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जहां ‘साहब’ पर सिपाहियों का कब्जा हो जाए, वहां 'पुलिस' को भला कौन बचा पाएगा?

'पड़ताल’ की खास-किश्त में इस बार पढ़िए विवेक हत्याकांड में ‘काली-पट्टी’ के पीछे के मौजूद ‘सफेद-सच’ की हैरतंगेज कहानी!

Updated On: Oct 06, 2018 09:52 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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जहां ‘साहब’ पर सिपाहियों का कब्जा हो जाए, वहां 'पुलिस' को भला कौन बचा पाएगा?

लखनऊ के गोमती नगर इलाके में एपल के मैनेजर विवेक तिवारी का बीते दिनों आधी रात को सर-ए-राह बर्बरतापूर्वक कत्ल कर दिया गया. खुद के नसीब और हड़बड़ाहट में सिरफिरे हत्यारोपी सिपाहियों की न-समझी के चलते! कत्ल की इकलौती चश्मदीद (गवाह) लड़की सना खान, जाने-अनजाने जिंदा बच गई! हत्याकांड का आरोप लगा यूपी पुलिस के दो बिगड़ैल सिपाहियों के सिर. खाल बचाने के चक्कर में यूपी के आला-पुलिस अफसरों ने दोनों अपने बेकाबू हत्यारोपी कथित ‘सूरमा’ सिपाही गिरफ्तार कर लिए.

किसी हॉलीवुड की ‘हॉरर-फिल्म’ के डरावने सीन सा यह तो बस ‘ट्रेलर’ था. असल में तो कानून का ‘माखौल’ इसके बाद उड़ाया जाना शुरू हुआ! बिगड़ैल सिपाहियों के कथित चंद शुभचिंतक सिपाहियों द्वारा. ब-जरिये मेरी कलम ‘पड़ताल’ की खास-किश्त में इस बार पढ़िए विवेक हत्याकांड में ‘काली-पट्टी’ के पीछे के मौजूद ‘सफेद-सच’ की हैरतंगेज कहानी!

'सोशल-मीडिया देश को डूबो देगा'

इस सनीखेज मुद्दे पर ‘फ़र्स्टपोस्ट हिंदी’ ने बात की दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड वरिष्ठ जज शिव नारायण ढींगरा (जस्टिस एस.एन. ढींगरा) से. भारतीय संसद पर हमले के मुख्य आरोपी को फांसी पर लटकवाने वाले श्री ढींगरा फिलहाल जर्मनी में हैं. बकौल एस.एन. ढींगरा, ‘यह तो साफ-साफ 'चोरी की चोरी ऊपर से सीना-जोरी' है. पहले तो आप (हत्यारोपी दोनों सिपाही) निहत्थे को घेरकर गोलियों से भून डालते हैं. कत्लेआम के बाद आपको समाज का समर्थन की भी दरकार रहती है. यह कहां का रिवाज है. यह सोशल-मीडिया देश को डुबो देगा.’ पुलिस में राजनीति की घुसपैठ से खिन्न रिटायर्ड जस्टिस शिव नारायण ढींगरा कहते हैं कि, ‘आरोपी की बीवी का बैंक-अकाउंट नंबर फेसबुक पर शेयर करने वाले भी गलत हैं. और फिर जब फेसबुक पर अकाउंट-नंबर एक गलत इंसान को बचाने की खातिर चंदे के लिए शेयर किया गया था! उस वक्त आखिर पुलिस महकमे के तमाम पढ़े-लिखे आईपीएस अफसर कहां सो रहे थे? रही-सही कसर पूरी करके आग में घी का काम कर रहे हैं मीडिया और नेता.’

'सिपाहियों को कौन काबू करे....?'

तमाम रसूखदार और सफेदपोश मुजरिमों के मामले में चर्चित फैसले देने वाले पूर्व जस्टिस एस.एन. ढींगरा के मुताबिक, ‘एक विवेक तिवारी हत्याकांड ही क्यों? कांधार हवाई जहाज अपहरण कांड में भी भारत को जमाने में हार का मुंह मीडिया और सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक कमजोरी/कारणों से ही देखना पड़ा. सोशल मीडिया अगर उन दिनों हर सच्चाई उजागर न करता तो, दुनिया में आज वे पांचों नासूर (रिहा किए गए पाकिस्तानी अपहरणकर्ता) न बने होते. मैं विवेक हत्याकांड के आरोपियों के पक्ष में काली-पट्टियां बांधने वालों के भी सख्त खिलाफ हूं. यह और कुछ नहीं पुलिस अफसरों की कमजोरी का नतीजा है. वरना क्या मजाल कि फोर्स का अनुशासित सिपाही, अफसर पर सवारी कर सके! हां, यहां सवाल यह भी पैदा होता है कि, जिस देश की संसद में कुछ सांसद काली-पट्टी बांधकर ज्ञान बांचते हों! वहां फिर चंद बिगड़ैल सिपाहियों को आप किस ‘बिना’ पर और किस मुंह से काबू करेंगे?’

