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जन्मदिन विशेष: निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री बनने की कहानी हैं मधु कोड़ा

क्या आप सोच सकते हैं कि किसी मंत्री की पत्नी, जिसके पास सत्ता सुख सहित हर ऐशो आराम उपलब्ध हो, वह अपने प्रेमी के साथ भाग सकती है? लेकिन गीता कोड़ा ने पल भर भी देरी नहीं की

Updated On: Jan 06, 2018 02:25 PM IST

Anand Dutta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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जन्मदिन विशेष: निर्दलीय विधायक से मुख्यमंत्री बनने की कहानी हैं मधु कोड़ा
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कोयला घोटाले में सुनवाई चल रही है. दिल्ली हाईकोर्ट ने झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को बड़ी राहत दी है. कोड़ा को कोयला घोटाला मामले में 3 साल की सजा हुई है. हाईकोर्ट ने स्पेशल सीबीआई ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर स्थगन लगा दिया है जिसमें उन्हें 3 साल की सजा सुनाई गई है. कोर्ट ने अगली सुनवाई तक जुर्माना भरने से भी मना कर दिया है.

इस बीच आम जनता के बीच एक घोटालेबाज सीएम की छवि उनकी बन चुकी है. लोग उन्हें उसी रूप में याद कर रहे हैं. लेकिन एक और चेहरा है निर्दलीय विधायक से सीधे सीएम बने मधु कोड़ा की. वह है उनकी प्रेम कहानी.

लोक कथाओं और हिंदू मान्यताओं के मुताबिक भगवान राम जब पत्नी अपनी सीता को लंका से लेकर आए तो उन्हें अपनाने से पहले अग्नि परीक्षा देने को कहा. जहां उनकी पवित्रता की परीक्षा ली गई.

यहां दृश्य थोड़ा अलग है, लेकिन मर्म एक. मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा शादी के कुछ माह बाद उनसे अलग रहने लगीं थी. वह अपने पुरुष मित्र के लिए मंत्री रहे मधु कोड़ा का साथ छोड़ चुकी थीं. लेकिन लगभग दो साल बाद गीता कोड़ा वापस मधु कोड़ा की पत्नी बनीं. हां, इसके लिए उन्हें किसी तरह की अग्नि परीक्षा नहीं देनी पड़ी.

ये है पूरी कहानी 

मधु कोड़ा की शादी साल 2005 में एक सामान्य 'हो' आदिवासी लड़की गीता बिरुली से हुई. उस वक्त वह अर्जुन मुंडा सरकार में खनन मंत्री बन चुके थे. जहां एक तरफ राजनीति में हर दिन वह एक कदम आगे बढ़ रहे थे, वहीं निजी जीवन की शुरूआत अच्छी नहीं रही. शादी के कुछ दिन बाद पती-पत्नी में अनबन हुई. गीता कोड़ा मंत्री आवास छोड़ अपने एक पुरुष मित्र, जो कि पेशे से इंजीनियर था, उसके साथ चली गईं.

क्या आप सोच सकते हैं कि किसी मंत्री की पत्नी, जिसके पास सत्ता सुख सहित हर ऐशो आराम उपलब्ध हो, वह अपने प्रेमी के साथ भाग सकती है? लेकिन गीता कोड़ा ने पल भर भी देरी नहीं की. बूटी रोड के शानदार से बने मंत्री आवास को लात मार, निकल गई अपने प्रेमी (मधु कोड़ा के अनुसार वह गीता का पुरुष मित्र था, प्रेमी नहीं) के साथ.

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रांची के एक स्थानीय पत्रकार के मुताबिक दोनों गीता और उनके पुरुष मित्र को रांची से सटे खूंटी में पुलिस ने पकड़ा था. लेकिन मंत्री जी ने इसमें दखल देना जरूरी नहीं समझा. वह अपनी पत्नी के मर्जी के खिलाफ कुछ भी नहीं करना चाहते थे. आप सोच सकते हैं, एक मंत्री जिसके पास पावर किसी भी आम जन से कहीं अधिक होता है, उसके लिए ऐसे मामलों से निपटना बाएं हाथ का खेल हो. लेकिन कोड़ा ने ऐसा नहीं किया.

इस बीच झारखंड में राजनीतिक घटनाक्रम फाइटर प्लेन की तरह कलाबाजियां खा रही थी. साल 2006 का सितंबर महीना था. राजनीतिक उलटफेर में फिट बैठते हुए मधु कोड़ा निर्दलीय विधायक रहते हुए झारखंड के मुख्यमंत्री बन चुके थे. लेकिन अब भी उनका व्यक्तिगत जीवन पटरी पर नहीं आ सका था. चौंकाने वाली बात ये है कि मधु कोड़ा और उनके कुछ करीबी मित्र गीता कोड़ा से संपर्क करते रहे. उन्हें मनाते रहे.

