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गाने तो बहुत सुने, क्या आपको पता है लताजी को खाने में क्या पसंद है?

लता जी दुनिया भर के जायके की खाने और खिलाने दोनों की शौकीन हैं. उनकी पसंद की लिस्ट हमेशा बड़ी होती रहती है.

Updated On: Sep 28, 2017 10:59 AM IST

Yatindra Mishra

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गाने तो बहुत सुने, क्या आपको पता है लताजी को खाने में क्या पसंद है?

लता जी की एक खूबी रही है कि उनसे जब भी आप पसंद और नापसंद की चीजों का हिसाब करने बैठें, तो पसंद की सूची कुछ अलग और बड़ी हो जाती है. अब इसमें यह तय कर पाना दिक्कत वाला काम है कि हम किसी एक चीज को कैसे उनकी निगाहों से सर्वश्रेष्ठ के मानक पर उतरता हुआ देखें.

कई बार बातों के सिलसिले में यादों के कई ऐसे सुनहरे पन्ने खुलते जाते हैं, जिसकी अनुभवी सरहद पर जितना उनका मन फिसलता है, उससे अधिक सुनने वाले का रमने लगता है. आप पसंद का एक गाना पूछें, तो कई गानों की लड़ियां पिरोई सामने आ जाती हैं. कभी उनका ध्यान गानों से हटाकर खाने की प्रिय वस्तुओं की ओर ले जाएं, तो आश्चर्यजनक ढंग से आप एक कुकरी बुक ही तैयार कर सकते हैं, अगर वे मूड में हों और भारत के अलग-अलग शहरों के मशहूर जायके बता रही हों. जैसे कभी उनसे यह सुनना सुखद लगता है कि उन्हें जलेबी कुछ ज्यादा ही पसंद है, अगर वह कड़क हो और बहुत केसर के साथ परोसी जाए.

खाने के साथ खिलाने का भी शौक

एक जमाने में उन्हें इंदौर का गुलाब जामुन और दही बड़े भाते थे और गोवन फिश करी और समुद्री झींगे उनके जायके की कमजोरी रहे हैं. लता जी के बारे में यह सुनना भी अच्छा लगता है कि वे एक कुशल गृहिणी हैं. गृहिणी के रूप में भी उनका स्वरूप एक अच्छे मेजबान और रसोइए के रूप में देखा जा सकता है. वो सूजी का हलवा उम्दा बनाती हैं. उनके हाथ का चिकन पसंदा जिसने भी खाया है, वह जल्दी भूल नहीं पाता. वो समोसे की शौकीन हैं, मगर जरा ठहरिए, भारत में प्रचलित आलू और मटर वाले समोसे नहीं, कीमा भरे समोसे, जो मोमो जैसे होते हैं.

उन्हें याद है कि शुरुआती दिनों में, जब साठ का दशक रहा होगा, वे मैरीन ड्राइव पर मौजूद गेलॉर्ड रेस्टोरेंट में अक्सर दोपहर का खाना खाने चली जाती थीं. संगीतकार जयकिशन का भी यह सबसे प्रिय रेस्टोरेंट था. अक्सर राज कपूर की फिल्मों के गीतों के बनने की लंबी और थकाऊ प्रक्रिया के बाद गेलॉर्ड का शांत और मनोहारी वातावरण लता मंगेशकर का प्रिय आरामघर बन जाया करता था.

दुश्मन हैं सब्जियां

लता मंगेशकर कभी बहुत तीखा भी खाती थीं, विशेषकर कोल्हापुर में प्रचलित तीखी मिर्ची वाले स्वाद का खाना. उन्हें पानी पूरी पसंद है. उन्हें नींबू और कैरी का अचार पसंद है. उन्हें मिठाई में शाही टुकड़ा बेहद लाजवाब लगता है और अक्सर ज्वार की रोटी उनकी थाली में शामिल रहती है. मैक्सिकन, चाइनीज और फ्रेंच व्यंजनों की शौकीन हमारी सुर-साम्राज्ञी को इटैलियन खाना कम पसंद है और सबसे मजेदार बात यह कि वे सब्जियों की दुश्मन हैं. उन्हें सब्जी देखते ही न जाने क्या होने लगता है. यह अलग बात है कि अक्सर सब्जियां भी इसलिए खाती हैं कि वे जरूरी हैं. डॉक्टरों की सख्त हिदायत है कि विटामिन से भरी इन सब्जियों को उन्हें खाते रहना है. लगता है जैसे उनके सुर संसार में सब्जियों का प्रवेश रागदानी में विकृत स्वर की तरह मौजूद है.