यह सोशल मीडिया तबाह कर देगा...दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड चर्चित जस्टिस शिव नारायऩ ढींगरा

यह सोशल मीडिया तबाह कर देगा...दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड चर्चित जस्टिस शिव नारायऩ ढींगरा

'बगावत नहीं, अनुशासनहीनता है'

यूपी काडर 1960 दशक के पूर्व आईपीएस, सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) पूर्व डायरेक्टर जनरल और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह हत्यारोपी सिपाहियों की गिरफ्तारी-बर्खास्तगी को जायज कहते हैं. आरोपी की पत्नी के बैंक खाते में लाखों रुपए चंदा डालने के कदम को वे ‘नाजायज’ मानते हैं. बकौल प्रकाश सिंह, ‘सिपाहियों का काली-पट्टी लगाना बगावत नहीं, अनुशासनहीनता है. जिस दिन हत्यारोपी पत्नी का बैंक-खाता नंबर सोशल-मीडिया पर शेयर किया गया, उसी दिन राज्य पुलिस ने वो कदम उठाने वाले को बेदम कर दिया होता. तो राज्य पुलिस महकमे के आगे काली-पट्टी बांधकर चहलकदमी करने की कुव्वत सिपाहियों की नहीं होती.’

'इसलिए अफसर पर सवारी करते हैं सिपाही!'

रिटायरमेंट के बाद से आज तक पुलिस वेलफेयर की ही लड़ाई लड़ रहे बेबाक प्रकाश सिंह के मुताबिक, ‘विवेक तिवारी हत्याकांड के बाद सूबे की पुलिस में जो बदतर हालात बने हैं, वे कतई ठीक नहीं हैं. मुझे लगता है कि यह कहीं न कहीं किसी घातक साजिश का नतीजा है. आरोपी सिपाही की पत्नी के बैंक अकाउंट में लाखों चंदा जमा करना या कराना. उसके बाद हत्यारोपी के पक्ष में बेखौफ खड़े होने की कुव्वत पैदा करके काली-पट्टियां बांधना. यह सूबे की अनुशासित पुलिस-फोर्स है या फिर कोई श्रम यूनियन. मुझे लगता है कि हत्याकांड से लेकर काली-पट्टी तक के पीछे. लखनऊ पुलिस के कुछ अफसरों की कमजोरियां भी इस सबकी वजह हैं. सिपाही साहब पर तभी सवारी करता है, जब उसे साहब की कमजोरी हाथ में लग जाए.’

पुलिस के लिए यह सब घातक है..पूर्व आईपीएस और सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह

पुलिस के लिए यह सब घातक है..पूर्व आईपीएस और सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह

'पुलिस में घातक परिपाटी पैदा हो रही है'

कितना वाजिब है हत्यारोपी सिपाही की बीबी के बैंक-खाते में चंदा इकट्ठा करना या कराना? आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी पर उसके समर्थन में चंद सिपाहियों का ‘काली-पट्टी’ बांधना? पूछे जाने पर उत्तर-प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक कन्हैया लाल गुप्ता बोलना शुरू करते हैं, ‘बहुत खतरनाक परिपाटी पैदा हो चुकी है यूपी पुलिस में. सिपाहियों की भर्ती प्रक्रिया ही गलत हो चुकी है. जब सिपाही को भर्ती कराने के लिए नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री तक जोर लगाएंगे तो यही सब होगा. मेरे जमाने में हाईस्कूल इंटर पास लड़के सिपाही बनने आते थे. पुलिस ट्रेनिंग में रगड़कर उन्हें असली सिपाही बनाया जाता था. अब जब बीए, एमए पास सिपाही आएगा, तो वो पुलिस ट्रेनिंग क्या खाक करेगा? उसके तो दिमाग में पहले से ही है कि, वही सबसे काबिल है.’