11 अक्टूबर, 2006 को टेलीग्राफ में छपी खबर के मुताबिक इस काम में सीएम मधु कोड़ा की मदद उस वक्त सीबीआई में डीएसपी रहे सुशील कुमार पुर्ती और चाईबासा की सामाजिक कार्यकर्ता राय मुनी कुंटिया करते रहे. इधर गीता का परिवार भी चाहता था कि वह मधु कोड़ा के पास चली जाए. भाई प्रदीप बिरुआ का कहना था कि अगर मधु चाहेंगे तो गीता को रांची भेज दिया जाएगा.

क्यों मधु कोड़ा के लिए आसान था गीता को फिर से अपनाना 

आदिवासी चिंतक और लेखक अश्विनी पंकज बताते हैं कि शादी और सेक्स को लेकर आदिवासी समजा कुंठाग्रस्त नहीं है. यहां जब पति-पत्नी अलग होते हैं तो इसे सामाजिक तौर पर बताया जाता है. पंचायत बैठती है. पंचों की उपस्थिति में पेड़ के पत्ते को फाड़ दिया जाता है. कुछ लोग व्यक्तिगत तौर पर भी इस प्रक्रिया को अपनाते हैं. खासकर संथाल बहुत क्षेत्र में.

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अलग होने के बाद भी कई बार मिल जाते हैं. कोड़ा के मामले में दोनों अलग नहीं हुए, एक ने छोड़ दिया. किसी ने सार्वजनिक घोषणा नहीं की. एके पंकज के मुताबिक इसके पीछे यौन शुचिता का मामला है. यौन शुचिता को लेकर इज्जत वाला मामला नहीं है. जब तक सहमति से हो रहा है, ऐसे में कोई गलत ख्याल वाला मामला नहीं है. यौन को पवित्रता से नहीं जोड़ा जाता है, पाप और अपराध से नहीं जोड़ा जाता है. हां, इसका मतलब ये नहीं समझा जाना चाहिए कि जब जिसका जिसके साथ मन करे, संबंध बना लेता है.

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इसलिए मधु कोड़ा के लिए आसान था. क्योंकि आदिवासी समाज में स्त्री को सेक्स टैबू के नजरिए से नहीं देखा जाता है. बेसिकली मामला आदिवासी समझ और दर्शन का है. लिव इन तो सबसे पहले था, हाल के कुछ वर्षों में शादी का प्रचलन आया है. बाहर के लोग मानते हैं कि आदिवासी लड़कियां फ्री हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. मानसिक तौर पर मिलना उनके लिए जरूरी है.

आप कल्पना कीजिए अगर इस तरह की घटना किसी अन्य राज्य के सीएम के साथ हुई होती तो प्रेमी-प्रेमिका का क्या हश्र हो सकता था. लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ. मधु कोड़ा सरकार चलाने के साथ व्यक्तिगत मामले भी समझदारी से सुलझाते रहे.

एकबारगी उनको पता चला कि उनकी पत्नी कहां है. खुद पहुंच गए मनाने. ये इतना आसान नहीं था. लगातार मनाने के बाद पत्नी वापस आने को राजी हुई. बावजूद इसके वह पूरे मन से मधु कोड़ा के साथ नहीं थी. यहां मधु कोड़ा एक सीएम की तरह नहीं, आम पति की तरह व्यवहार करते नजर आए. रुकिए, आम नहीं, भारतीय समाज में खास पुरुष की तरह व्यवहार करते नजर आए. जहां ऐसी पत्नियों को कुलटा, अभागी सहित जाने कितनी गालियां दे दी गई होती.

गलतफहमी की वजह से वह दूर गई थी, कोई प्रेम प्रसंग का मसला नहीं था 

वक्त का पहिया पलटा. दोनों एक हुए. फ़र्स्टपोस्ट के साथ बातचीत में मधु कोड़ा ने इस पूरे प्रसंग पर अपना पक्ष रखा. बकौल मधु कोड़ा गीता कहीं भागी नहीं थी. हमारी समझदारी गड़बड़ हुई थी. वह अपने मित्र के साथ गई थी, लोग जाना-आना करते हैं, घूमते हैं, मिलते-जुलते हैं. शुरूआत में जरूर मुझे इस पर आपत्ति हुई. ऐसे में हमारे बीच काफी कन्फ्यूजन हो गया. इधर मीडिया में भी भ्रामक खबरें छपने लगी.

