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कुलदीप नैयर: जिन्होंने इमरजेंसी में झुकने की बजाए तिहाड़ में मरी हुई मक्खियों वाली दाल खाना ठीक समझा

अपनी पीढ़ी के बचे इकलौते पत्रकार जो भारत की गुलामी और उसकी आजादी के गवाह थे, अब नहीं रहे

Updated On: Aug 23, 2018 05:30 PM IST

Kumari Prerna

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कुलदीप नैयर: जिन्होंने इमरजेंसी में झुकने की बजाए तिहाड़ में मरी हुई मक्खियों वाली दाल खाना ठीक समझा
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कुलदीप नैयर, अपनी पीढ़ी के बचे शायद इकलौते पत्रकार जो भारत की गुलामी और उसकी आजादी के गवाह थे, अब नहीं रहे. 95 वर्ष की उम्र में भी अखबारों और किताबों से घिरा रहने वाला शख्स बुधवार को दिल्ली के एक अस्पताल में गुजर गया और उसके साथ ही गुजर गया पत्रकारिता जगत का ऐसा तारा, जिसकी चमक उम्र के बढ़ते हर पायदान पर लगातार बढ़ती चली गई.

बीती रात करीब साढ़े 12 बजे दिल्ली के एक अस्पताल में नैयर ने अंतिम सांस ली. वो बीते तीन दिनों से आईसीयू में भर्ती थे. हालांकि वह उम्र के उस पड़ाव में थे, जहां इंसान का शरीर स्वस्थ होने की परिभाषा भूल जाता है.

वकालत का सपना छोड़ जब कुलदीप ने पत्रकारिता को गले लगाया

सियालकोट यानी आज के पाकिस्तान में जन्मे कुलदीप नैयर की पढ़ाई लाहौर में हुई. वे वकील बनना चाहते थे, लेकिन वे अपनी वकालत जमा पाते, उससे पहले ही देश का बंटवारा हो गया. उनका परिवार सियालकोट छोड़कर भारत आ गया और कुलदीप जी वकालत का सपना छोड़ पत्रकारिता की पढ़ाई करने यूएस चले गए. पढ़ाई पूरी करने के बाद वो कई वर्षों तक भारत सरकार के प्रेस सूचना अधिकारी के तौर पर कार्यरत रहे. फिर यूएनआई, पीआईबी, स्टेट्समैन, इंडियन एक्सप्रेस के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे और करीब 25 वर्षों तक 'द टाइम्स' लंदन के संवाददाता भी रहे.

कुलदीप नैयर ने इमरजेंसी से लेकर देश में हुई अन्य प्रमुख घटनाओं पर कई किताबें लिखीं. इमरजेंसी के दौरान जब वह एक्सप्रेस के एडिटर थे तो बावजूद इसके कि इंदिरा गांधी उनकी करीबी थीं,उन्होंने सरकार के खिलाफ अपनी कलम बुलंद रखी. इसका नतीजा यह हुआ कि मीसा एक्ट के अंतर्गत इंदिरा ने उन्हें भी तिहाड़ जेल भिजवा दिया.

जब दरवाजे पर पुलिस आई तो याद आया कि जेल में आम खाने को नहीं मिलेंगे

अपनी गिरफ्तारी और तिहाड़ में गुजारे अपने वक्त को याद करते हुए कुलदीप नैयर अपनी किताब 'इन जेल' में लिखते हैं,' मैं तैयार था कि मुझे किसी न किसी दिन तो गिरफ्तार होना ही है. इसलिए जब मध्यरात्रि पुलिस हमारे दरवाजे पर आई तो बिना सवाल जवाब किए मैं उनके साथ चल दिया. हां, बस एक बात का मलाल था कि जेल में आम खाने को नहीं मिलेंगे. सो मैंने फ्रिज के ऊपर रखे दोनों आम खाए, फिर उनके साथ रवाना हुआ. मैंने तिहाड़ में गुजारे उन तीन महीनों में मरी हुई मक्खियों वाली दाल भी खाई थी, लेकिन इस सब के इतर इस बात की खुशी थी कि हम झुके नहीं. जी हां, कैदियों को जो दाल दी जाती थी, उसमें मक्खियां होती थीं. लेकिन आप कब तक भूखे रहेंगे. इसलिए लोग मक्खियों को हाथ से बाहर निकालकर दाल खाने को मजबूर थे.

पत्रकारिता जगत में कई दशकों तक सक्रिय रहे कुलदीप बेहद उम्दा लेखक थे. 'इन जेल' के अलावा उन्होंने और भी कई किताबें लिखी हैं. उनकी 2012 में आई आत्मकथा 'बियोंड द लाइंस' इन सभी में सबसे चर्चित रही. नाकामयाबियां मुझे उस रास्ते पर चलने से रोक नहीं पाई हैं, जिसे मैं सही मानता रहा हूं 'शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक', इस किताब की ये पंक्तियां उनके बेबाक और बेखौफ व्यक्तित्व को बखूबी दर्शाती हैं.

पत्रकारिता के क्षेत्र में कुलदीप नैयर के योगदान को कोई नहीं भुला सकता. इस बात का प्रमाण इसी से मिल जाता है कि उनके जिंदा रहते हुए ही नए पत्रकारों को उनके नाम का 'कुलदीप नैयर पत्रकारिता अवॉर्ड' दिया जाता रहा है. यह सम्मान सभी को नसीब नहीं होता.

यह बात बहुत ही दिलचस्प है कि कुलदीप जी को हिंदी नहीं आती थी. उन्होंने पूरी जिंदगी उर्दू और अंग्रेजी में ही पत्रकारिता की.

राजनीतिक करियर की एक झलक

एक पत्रकार का राजनीति में चले जाना केवल संयोग नहीं होता है. यह सिलसिला चलता ही चला आ रहा है. लंबे समय तक पत्रकारिता से जुड़े रहने के बाद कुलदीप भी 1997 में राज्यसभा के मनोनीत सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए . वह 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य भी रह चुके थे.

वीपी सिंह की सरकार जब सत्ता में आई ही थी, तब प्रधानमंत्री के नाम को लेकर पार्टी के भीतर चर्चा चल रही थी. तब देवीलाल को प्रधानमंत्री ना बनने का सलाह देने वाले कोई और नहीं कुलदीप नैयर ही थे. उनका मानना था कि अगर वीपी सिंह की लोकप्रियता की लहर में देवीलाल को प्रधानमंत्री चुना जाता तो जनता दल को बिखरने से कोई नहीं रोक सकता था. खैर, इसके बावजूद जनता दल टूट गया और वी.पी सिंह को प्रधानमंत्री का पद छोड़ना पड़ा. उस वक्त कुलदीप ब्रिटेन के उच्चायुक्त थे.

पत्रकारिता के एक युग का चलता फिरता साक्ष्य खत्म हो गया

कुलदीप नैयर नहीं रहे. पत्रकारिता के एक युग का चलता फिरता साक्ष्य खत्म हो गया और पीछे छूट गई उनकी लिखी कई किताबें, अनेकों लेख और अनगिनत साक्षात्कार. एक पत्रकार अपने पीछे भला और क्या ही छोड़ सकता है!

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