घातक परिपाटी पैदा हो गयी है यूपी पुलिस में...उत्तर प्रदेश के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक कन्हैया लाल गुप्ता

घातक परिपाटी पैदा हो गई है यूपी पुलिस में...उत्तर प्रदेश के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक कन्हैया लाल गुप्ता

'वर्दी में बदमाशी मैंने मंजूर नहीं की'

भारत में किसी राज्य (उत्तराखंड) की पहली महिला पुलिस महानिदेशक और 1973 बैच यूपी काडर (बाद में उत्तराखंड) की पूर्व आईपीएस कंचन चौधरी भट्टाचार्य मुद्दा समझते ही बोलने लगती हैं, ‘आज पुलिस की हिम्मत और उसका स्तर गिर चुका है. लखनऊ का विवेक तिवारी हत्याकांड तो पुलिसिया क्रूरता की चरम सीमा से भी ऊपर है. ऐसा नहीं है हमारे जमाने में पुलिस गलतियां नहीं करती थी. गलतियां होती थीं . सरकारी असलहे के बलबूते खुली-बदमाशी की मैंने मगर कभी किसी सब-ऑर्डिनेट को इजाजत नहीं दी थी. आज तो पुलिस का तमाशा गली-गली दिखाई दे रहा है. मेरी तो समझ से परे है कि विवेक तिवारी को आखिर सरकारी हथियार से मार ही क्यों डाला गया?

सब्र है कि मेरे मातहत हत्यारोपी सिपाही अब तक जेल में बंद हैं...उत्तराखंड की रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य

सब्र है कि मेरे मातहत हत्यारोपी सिपाही अब तक जेल में बंद हैं...उत्तराखंड की रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक कंचन चौधरी भट्टाचार्य

हत्या सिपाहियों ने की, माफी डीजीपी ने माँगी!

बकौल कंचन चौधरी, ‘मैं जब उत्तराखंड की डीजीपी थी तो ऋषिकेष में रात के वक्त सिपाहियों ने आतंकवादी बताकर, एक महिला की हत्या कर दी थी. मरने वाली रुड़की की थी. विश्वास कीजिए मैंने, पीड़ित परिवार से हाथ जोड़कर माफी मांगी. अपने सिपाहियों के उस घिनौने काम के लिए. वे सिपाही आज तक जेल में पड़े हैं. बस इतना सब्र है.’ खाकी वर्दी में प्रशांत चौधरी जैसे खूंखार चेहरे भर्ती क्यों और कैसे हो जाते है? सवाल का जवाब न देकर सवाल ही दागती हैं कंचन चौधरी भट्टाचार्य, ‘जब पुलिस में जबरदस्ती भर्तियां होंगी. या कराईं जाएंगी. नेताओं के भाई-भतीजे, भांजे-भांजी, अड़ोसी-पड़ोसी किसी मेहरबानी से वर्दी में ठूंसे-भरे जाएंगे तो आप ही बताइए फिर क्या यह सब नहीं होना चाहिए?’ सिपाही को किसने हक दिया ‘ठोंकने’ का?

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इस लेखक ने 1974 बैच यूपी कॉडर के पूर्व आईपीएस और उत्तर प्रदेश के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह लेखक पर ही सवालों की झड़ी लगा दी....‘बताइए मैं क्या बोलूं...? अब क्या बाकी बचा है बोलने को...? जिस सूबे में पुलिस अफसरान का मुंह उनके मातहत सिपाही-हवलदार बंद करा दें...! वहां विक्रम सिंह को बोलने के लिए बाकी क्या बचा है? विक्रम सिंह फिर इस लेखक पर ही पूछते हैं, ‘एक सिपाही की किसी बेकसूर को सरकारी असलहे से सरेआम गोली से ठोंक देने की औकात कैसे हो गई? कौन है इस सिपाही की जिंदगी बर्बाद कराने वाला? जो आज तक इस खौफनाक सिपाही के कुकर्मों को बढ़ावा देता आ रहा है? क्यों नहीं लखनऊ पुलिस ने पहले ही दिन उस शख्स को गिरफ्तार करके जेल भेजा? जिसने हत्यारोपी बर्खास्त सिपाही की पत्नी के बैंक-एकाउंट का नंबर सोशल-मीडिया पर प्रसारित किया?’

सिपाही इसलिए महकमे की ‘मधुमक्खी’ बन गए!

