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पढ़िए कुंवर नारायण की नजर में सत्यजीत रे का सिनेमा

90 साल के कुंवर नारायण को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था

FP Staff Updated On: Nov 15, 2017 04:33 PM IST

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पढ़िए कुंवर नारायण की नजर में सत्यजीत रे का सिनेमा

हिंदी के प्रख्यात कवि और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण का 15 नवंबर 2017 को निधन हो गया. वह 90 वर्ष के थे. साहित्य में योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था.

9 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जन्में कुंवर नारायण ने कविता के अलावा कहानी एवं आलोचना विधाओं में लिखा. उनके कविता संग्रह में चक्रव्यूह, परिवेश: हम तुम, आत्मजयी, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, वाजश्रवा के बहाने, हाशिये का गवाह प्रमुख हैं. अज्ञेय द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों में कुंवर नारायण भी शामिल थे.

‘‘आकारों के आसपास’’ नाम से उनका कहानी संग्रह भी आया था. ‘आज और आज से पहले’ उनका आलोचना ग्रन्थ है. उनकी रचनाओं का इतालवी, फ्रेंच, पोलिश सहित विभिन्न विदेशी भाषाओं में किया जा चुका है.

उनकी किताब लेखक का सिनेमा राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. राजकमल प्रकाशन की अनुमति से हम आपको इस किताब में सत्यजीत रे पर लिखा कुंवर नारायण का एक अंश पढ़वा रहे हैं.

 

शीर्षक : लेखक का सिनेमा

लेखक : कुँवर नारायण

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन


सत्यजित राय: एक संस्मरण

मेरे लिए सत्यजित राय को उनके कामों के द्वारा जानना इस युग के अत्यंत प्रतिभा-सम्पंन, कुशल और संवेदनशील फिल्‍मकार को जानना थ. उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर निकट से जानना एक बहुत ही उदार, सुहृद, स्नेही और सुसंस्कृत इंसान को जानना था.

उनसे मेरी पहली भेंट लखनऊ में हुई, जब वे 'शतरंज के खिलाड़ी’ के फिल्मांकन के सिलसिले में यहां आए हुए थे. उनके अत्यंत व्यस्त कार्यक्रम के बावजूद मुझे बातचीत का काफी मौका उनकी ओर से मिलता रहता था. कभी-कभी मुझे संकोच भी होता कि मेरे कारण कहीं उनका जरूरी समय मेरे साथ बातचीत करने में नाहक नष्ट तो नहीं हो रहा, पर बहुत ही सहज और स्नेहपूर्ण ढंग से वह मुझे आश्वस्त कर देते कि यह बातचीत भी उनके लिए जरूरी है.

पुरानी लखनवी संस्कृति के प्रति उनके मन में भावुक लगाव था. इस तरह के लगाव का एक दूसरा रूप हम उनकी 'जलसाघर’ फि़ल्‍म में देखते हैं. पुराने लखनऊ के गली-कूचों में उनके साथ घूमते हुए मैंने कई बार अनुभव किया कि वे एक गुजि़श्ता लखनऊ को सिर्फ फि़ल्‍मकार की निगाहों से नहीं देख रहे थे, एक साहित्यकार और कवि की संवेदनशीलता से भी देख रहे थे. इतिहास और साहित्य के वह मर्मज्ञ पाठक थे, जिसने उनकी फि़ल्‍म-कला को एक अतिरिक्त आयाम दिया है. मुझे आश्चर्य तब होता, जब वह फ्रांकफुर्त स्कूल के विचार, बेन्यामिन या एडॉर्नो पर भी उतनी ही गहराई से बातचीत करते, जितनी गहराई से किसी फि़ल्‍म, संगीत या साहित्य पर.

लखनऊ के बाद भी उनसे कई मुलाकातें हुईं, आम तौर पर फि़ल्‍म समारोहों में

कभी-कभी उनके साथ भी फि़ल्‍म देखने का मौका मिला. तारकोव्स्की की 'सैक्रीफाइस’ ऐसी ही एक फि़ल्‍म थी. फि़ल्‍म के बाद फि़ल्‍म पर बातचीत का एक अलग ही लाभ होता था.

अपनी विभिन्न प्रकार की व्यस्तताओं के बावजूद वे पत्रों का उत्तर देने के मामले में अत्यन्त सतर्क थे. बीमारी के दिनों में भी वे हाथ से ही पत्र लिखते थे और अंत तक उनकी लिखावट आश्चर्यजनक रूप से दृढ़ और सधी हुई थी. मृत्यु से कुछ ही समय पहले लिखा उनका एक पत्र इस बात का प्रमाण है कि अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने पत्र लिखना कभी गैर-जरूरी नहीं समझा. आज थोड़ी शर्मिन्दगी भी महसूस होती है कि उनकी उस उदारता का पूरा लाभ नहीं उठा सका और उत्तर देने में मेरी ओर से अक्षम्य चूक होती रही. कुछ तो मेरे मन में उनके स्वास्थ्य और व्यस्त समय दोनों को लेकर यह संकोच भी रहता था कि उन पर उत्तर देने का अतिरिक्त बोझ न पड़े, लेकिन यह सही है कि यदि पत्र लिखने में मेरी ओर से अधिक तत्परता रहती, तो निश्चय ही हमारे पास आज एक अमूल्य धरोहर होती.

