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KM Cariappa: भारत के पहले आर्मी चीफ, जिन्होंने देश के आगे बेटे की जान की भी लगा दी थी बाजी

भारतीय सेना का सर्वोच्च सम्मान पाने वाले फील्ड मार्शल जनरल केएम करिअप्पा (KM Cariappa) आर्मी के पहले भारतीय सेना अध्यक्ष थे. आज उनका जन्मदिन है

Updated On: Jan 28, 2019 08:25 AM IST

Abhishek Tiwari Abhishek Tiwari

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KM Cariappa: भारत के पहले आर्मी चीफ, जिन्होंने देश के आगे बेटे की जान की भी लगा दी थी बाजी

19वीं सदी का आखिरी साल था, यानी 1899. ब्रिटिश इंडिया के कुर्ग प्रॉविंस में 28 जनवरी को एक बच्चे का जन्म हुआ. जन्म के समय ही घर वालों को किन्हीं कारणों से आभास हो गया था कि परिवार में एक योद्धा का जन्म हुआ है. बच्चा बड़ा होकर पेशेवर योद्धा तो नहीं बना लेकिन किसी योद्धा से कम भी नहीं रहा. आप सोच रहे होंगे कि 19वीं सदी में पैदा हुए बच्चे की चर्चा हम 21वीं सदी में क्यों कर रहे हैं, तो बगैर इंतजार कराए आपको बता देते हैं कि हम बात कर रहे हैं केएम करिअप्पा (KM Cariappa) की. करिअप्पा देश के पहले भारतीय थल सेना अध्यक्ष (कमांडर इन चीफ- C In C) थे. यानी कि वे पहले भारतीय थे जिन्होंने इंडियन आर्मी की कमान संभाली. आज करिअप्पा साहब का जन्मदिन हैं.

आज के भारत के कर्नाटक में स्थित कोडागु जिले में एक जगह है कुर्ग. घुमकक्ड़ी का शौक रखने वाले इसे भारत का स्कॉटलैंड भी कहते हैं. इसी जगह पर राजस्व विभाग में काम करने वाले एक पिता के संतान के रूप में करिअप्पा का जन्म हुआ था. 4 भाई और दो बहनों के बीच करिअप्पा दूसरे संतान थे.

इंडियन आर्मी चीफ बनने का किस्सा है बड़ा दिलचस्प

28 जनवरी, 1899 को पैदा हुए केएम करिअप्पा का पूरा नाम था, कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (Kodandera Madappa Cariappa). करिअप्पा साहब को देश की सेना का असल में भारतीयकरण करने का भी श्रेय जाता है. आजादी के बाद भी इंडियन आर्मी के चीफ ब्रिटिशर्स हुआ करते थे. लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के साथ सेना की एक मीटिंग हुई. जिसके बाद सब बदल गया.

92.7 बिग एफएम के एक कार्यक्रम 'नायक विद संजीव श्रीवास्तव' में संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि नेहरू ने इस मीटिंग में कहा कि भारतीय सेना की कमान अभी कुछ समय के लिए ब्रिटिश अधिकारी के हाथ में ही रहे, क्योंकि अभी हमारे पास ऐसे अधिकारी नहीं हैं, जिनके पास सेना की कमान संभालने का अनुभव हो. पंडित नेहरू की इस बात पर मीटिंग में मौजूद एक सेना के अधिकारी ने बड़ी विनम्रता से कहा कि देश की कमान संभालने का अनुभव भी किसी के पास नहीं था लेकिन आप ये काम बड़े अच्छे तरीके से कर रहे हैं.

नेहरू के पास इस अकाट्य तर्क को खारिज करने के लिए कुछ बचा ही नहीं था. ऐसे में नेहरू ने उस सेना के अधिकारी से पूछा कि क्या आप सेना की कमान संभालने के लिए तैयार हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि इस बैठक में मौजूद एक शख्स है जो इस काम को बखूबी निभा सकता है और उसपर हर किसी को भरोसा भी है. फिर उस अधिकारी ने केएम करिअप्पा के नाम को आगे बढ़ाया. और इस तरह इंडियन आर्मी के पहले भारतीय अध्यक्ष बने केएम करिअप्पा.

वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव इस कार्यक्रम में करिअप्पा की शादी से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी भी सुनाते हैं. उसकी चर्चा हम आगे करेंगे.

करिअप्पा का भारतीय थल सेना अध्यक्ष बनना और आर्मी डे

आजादी के दो साल बाद यानी 1949 में केएम करिअप्पा ने भारतीय सेना की कमान संभाली. उन्होंने ब्रिटिश कमांडर इन चीफ, जनरल सर फ्रांसिस बुचर से 15 जनवरी, 1949 को कमांडर इन चीफ की पदवी हासिल की थी. दिलचस्प यह है कि इसी दिन भारतीय सेना दिवस भी मनाया जाता है.

1947 में करिअप्पा यूनाइटेड किंगडम के इंपीरियल डिफेंस कॉलेज में एक ट्रेनिंग कोर्स के लिए जाने वाले पहले भारतीय बने. इसके अलावा 1951 में अमेरिका-भारत के बीच संबंधों को सुधारने में अपने प्रयास के चलते तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने उन्हें ऑर्डर ऑफ द चीफ कमांडर ऑफ द लीजन ऑफ मेरिट से सम्मानित किया था.

केएम करिअप्पा ब्रिटिश इंडियन आर्मी में कमिश्नड होने वाले पहले भारतीय दल में भी शामिल थे. क्वेटा स्थित स्टाफ कॉलेज में ट्रेनिंग लेने वाले वे भारतीय सेना के पहले अधिकारी थे. इसके साथ ही वे पहले भारतीय थे जिसने एक बटालियन का नेतृत्व किया. इंडियन आर्मी में रहने के दौरान वे शुरुआत को छोड़ दें तो अंत तक राजपूत रेजिमेंट में रहे क्योंकि इससे पहले वे कई रेजिमेंट में अपनी सेवाएं दे चुके थे.

लगभग 30 साल तक भारतीय सेना के लिए सेवाएं देने वाले करिअप्पा 1953 में आर्मी से रिटायर हुए. रिटायर होने के बाद भी वे देश की किसी न किसी रूप में सेवा करते रहे. रिटायारमेंट के बाद सरकार ने उन्हें न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया का हाई कमिश्नर बना दिया. वे 1956 तक इस पद पर रहे.

जब देश को माना सर्वोपरि और अपने बेटे की जान की लगा दी बाजी

केएम करिअप्पा आजादी से पहले ही सेना में बड़े अधिकारी बन चुके थे. ब्रिटिश इंडियन आर्मी में वे एक बटालियन का नेतृत्व कर रहे थे. उस समय पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति और सैन्य तानाशाह जनरल अयूब खान उनके अंडर काम करते थे. एक समय आया जब जनरल अयूब खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए.

साल 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. तब केएम करिअप्पा के बेटे केसी करिअप्पा भारतीय वायु सेना में अपनी सेवाएं दे रहे थे. एयर मार्शल केसी करिअप्पा एयर फोर्स की हंटर एयरक्राफ्ट को लेकर पाकिस्तान की सीमा में चले गए. इस विमान को पाकिस्तानी क्षेत्र में मार गिराया गया और उनके बेटे केसी करिअप्पा युद्ध बंदी (Prisoner Of War) बना लिए गए.

इस बात की जानकारी जैसे ही पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान को लगी, उन्होंने केएम करिअप्पा से संपर्क किया. अयूब खान ने अपने पूर्व बॉस और इंडियन आर्मी से रिटायर हो चुके केएम करिअप्पा से कहा कि हम आपके बेटे को ठीक ढंग से रख रहे हैं और जल्द ही उसे छोड़ देंगे. इस ऑफर पर खुश होने की बजाय करिअप्पा ने जो जवाब दिया वह दिल जीतने वाला था.

करिअप्पा ने अयूब खान से कहा, 'अब मेरा बेटा सिर्फ मेरा बेटा नहीं रहा. अब वह इस देश का बेटा है. वह एक सैनिक है जो सच्चे देशभक्त की तरह अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ रहा है. आपकी दरियादिली के लिए शुक्रिया. आपके इस ऑफर पर मैं कहूंगा कि या तो आप सभी युद्ध बंदियों को एक साथ रिहा करिए या उनमें से किसी को भी नहीं. मेरे बेटे के साथ खास व्यवहार करने की कोई जरूरत नहीं है.'