तमाम सवाल पूछते-पूछते ही बताते हैं बेबाक विक्रम सिंह, ‘पुलिस अफसरों ने लगाम ढीली की. सो सिपाही खाकी पर सवारी करने लगे. खाकी वर्दी पर लगा विवेक तिवारी की मौत का दाग कौन पुलिस अफसर धो पाएगा? है किसी के पास ऐसा हुनर? अफसरों की नक्शेबाजी का ही नतीजा है जो, आज काली पट्टी बांधकर अपने ही सिपाही उन्हें आज मुंह चिढ़ा रहे हैं. आज लखनऊ पुलिस की खाकी-वर्दी पर मधुमक्खी की मानिंद भिनभिना रहे काली-पट्टी वाले सिपाही जनता की पैदाइश नहीं हैं. यह महकमे के ही कुछ अफसरों के सजाए हुए बदनुमा ‘चेहरे-मोहरे’ हैं!

बर्बाद हो रही है कभी बेदाग रही खाकी वर्दी....बायें से दायें यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह, रिटायर्ड पुलिस उपाधीक्षक सुरेंद्र सिंह लौर के साथ

बर्बाद हो रही है कभी बेदाग रही खाकी वर्दी....बायें से दायें यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह, रिटायर्ड पुलिस उपाधीक्षक सुरेंद्र सिंह लौर के साथ

'तीन-तीन कत्ल झेले, मैंने तो चंदा नहीं बटोरा'

1960-70 के दशक में नौजवानी में ही बैरागी-बाबा/साधू से आईपीएस बने. फिर एक रात एनकाउंटर के दौरान पेट में घुसी गोलियों सहित ही घर जाकर सो जाने वाले विक्रम सिंह के मुताबिक, ‘मैंने भी पुलिसिया नौकरी में कत्ल के तीन-तीन मामले झेले हैं. मैंने तो केस लड़ने के लिए कभी किसी से चंदा इकट्ठा नहीं किया. पोथीराम, महाबीरा, करुआ, काशीबाबा जैसे खूंखार डाकू भी निपटाS. कभी किसी सड़क चलते को घेरकर माथे में मगर गोली किसी निर्दोष के नहीं ठोंकी. खुद के बलबूते जब मुकदमा लड़ने की औकात नहीं थी (इशारा विवेक तिवारी हत्याकांड के मुख्य आरोपी बर्खास्त सिवाही की ओर) तो फिर, विवेक तिवारी को हवाबाजी में ही काहे को ठोंकने पहुंच गया? फंसने पर काली-पट्टी बंधवाकर बाकियों को भी ठिकाने लगवाने पर तुला बैठा है.’

कानून सबको पता है लागू कौन कराए?

कम मगर हमेशा सटीक बोलने के माहिर यूपी पुलिस के रिटायर्ड महानिरीक्षक (आईजी) राम कृष्ण चतुर्वेदी (आरके) से भी इस लेखक ने बात की. 1998 बैच के यूपी काडर के पूर्व आईपीएस आरके चतुर्वेदी बताते हैं, ‘जो हुआ बेजा हुआ. विवेक की हत्या के बाद जो हो रहा है (काली पट्टी का ड्रामा. या फिर हत्यारोपी की वर्दीधारी सिपाही बीबी के बैंक एकाउंट में लाखों रुपए जमा करा दिए जाने का घटिया अभियान). यह सब कत्ल से भी खतरनाक साबित होगा. काली-पट्टी बांधना सीधे अनुशासनहीनता है. इन शर्मनाक हरकतों से निपटने के लिए ही बनाया गया है ’29-पुलिस-एक्ट’. यह एक्ट इतना पॉवरफुल है कि, अगर अमल में इस वक्त के हालात में ले आया जाए, तो काली पट्टी बांधकर उछल-कूद मचाने वालों को बचने की जगह नहीं मिलेगी.’

काली-पट्टी वाल सिपाहियों से निपटने के लिए कानून तो है मगर इस्तेमाल कौन करे- यूपी के रिटायर्ड आईजी राम कृष्ण चतुर्वेदी

काली-पट्टी वाल सिपाहियों से निपटने के लिए कानून तो है मगर इस्तेमाल कौन करे- यूपी के रिटायर्ड आईजी राम कृष्ण चतुर्वेदी

‘तलवार की धार’ सा है काली-पट्टी कांड!

