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पीरियड्स: कम से कम नाम तो लीजिए, नाम में क्या रखा है!

आज भी दुकानदार सैनिट्री पैड एेसे थमाते हैं मानों आरडीएक्स हो

Pratima Sharma Pratima Sharma Updated On: Jul 20, 2017 09:29 PM IST

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पीरियड्स: कम से कम नाम तो लीजिए, नाम में क्या रखा है!

पीरियड्स! अरे ये लिखने की क्या जरूरत पड़ गई. क्या इसपर अब हमें बात भी करनी होगी. एक मुद्दा जो कल तक छिपाने की चीज थी, आज बहस का मुद्दा कैसे बन गया. क्या समाज बदल रहा है?  ऐसा लग रहा है कि पिछले कुछ समय से समाज कम से कम बदलने की कोशिश तो जरूर कर रहा है.

हिचकिचाहट तो छोड़ना ही होगा

जीएसटी लागू होने के बाद जब सैनिटरी पैड पर 12 फीसदी जीएसटी लगाया गया तो इस मुद्दे पर पहली बार ‘लोगों’ ने बात करना शुरू किया. ‘लहू का लगान’ नाम से मुहिम छिड़ी और ‘फुल्लू’ फिल्म भी बनी. तो क्या घर-घर में छिपाकर रखने वाला, ऑफिस में फुसफुसाकर मांगा जाने वाला सैनिटरी पैड पर क्या आदमी-औरत खुलकर बात करने की हिम्मत कर सकते हैं.

इस सवाल का जवाब मैं दूं, उससे बेहतर है कि आप यह सवाल खुद से पूछें. अगर आप पुरुष हैं तो आप अपने दिल से पूछिए कि क्या ऑफिस में आपकी कोई दोस्त आपसे यह कहती है, ‘यार पीरियड्स में हूं...आज मूड कुछ ठीक नहीं है.’ इस सवाल के जवाब से ही आपको पता चल जाएगा कि पीरियड्स और सैनिट्री पैड के मुद्दे पर समाज कितना ‘खुला’ है.

बीमारी या पाप नहीं है पीरियड्स

भारतीय परंपरा में पीरियड्स को किसी ‘बीमारी’ या ‘पाप’ की तरह देखा जाता है. हमारे समाज में ‘पीरियड्स’ या ‘माहवारी’ शब्द बोलने से भी महिलाएं हिचकते हैं. क्योंकि उन्हें बचपन से पीरियड्स के बदले सांकेतिक शब्दों का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है.

कुछ ऐसे ही सांकेतिक शब्द हैं ‘हैपी बर्थ डे’. ‘आंटी जी’, ‘एमसी’ ‘ब्रेड जैम’ ‘गुरुदेव’ ‘डाउन’.... इन शब्दों को किस तरह गढ़ा गया है यह बताना मुश्किल है. लेकिन इतना तो तय है कि पीरियड्स बोलने की हिचक आज भी कम नहीं हुई है.

सैनिट्री पैड है या आरडीएक्स?

पीरियड्स और सैनिट्री पैड को लेकर पूरा समाज एक ‘संस्कारी चेन’ में बंधा है. दुकानदार हर तरह का सैनिट्री पैड ग्लास की आलमारी में कुछ इस तरह सजा कर रखते हैं कि महिलाओं की सीधी नजर उस पर पड़े. लड़की दुकान में आती है और इस बात का इंतजार करती है कि काउंटर से लोग कुछ कम हों. लोग कम होते ही वह सैनिट्री नैपकिन की तरफ इशारा करती है. किसी ने बहुत हिम्मत दिखाई तो किसी खास ब्रांड का नाम ले लेगी. दुकानदार बड़ी तन्मयता से सैनिट्री पैड को पेपर या काले रंग के पॉलिथिन में लपेटता है और ऐसे देता है मानों आरडीएक्स हो.

पार्टी अभी बाकी है

समाज का एक तबका भले ही सैनिट्री और स्वच्छता के मुद्दे पर बात कर रहा है लेकिन यह सिर्फ शुरुआत है. पीरियड्स की बहस को केरल के मातृभूमि ग्रुप ने एक नई दिशा दी है.

इस ग्रुप ने महिलाओं को पीरियड्स के पहले दिन छुट्टी देने का ऐलान किया है. पीरियड्स के पहले दिन छुट्टी से महिलाओं को सहूलियत मिलेगी या उनकी कमजोरी दिखेगी. यह बहस का एक नया मुद्दा है, जो आप हमारे फेसबुक लाइव में देख सकते हैं.

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