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फिर मुझे लगा कि हमको उस तरीके से सोचना नहीं चाहिए. मिसअंडरस्टैंडिग में छपने लगा था. वैसी कहीं कोई बात नहीं थी. ये बात सही है कि हमारा समाज यही सोचता है कि एक पत्नी दूसरे के साथ ज्यादा आना-जाना न करे. लेकिन हम नए जेनरेशन के हैं. इस दौर में ऐसा सोचना हमारे लिए ठीक नहीं है. साल 2007 से हम दोबारा साथ हैं. अब सबकुछ बहुत अच्छा है. वह पूरी तरह स्वतंत्र हैं. पार्टी और घर को संभालती हैं. अपना निर्णय खुद लेती हैं. विधानसभा में मुखरता से अपनी बात रखती हैं.

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साल 2008 आते-आते मधु कोड़ा के ऊपर 4 हजार करोड़ रुपए के कोयला घोटाले में शामिल होने के आरोप लगे. उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. अब असली परीक्षा की घड़ी गीता कोड़ा के सामने आई. लेकिन वह भी मधु कोड़ा से सीख चुकी थीं, मुश्किल घड़ी में अपनों का साथ कैसे दिया जाता है. मामला अभी कोर्ट में है. इधर खुद को राजनीति में बनाए रखने के लिए नई पार्टी 'जय भारत समानता पार्टी' बना ली.

पत्नी को उसके टिकट पर लड़वाया. वह जीत भी गईं. फिलहाल वो पश्चिमी सिंहभूम के जगन्नाथपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं. 26 साल की उम्र में पहली बार विधायक बनीं. झारखंड विधानसभा में सत्र के दौरान मुखरता से मुद्दे को उठाने के लिए जानी जाती हैं. इधर मधु कोड़ा कानूनी पेंच से लड़ते हुए खेती-बाड़ी में लगे रहते हैं. आए दिन हल चलाते हुए उनकी फोटो देश के कई अखबारों, वेबसाइटों पर छपती रहती है.

ऐसे बने थे मधु कोड़ा सीएम 

मधु कोड़ा के सीएम बनने की कहानी भी पूरी तरह पॉलिटिकल गिमिक्स की तरह ही है. पॉलिटिकल बीट कवर कर रहे पत्रकार यह बखूबी जानते हैं कि उनके लिए एयरपोर्ट कितना महत्वपूर्ण होता है. उस वक्त हिन्दुस्तान अखबार में संवाददाता रहे हरिंद्र तिवारी कहते हैं कि जब भी एयरपोर्ट पर कोड़ा मिलते, बोलते थे कि खान विभाग का रिव्यू मिटिंग है, इसलिए दिल्ली जा रहे हैं. ये बात सन 2005 की है. वह हर दो से तीन दिन पर दिल्ली वाली फ्लाइट पकड़ रहे थे.

एक दिन मैंने पूछ दिया कि महीना में एक बार रिव्यू मीटिंग होता है, आप तो हर दिन जा रहे हैं. ऐसे ही एक दिन उन्होंने कह दिया कि आपको बड़ी खबर मिलेगी. सरकार पलटने जा रही है. चार दिन बाद ही खबर आ गई कि सरकार पलट गई. दरअसल वह उस वक्त कांग्रेस के बड़े नेता और वर्तमान में आरजेडी के राज्यसभा सांसद प्रेमचंद गुप्ता के रिसॉर्ट में मीटिंग करने जाते थे. जहां कांग्रेस के बड़े नेता और कुछ उद्योगपति होते थे.

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14 सितंबर, 2006 को वो मुख्यमंत्री बने. एक बार फिर झारखंड की राजनीति पलटी मार चुकी थी. 23 अगस्त, 2008 को उन्हें सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा. मधु कोड़ा से पहले विश्वनाथ दास (1971, ओडिशा) और एसएफ खोंगलाम (2002, मेघालय) के निर्दलीय विधायक थे, जिन्हें सीएम बनाया गया था.

फ़र्स्टपोस्ट के एक सवाल पर कि क्या आपके पास घोटाले का पैसा है? कोड़ा कहते हैं- हम आज भी कह रहे हैं कि मेरे पास पैसे नहीं हैं. किसी ने मेरे नाम को मिसयूज किया और पैसा बना लिया. अगर किसी ने कमा लिया तो उसकी जिम्मेवारी हमारी नहीं है. कानूनी लड़ाई लड़ रहा हूं, खेती कर रहा हूं.

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