पूर्व आईपीएस और यूपी के रिटायर्ड पुलिस उप-महानिरीक्षक (डीआईजी) राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव के मुताबिक, ‘विवेक तिवारी हत्याकांड और उसके बाद पैदा हुए यूपी पुलिस के भीतर बदतर हालात ‘तलवार की धार’ से बनते जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस महानिदेशक नाक से मख्खी हटाकर मामले में सीधे हस्तक्षेप करें. वरना जो हालात हैं उनमें साहब और सिपाही के बीच मौजूद खाई और ज्यादा गहरी होती जायेगी. बकौल आरपीएस यादव, ‘अगर हत्यारोपी बर्खास्त सिपाही प्रशांत चौधरी को कुछ बेजा लग रहा है तो वो ब-रास्ता कोर्ट अपनी बात रख सकता है. जांच का विषय यह भी है कि इस पूरे मामले में पीछे से छिपकर कहीं कोई ‘स्वंय-भू’ नेता जी तो सीढ़ी नहीं लगा या दे रहा है.’

Rajendra Prasad Singh Yadav

हैरत में हूं आज की पुलिस का हाल देखकरपुलिस वाले पहले गोली खाने की नौबत तो आने देते खुद के सीने पर तब बचाव में विवेक पर गोलियाँ दागतेरिटायर्ड डीआईजी पूर्व आईपीएस राजेंद्र प्रसाद सिंह यादव

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पाले पुलिस और भोगे पब्लिक आखिर क्यों?

1960-70 के दशक में यूपी पुलिस के दबंग दारोगा साबित होकर डिप्टी एसपी से रिटायर होने वाले सुरेंद्र सिंह लौर सूबे की पुलिस से सबसे ज्यादा खार खाए बैठे हैं. उन्हीं के शब्दों में, ‘आज की खाकी वर्दी पहने कौन पुलिस वाला कब कहां किसे ठोक डाले, कहना मुश्किल है. लखनऊ का विवेक तिवारी हत्याकांड इसकी घिनौनी मिसाल सामने है. समझ यह नहीं आता है कि आज की पुलिस के हुक्मरानों और सिपाहियों को आखिर नशा किस चीज का होता जा रहा है? जो जनता के साथ-साथ खाकी को भी खाक में मिलाकर तबाही पर उतारू है. बड़ा अजीब सा महसूस होता है जब, खाकी-वर्दी में पले हुए चंद गुंडा टाइप लोग विवेक से निर्दोषों को सड़क चलते मार डाल रहे हैं! बेखौफ और बेशर्म होकर. ऐसों को काबू करना बहुत जरूरी है. वरना वो दिन दूर नहीं जब ऐसे पुलिसकर्मी पब्लिक से ज्यादा खाकी के लिए नासूर बन जाएंगे.’ उनके मुताबिक, ‘मैने तीन किलोमीटर दूर तक नंगे पांव दौड़ने के बाद बैंक डकैत को पकड़कर भी जिंदा छोड़ दिया था. विवेक बिचारा आधी रात को सूनसान में ही ठोंक डाला गया. यह कहां की और कैसी घृणित ‘मार्डन-पुलिसिंग’ पैदा होकर फल-फूल रही है?’

बदमाश छोड़े नहीं और बेकसूर छेड़े नहीं

सन् 1966 यूपी पुलिस बैच के सब-इंस्पेक्टर (रिटायर्ड इंस्पेक्टर) और दबंग एनकाउंटर स्पेशिलस्ट रामचरन सिंह के मुताबिक, ‘1970-80 के दशक में नैनीताल, किच्छा से लेकर एटा, इटावा, मैनपुरी, कासगंज, आगरा, अलीगंज, मठसेना तक ठोंके तो मैने भी कई खूंखार डाकू-बदमाश. वह चाहे महाबीरा, करुआ, काशीबाबा डाकू की मौत या फिर वीरभान डाकू के गैंग की जिंदा गिरफ्तारी. काम सब किए, ओछा काम कोई नहीं किया. जैसा गोमती नगर लखनऊ में विवेक तिवारी के संग हुआ है. अखबारों में ही सुना पढ़ा है कि खिसियाये हुए किसी बिगड़ैल सिपाही ने उस निहत्थे को सामने खड़े होकर 'क्लोज-रेंज' से सरकारी हथियार से मार डाला. यह कहां की और कैसी पुलिस और पुलिसिंग है? पहले तो पुलिस हनक में खाकी की झोंक में ठोंक दिया. सुना है अब बर्खास्त होने के बाद बर्खास्त सिपाही की बीबी के अकाउंट में मदद के नाम पर 'चंदा' इकट्ठा कराया जा रहा है. जब कोर्ट-कचहरी में केस लड़ने को जेब में दाम ही नहीं था तो फिर काहे को हनक में मार डाला?’

