके हैं. पता नहीं क्या हुआ है. मेरा आत्मविश्वास खत्म हो गया है. मुझे नहीं पता कि क्या करूं. मदन जी ने कहा कि मैं आपको एक गाना दे रहा हूं. आप रिहर्सल कीजिए. आपकी आवाज का जादू फिर चलेगा. गाना सुनकर आप समझ ही सकते हैं कि जादू तो चला- तुम जो मिल गए हो...

जादू सिर्फ एक गाने का नहीं है. तमाम गीत हैं. हर गीत ताजा लगता है. एक से बढ़कर एक लगता है. उनका एक किस्सा है. बच्चों के कहने पर उन्होंने अपनी गाड़ी की रफ्तार बढ़ाई थी. पीछे पुलिस की गाड़ी आई. मदन मोहन ने गाड़ी रोक दी. पुलिस ऑफिसर उतरकर आया. उसने पहचान लिया और कहा – मदन जी, आपका वो गाना आपकी नजरों ने समझा  कमाल है. मदन जी ने अपनी पत्नी की तरफ देखा और कहा कि यही मेरा अवॉर्ड है. लोगों की चाहत को अवॉर्ड मानें, तो यकीनन मदन मोहन गजलों के भी नहीं, इनामों के भी बादशाह ही साबित होंगे.

(लेख में मदन मोहन के बारे में कुछ जानकारियां www.madanmohan.in से ली गई हैं. यह वेबसाइट उनके बेटे संजीव कोहली ने अपने पिता की यादों को संजोकर रखने के लिए शुरू की थी)

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