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जन्मदिन विशेष: फिल्म इंडस्ट्री के हर गायक को क्यों होना चाहिए लता जी का शुक्रगुजार

लता मंगेशकर के जन्मदिन पर खास

Updated On: Sep 28, 2018 08:38 AM IST

FP Staff

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जन्मदिन विशेष: फिल्म इंडस्ट्री के हर गायक को क्यों होना चाहिए लता जी का शुक्रगुजार

लता मंगेशकर शुक्रवार को 89 बरस की हो गईं. ईश्वर के आशीर्वाद से वो स्वस्थ हैं और सक्रिय भी. ‘प्लेबैक सिंगिंग’ उन्होंने भले ही छोड़ दी है लेकिन सोशल मीडिया में लता जी खासी सक्रिय रहती हैं. वो बड़ी विनम्रता से गुजरे जमाने के उन कलाकारों को याद करती हैं जो अब इस दुनिया में नहीं रहे. कई नए कलाकारों को जन्मदिन पर बधाई देती हैं.

कई बार क्रिकेट के खेल को लेकर ट्वीट करती हैं. तमाम त्योहारों पर शुभकामनाएं देना भी वो नहीं भूलती. इन सारी बातों में लता जी बेहद विनम्र दिखती हैं. उनकी बातों में सहजता झलकती है. विनम्रता झलकती है. उनके इस स्वभाव को जानने के बाद ये यकीन कर पाना मुश्किल होता है कि लता जी ने कभी नाराजगी दिखाई होगी, किसी बात का विरोध किया होगा. जरूरत पड़ने पर विद्रोह भी किया होगा, लेकिन सच यही है कि लता मंगेशकर ने जरूरत पड़ने पर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी बात बड़ी मजबूती से रखी.

बेहद मीठी आवाज में गाने वाली लता मंगेशकर ने अपने अधिकारों के लिए विरोध के कड़े सुर भी लगाए. जिसके लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में शामिल सभी प्लेबैक गायकों को उनका आभार व्यक्त करना चाहिए. ये कहानी आज से कोई 6 दशक पुरानी है.

दरअसल, ये कहानी फिल्मफेयर अवॉर्ड से जुड़ी हुई है. फिल्मफेयर अवॉर्ड आज हिंदी फिल्मी दुनिया का बेहद प्रतिष्ठित सम्मान है. फिल्मफेयर अवॉर्ड देने की शुरुआत 1954 में हुई थी. इसी साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की भी शुरुआत हुई थी. 1954 में जब फिल्मफेयर अवॉर्ड शुरू हुए तो सिर्फ पांच कैटेगरी में पुरस्कार दिए गए. सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और सर्वश्रेष्ठ संगीतकार. 1954 में दो बीघा जमीन को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, बिमल रॉय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, दिलीप कुमार को फिल्म दाग के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, मीना कुमारी को बैजू बावरा के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री और नौशाद को बैजू बावरा के लिए ही सर्वश्रेष्ठ संगीतकार चुना गया था.

असली कहानी हुई 1957 में. 1957 में फिल्म ‘चोरी चोरी’ के लिए संगीतकार शंकर जयकिशन को फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए चुना गया. जिस गाने के लिए उन्हें ये अवॉर्ड दिया जा रहा था वो गाना था- ‘रसिक बलमा’. आपको बताते चलें कि ये वही गाना था जो जाने माने निर्देशक महबूब खां अपनी बीमारी के दिनों में लॉस एंजेल्स में लता जी से फोन पर सुनते थे. खैर, अवॉर्ड सेरेमनी से पहले जयकिशन ने लता मंगेशकर से एक गुजारिश की. उन्होंने लता जी से कहा कि वो अवॉर्ड सेरेमनी में ‘रसिक बलमा’ गाना गा दें. लता जी को अपना विरोध दर्ज कराना था. उन्होंने ये कहकर गाने से इंकार कर दिया कि फिल्मफेयर अवॉर्ड गाने के संगीतकार को मिल रहा है ना कि गायक को इसलिए वो ये गाना कार्यक्रम के दौरान नहीं गाएंगी.