सुरों की देवी से इतर लताजी के दुख

उनसे इस तरह मिलना कि वे हमें अपने घर की मां और मौसी सरीखी लगें, भला लगता है. मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी यह रहा है कि लता मंगेशकर को एक महान पार्श्वगायिका के धरातल से अलग हटकर देखने पर उनमें एक ऐसी मानवीय स्त्री छवि के दर्शन होते हैं, जो बेहद अपनी सी लगती हैं. फिर उनके साथ यह भाव मिट जाता है कि आप एक ऐसी शख्सियत से मिल रहे हैं, जिसका जीवन इतना बड़ा और कलाओं की दुनिया में शिखर पर प्रतिष्ठित है. वे भी इस बात से कई बार परेशान नजर आती हैं, जब लोग उनसे हमेशा उसी सौंदर्य की उम्मीद पाले रहते हैं, जो उन्होंने अपने हुनर से सृजित की है.

Front Cove Final  Latajir(17Sept)

‘आप ही बताइए यतींद्र जी, आखिरकार मैं भी एक इंसान हूं. हर समय उस रूप में नहीं रह सकती हूं, जिस रूप में हमेशा मुझे लोग देखते आए हैं. न ही हर समय सुर में बंधे हुए कोई गीत गुनगुना सकती हूं. मुझे भी तकलीफ होती है. मेरे पेट में भी अक्सर दर्द होता है. सिर दुखता है और उस समय सिर पर तेल चुपड़ने के अलावा कुछ नहीं सूझता है. कई दफा तो साइनस की अपनी पुरानी समस्या से परेशान हो जाती हूं. कई बार मेरा भी किसी से बात करने का मन नहीं होता और अक्सर तो यह भी मन करता है कि ऐसे ही बोर होने पर कहीं सड़कों पर घूमने निकल जाऊं, जैसे पहले बंबई में अपने संघर्ष के दिनों में करती थी.’

यह लता मंगेशकर के मन की वो बातें हैं, जिसे पिछले कुछ वर्षों में मैंने उनके साथ कुछ बेहद अच्छे पल साझा करते हुए सुनी और महसूस की हैं. यह उस स्त्री की सहज बतकही है, जिसमें किसी भी तरह शंकर-जयकिशन या मदन मोहन की कोई धुन काम नहीं आती. न ही राज कपूर, विजय आनंद और यश चोपड़ा सरीखे बड़े निर्देशकों की मित्रताएं उन पलों को आसान बनाती हैं, न ही उनके बेहद करीब रहे पारिवारिक मित्र डूंगरपुर के महाराज राजसिंह डूंगरपुर और कनाडा में बसी एकमात्र सबसे करीबी मित्र नलिनी म्हात्रे की सोहबत काम देती है.

कुछ लोगों की संगत ही है इलाज

इन पलों में तो घर के सदस्यों और मीना दीदी, आशा जी और भाई हृदयनाथ के बच्चों की रहवारी ही कुछ असर करती है. ऐसे में उनकी भांची रजना और भतीजे आदिनाथ और बैजनाथ दीदी के लिए दवा का काम करते हैं. अलग से उनके सचिव महेश राठौर, दीदी के उन आत्मीय लोगों में से हैं, जिनकी सोहबत में मन का कष्ट कुछ कम हो जाता है.

कहने का भाव यह कि कभी हमारे आपके जैसे तमाम चाहने वालों और श्रद्धा के स्तर तक उनके फन के प्रति समर्पित श्रोताओं को भी इस बात की तह तक जाने का मौका ही नहीं मिलता कि जिस लता मंगेशकर की आवाज को सुनकर उनकी पीड़ा कम होती रही है, उस स्त्री के अंदर पनपने वाले कष्टों को कम करने का कोई भी जतन हमारे पास नहीं है. हम भले ही उनके भजनों, गजलों और फिल्म गीतों में डूबकर अपना सुख तलाश लें, मगर उनके लिए यह सब बेमानी है. जिंदगी की आपा-धापी के बीच कई बार वे यह सहज ही कह डालती हैं कि आज बात करना रहने दीजिए, तबीयत ठीक नहीं है. ऐसे में मेरे जैसे उनके लाखों प्रशंसक यह सोचकर थोड़ा निराश हो जाते हैं कि अब क्या करें?

दीदी की तबीयत और मूड को ठीक करने का कोई उपाय नहीं है हमारे पास. उनको खुश करने या तसल्ली देने के सारे रास्ते बंद और अपनी सबसे प्यारी लता दीदी के लिए हमारे पास हुनर का कोई झुनझुना भी तो नहीं है.

(यह लेख यतींद्र मिश्र की पुस्तक लता सुर-गाथा का एक अंश है. यह पुस्तक वाणी प्रकाशन की ओर से प्रकाशित की गई है. पुस्तक और लेखक को इस वर्ष फिल्म लेखन के लिए राष्ट्रीय सम्मान 'स्वर्ण कमल' से नवाजा गया है.)

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