करिअप्पा की शादी का किस्सा भी बेहद दिलचस्प है

'नायक विद संजीव श्रीवास्तव' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि केएम करिअप्पा लंबे समय तक अपनी शादी को टालते रहे. लेकिन 38 साल की उम्र हो जाने के बाद वे परिवार वालों के दवाब के सामने घुटने टेक ही दिए. फिर तय हुआ कि वे एक लड़की से मिलने उसके घर सिकंदराबाद जाएंगे.

यह किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है. वे बताते हैं कि जिस लड़की के घर जाना था, उसके घर न जाकर करिअप्पा पड़ोसी के घर पहुंच गए. वहां पर उन्होंने एक बेहद खूबसूरत लड़की देखी और बातचीत कर वापस आ गए. करिअप्पा को वह लड़की पसंद आ गई थी और लड़की को भी करिअप्पा.

जब इस बात की जानकारी दोनों के परिवार वालों को लगी तो सब चौंक गए. हालांकि फिर मिल-बैठ कर शादी तय की गई और करिअप्पा 38 साल की उम्र में विवाह के बंधन में आखिर बंध ही गए.

फील्ड मार्शल की पदवी पाने वाले मात्र दूसरे सेना अधिकारी

केएम करिअप्पा को 28 अप्रैल, 1986 में भारतीय सेना में सर्वोच्च सम्मान फील्ड मार्शल की पदवी हासिल हुई. यह रैंक अबतक इंडियन आर्मी के सिर्फ दो लोगों को ही मिली है. 1973 में जनरल सैम मानेकशॉ को यह सम्मान दिया गया था.

कहा जाता है कि पंडित जवाहर लाल नेहरू से करिअप्पा के मतभेद थे. हो सकता है कि कार्य करने के तरीके को लेकर दोनों के बीच कोई मतभेद रहा हो लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर किसी मतभेद की बात बेमानी लगती है. अगर ऐसा होता तो उनके ही परिवार के राजीव गांधी 1986 में करिअप्पा को पांच सितारा तमगा नहीं देते.

बेटे की जुबानी, पिता की कहानी

केएम करिअप्पा के बेटे रिटायर्ड एयर मार्शल केसी करिअप्पा अपने पिता को याद करते हुए कई किस्सा सुनाते हैं. द क्विंट के मुताबिक, केसी करिअप्पा बताते हैं कि मुझे बताया गया कि मेरे पिता काफी निडर थे. वे कहते हैं कि मेरे पिता कहते थे कि अपने देश से प्यार करो, देश के प्रति अपने कर्तव्य को निभाओ. वे अपने पिता की निडरता को याद करते हुए कहते हैं, 'उन्होंने 1947/48 युद्ध के दौरान खुली जीप चलाई थी.' आप इससे उनके शौर्य का अंदाजा लगा सकते हैं.

एयर मार्शल केसी करिअप्पा बताते हैं कि उनके पिता उसूल के पक्के थे. एक किस्सा सुनाते हुए वे कहते हैं कि एक बार जब मेरे पिता गाड़ी चला रहे थे तब जनरल थिमैया ने अपनी जेब से एक सिगरेट निकाली. इस पर केएम करिअप्पा ने कहा कि आप जीप पर स्मोकिंग नहीं कर सकते हैं और वर्दी में तो बिल्कुल भी नहीं. केएम करिअप्पा ने सिगरेट पीने के लिए जनरल थीमैया को जीप से नीचे उतार दिया और फिर आगे बढ़ गए.

रिटायरमेंट पर दिए जाने वाले उपहार की प्रेरणादायक कहानी

केसी करिअप्पा बताते हैं कि एक चीफ जो मुझे सिखाई गई थी वे थी कि अपने देश से प्यार करो. देश, भगवान और देश के लोगों के प्रति अपने कर्तव्य को निभाओ.