साहित्य पर भी मानिक दा की पकड़ उतनी ही पक्की और संवेदनशील थी जितनी सिनेमा पर

उनका सिनेमा साहित्य के साथ इस अंतरंग विनिमय का अनोखा दस्तावेज़ है. हमारे बीच भी संवाद का जो दुर्लभ संबंध बन सका, उसका पूरा श्रेय मानिक दा को है, जिन्होंने इस सम्बन्ध को महत्व दिया. उस अमूल्य समय को आज मैं बहुत ही स्नेह और आदर से याद करता हूँ, जो वे उदारतापूर्वक मुझे देते रहे, खासकर उन लम्बी, विविध और बहुत ही रोचक बातचीतों को, जो लखनऊ में अक्सर मेरे घर पर होती थीं.

'शतरंज के खिलाड़ी’ की शूटिंग के दौरान अक्सर उनके साथ साइट पर या डबिंग के समय भी उनके साथ रहूं, इसका पूरा अवसर वे देते थे. एक दिलचस्प प्रसंग याद है, जिसका संदर्भ उनके पत्र में भी है. क्लार्क्स होटल में सईद जाफरी ने जोर दिया कि डबिंग के दौरान उनके और मानिक दा के अलावा कमरे में और कोई न रहे. कुछ लोगों के साथ मैं भी कमरे से बाहर आ गया. मानिक दा को यह अच्छा नहीं लगा। कलकत्ता पहुंचकर उन्होंने मुझे एक पत्र लिखा, जिसमें इस प्रसंग पर अपना क्षोभ प्रकट किया. बहुत ही साधारण सी घटना थी पर साहित्य को लेकर तथा दूसरों के प्रति, उनके मन में जैसा आदर-भाव था, वैसा मैंने कम ही लोगों में पाया है. उनकी फि़ल्‍मों को याद करें, तो हम एक ऐसी विनम्र मानव-संस्कृति के सम्मुख होते हैं, जिसके वह स्वयं एक जीता-जागता स्रोत और सार थे. सहानुभूति (सिम्पैथी) और समानुभूति (एम्पैथी) उनके व्यक्तित्व का सहज गुण था. जिस निरंतर संवेदनशीलता को हम उनकी फि़ल्‍मों में प्रवाहित देखते हैं, उसके साकार उत्स को इतने निकट से जानना मेरे जीवन का एक विरल अनुभव था.

'शतरंज के खिलाड़ी’ के फि़ल्‍म रूपांतरण तथा प्रेमचन्द की कहानी में किए गए परिवर्तनों को लेकर मैं उनसे बहुत सहमत न था, इसे वे भली-भांति जानते थे. इस पर उनसे कई बार बातें भी हुईं.

लखनऊ की नवाबी जमानों की पुरानी रौनक को वह इस फि़ल्‍म में दर्शाना चाहते थे -रंगों, लिबासों, जगहों, संगीत, नृत्य आदि के चित्रण द्वारा. मेरे मन में उनके 'जलसाघर’ की सादगी की छवि प्रमुख थी. मैं नहीं सोचता था कि 'शतरंज के खिलाड़ी’ प्रेमचंद की कहानी के मिजाज के अनुकूल ठहरेगी. इस बात को वह भी समझ रहे थे, पर तब तक फि़ल्‍म इतना आगे बढ़ चुकी थी कि उसमें आमूल कोई फेरबदल करना सम्भव नहीं था. अपने एक पत्र (5-5-78) में मानिक दा ने 'शतरंज के खिलाड़ी’ पर अपनी जो बेबाक प्रतिक्रिया व्यक्त की है, वह आत्मालोचना का एक अद्भुत उदाहरण है. 'सद्गति’ में हम एक बार फिर उन्हें 'जलसाघर’ की सादगी की ओर लौटते देखते हैं और मेरे विचार से एक ज़्यादा प्रामाणिक प्रेमचन्द की ओर भी. निर्भीक आत्मालोचना के बिना अच्छा कलाकार तो क्या, अच्छा इंसान भी बन पाना मुश्किल है, इस अनुभूति के लिए उनके प्रति हृदय से कृतज्ञ अनुभव करता हूँ.

उनका क्रिसमस 1991 का पत्र जितना संक्षिप्त है, उतना ही मर्मस्पर्शी भी. अपने काम के प्रति पूर्ण आस्था, प्यार और समर्पण का अविस्मरणीय उदाहरण, 'बस, इतनी शक्ति चाहता हूँ कि प्रतिवर्ष एक फि़ल्‍म बना सकूँ.’ यह एक अद्भुत सन्देश भी है. मेरे पास यह उनका अन्तिम पत्र है. इसके बाद वह गम्भीर रूप से बीमार हो गए थे और दुर्भाग्यवश अप्रैल 1992 में उनका निधन हो गया.

उनके पत्र भी उनके आत्मान्वेषण और जिजीविषा का जो आभास देते हैं, वह सिर्फ उन्हें और उनकी फि़ल्‍मों को ही नहीं, हमें खुद को समझने में भी दूर तक मदद कर सकते हैं.

सत्यजित राय आज हमारे बीच में नहीं हैं, पर अपनी फि़ल्‍मों का जो बड़ा संसार उन्होंने धरोहर के रूप में हमारे लिए छोड़ा है, वह अभूतपूर्व है. उनके काम करने के तरीके में जो एक गहरी लगन, सौष्ठव, संयम और सलीका था, वह अपने आप में एक बड़ी शिक्षा थी.

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