उन्होंने कहा कि अगर आप लोग चाहें तो ‘सेरेमनी’ में गाने की धुन बजा लें. इस बात को लेकर शंकर जयकिशन और लता जी में मनमुटाव भी हुआ. बाद में ये बात कार्यक्रम के आयोजकों तक पहुंची तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. लता जी की बात बिल्कुल सही थी, लिहाजा अगले साल से ‘प्लेबैक सिंगर्स’ को भी फिल्मफेयर अवॉर्ड दिया जाने लगा.

दिलचस्प कहानी ये भी है कि 1959 में जब पहली बार किसी गायक को फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए चुना गया तो वो कोई और नहीं इस अवॉर्ड में गायकों की लड़ाई लड़ने वाली लता मंगेशकर ही थीं. वो गाना था- आजा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी इस पार. ये गाना 1958 में आई फिल्म मधुमती का है. इस फिल्म का निर्देशन बिमल रॉय ने किया था. ऋत्विक घटक और राजिंदर सिंह बेदी की लिखी इस फिल्म में दिलीप कुमार और वैजयंती माला थे. फिल्म के लिए गीत शैलेंद्र ने लिखे थे.

कहा जाता है कि इस फिल्म के लिए बिमल रॉय एसडी बर्मन को बतौर संगीतकार लेना चाहते थे लेकिन बर्मन दादा ने खुद ही इसके लिए सलिल चौधरी का नाम सुझाया था. इस फिल्म को जबरदस्त कामयाबी मिली. फिल्म में दस से ज्यादा गाने थे. जिसमें से ‘आजा रे परदेसी मैं तो कब से खड़ी इस पार’ के लिए लता मंगेशकर को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. कहानी में अब भी एक पेंच था. दरअसल, आयोजकों ने 1959 में फिल्मफेयर अवॉर्ड की ‘ज्यूरी’ बनाई तो उसमें ‘प्लेबैक सिंगर’ के लिए भी नाम चुने जाने को कहा. हालांकि इसके बाद अगले 8 साल तक यानी 1967 तक इस ‘कैटेगरी’ में ‘अवॉर्ड’ तो मिलते थे लेकिन ‘मेल’ और ‘फीमेल’ सिंगर को अलग-अलग नहीं बल्कि किसी एक प्लेबैक सिंगर को ही चुना जाता था. 1967 से ये बदलाव हुआ जब इस ‘अवॉर्ड’ के लिए ‘मेल’ और ‘फीमेल सिंगर’ को अलग-अलग चुना जाने लगा.

लता मंगेशकर ने बतौर प्लेबैक सिंगर अपने लंबे करियर में चार बार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता. जिसमें मधुमती के आजा रे परदेसी के अलावा, कहीं दीप जले कहीं दिल (फिल्म-बीस साल बाद), तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा (फिल्म-खानदान) और आप मुझे अच्छे लगने लगे (फिल्म-जीने की राह) के लिए सम्मानित किया गया. इसके अलावा 1993 में लता जी को फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था.

इसके अलावा 1994 में उन्हें फिल्म हम आपके हैं कौन के बेहद लोकप्रिय हुए गाने दीदी तेरा देवर दीवाना के लिए स्पेशल फिल्मफेयर अवॉर्ड भी दिया गया था. यूं तो लता जी सम्मानों के शिखर पर हैं. उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया है लेकिन ये सच है कि अगर उन्होंने आवाज ना उठाई होती तो शायद किसी और ने इस पर ध्यान भी नहीं दिया होता. साथ ही संगीतकारों के सामने अपनी बात इतनी मजबूती से कहने की हिम्मत भी शायद हर किसी में नहीं थी.

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