1970-80 के दशक में खूनी डाकुओं के दुश्मन नंबर एक रहे यूपी पुलिस के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर रामचरन सिंह.

1970-80 के दशक में खूनी डाकुओं के दुश्मन नंबर एक रहे यूपी पुलिस के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर रामचरन सिंह.

‘काली-पट्टी’ का सफेद-सच सामने होगा बशर्ते....

तमाम आईपीएस के ‘पुलिसिया-गुरु’ सिद्ध हो चुके दबंग पूर्व इंस्पेक्टर रामचरन सिंह के तल्ख अल्फाजों में ही, ‘विवेक तिवारी का कत्ल हुआ हो. उसके बाद आरोपी बर्खास्त सिपाही की बीवी के बैंक खाते में लाखों रुपए की चंदा उगाही. या फिर एक बर्खास्त सिपाही की तीमारदारी-तरफदारी में बाजू पर काली-पट्टी बांधना. यह सब के सब घिनौने औजार कानून की खुली मुखालफत करते हैं. इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदारी सूबे के मौजूदा पुलिस प्रमुख ओम प्रकाश सिंह को ले लेनी चाहिए. पुलिस महानिदेशक ईमानदारी से कदम उठा लें तो, दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. आईपीसी की धारा 166 और ‘29 पुलिस-एक्ट’, काली-पट्टी वाले पुलिसिया कारिंदे अपनी ही पुलिस से ‘पनाह’ मांग जाएंगे.’

अंत में लेखक की ओर से...जब साहब-शागिर्द दोनों शर्मा गए!

इसमें कोई दो-राय नहीं है कि भारत में मौजूद ‘29-पुलिस-एक्ट’. खाकी में ‘काली-पट्टी’ का ओछा खेल खेलने वालों के लिए उतना ही घातक है जितना, एके-47 राइफल से किसी अपराधी का आमना-सामना होना. यह अलग बात है कि इतने ‘पॉवरफुल’ एक्ट से, खाकी-वर्दी वाले ही अमूमन अनजान मिलते हैं. शायद इसलिए क्योंकि यही एक्ट उन्हें उद्दंडता के वक्त काबू करने की कानूनी ताकत रखता है. यह किस्सा है अक्टूबर सन् 2016 का. यूपी के सिद्धार्थनगर जिले के पुलिस अधीक्षक थे राकेश शंकर. एक दिन उन्होंने (एसपी) बसडिलिया आईटीआई परिसर में मातहत सिपाहियों को तलब कर लिया. साथ में सदर के सर्किल ऑफिसर (क्षेत्राधिकारी) मय पुलिस लाइन के रिजर्व इंस्पेक्टर (आरआई या प्रतिसार निरीक्षक) भी आ गए. कप्तान साहब ने सिपाहियों से पहले पूछा कि, ‘29-पुलिस-एक्ट’ क्या है? सिपाही बगलें झांकने लगे. लिहाजा एसपी ने मौके पर मौजूद जिला रिजर्व पुलिस लाइन प्रभारी इंस्पेक्टर की ओर झांका? वो भी बगलें झांकने लगे. अब सिपाही-इंस्पेक्टर और जिला पुलिस कप्तान के चेहरों का उतरा हुआ रंग देखने लायक था!

इस ‘संडे क्राइम स्पेशल’ में जरूर पढ़ें

‘कई साल से अदालतों में चल रही, रूला देने वाली पुलिस-वकीलों की जिरहों से भांप चुका था मैं कि, सर-ए-शाम भरे बाजार कत्ल के आरोप में मुझे, फांसी पर लटकाए जाने की सजा ही मुकर्रर होगी! सजा ऐलान होने वाले दिन से पहली पेशी पर ही मैंने, पत्नी को जिस दिन अदालत में न आने को कहा था, उसी दिन मुझे ‘सजा-ए-मौत’ सुना भी दी गई!’ सजायाफ्ता पूर्व मुजरिम की बेबाक मगर खौफनाक ‘मुंह-जुबानी’.’

(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं. आपके पास भी है अगर ऐसे ही किसी जाबांज की सच्ची कहानी. तो हमें लिख भेजिये संपर्क, नाम और पते के साथ इस ईमेल एड्रेस पर patrakar1111@gmail.com)

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