Kodandera M. Cariappa

जनरल थिमैया और फील्ड मार्शल करिअप्पा

केसी करिअप्पा अपने पिता से जुड़ा एक खूबसूरत और प्रेरणादायक किस्सा सुनाते हैं. वे कहते हैं, 'जब मेरे पिता 1953 में रिटायर हुए, तो यह परंपरा थी कि रिटायर होने वाले अधिकारी को एक विदाई उपहार दिया जाए.' उनसे पूछा गया कि वे क्या चाहते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि उन्हें एक भारतीय जवान की मूर्ति दी जाए. 'क्योंकि मैं आज जो भी हूं वो एक जवान की बदौलत हूं.'

वे बताते हैं कि रिटायरमेंट के बाद हर सुबह वे पहले अपने माता-पिता के सामने प्रार्थना करते और फिर उस जवान की मूर्ति को सलाम करते थे.

पंडित नेहरू से जुड़ा एक खास किस्सा

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से जुड़ा किस्सा याद करते हुए केसी करिअप्पा बताते हैं कि उनके नेहरू से काफी अच्छे संबंध थे. इस बारे में बताते हुए वे कहते हैं, 'एक कमांडर इन चीफ के नाते देश के प्रथम प्रधानमंत्री से उनके रिश्ते बहुत अच्छे थे. एक बार जब मेरे दादा जी मेरे पिता से मिलने दिल्ली आए तो उन्होंने प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से मिलने की इच्छा जताई.'

वे कहते हैं कि जब प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को इस बारे में बताया गया तो उन्होंने कहा कि नहीं, वे मेरे से मिलने नहीं आएंगे बल्कि मैं उनसे मिलने जाऊंगा और पंडित नेहरू ने ऐसा ही किया. वे बताते हैं कि पिता के रिटायरमेंट के ठीक बाद प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पिता के सम्मान में एक निजी विदाई रात्रिभोज का आयोजन किया था.

इस भोज में केसी करिअप्पा, उनकी बहन और कजन भाई को भी निमंत्रण मिला था. वे बताते हैं कि इस भोज में पंडित नेहरू और मेरे पिताजी एक टेबल पर बैठे थे. कृष्णा मेनन हमारे साथ बैठे थे और उन्होंने हमारा काफी मनोरंजन भी किया. बताते चले कि रिटायरमेंट के बाद केएम करिअप्पा ने राजनीति में भी किस्मत आजमाई. 1957 के आम चुनाव में वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नॉर्थ-ईस्ट बॉम्बे से कृष्णा मेनन और जेबी कृपलानी के खिलाफ चुनाव भी लड़े लेकिन हार गए.

प्रधानमंत्री मोदी, करिअप्पा और 2018 का कर्नाटक चुनाव

2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान एक रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने केएम करिअप्पा और जनरल थिमैया को लेकर एक टिप्पणी की थी. हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की बातें तथ्यों पर एकदम गलत साबित हुईं. इस पूरे प्रकरण पर भी केसी करिअप्पा ने बयान दिया था और कहा था कि प्रधानमंत्री की बात से दुख पहुंचा है.

आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने की थी करिअप्पा के लिए भारत रत्न की मांग

अभी देश में भारत रत्न को लेकर चर्चा गरम है. सरकार ने देश की तीन विभूतियों को सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने का ऐलान किया है. लेकिन आपको बताते चले कि आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत ने 2017 में जनरल केएम करिअप्पा को भारत रत्न देने की मांग की थी. अभी तक किसी भी मिलिट्री पर्सन को भारत रत्न से नहीं नवाजा गया है.

केएम करिअप्पा की ख्याति और लोगों के बीच सम्मान

अभी प्रयागराज (इलाहाबाद) में कुंभ चल रहा है. इस शहर में भी करिअप्पा के नाम पर एक द्वार बनाया गया है. इस बात से आप उनकी ख्याति का अंदाजा लगा सकते हैं. अगर कुंभ जाएं तो यहां भी हो आइएगा. शायद अच्छा लगे. ये तो रही एक जगह की बात. अब दूसरी बात.

1947 में भारत का पाकिस्तान से युद्ध हो रहा था. इसके परिणामस्वरूप भारत-पाक सीमा से लगे बारामूला के कई गांवों में भोजन की भारी कमी हो गई थी. इस दौरान इलाके से गुजरते हुए लोगों ने करिअप्पा को घेर लिया और अपनी पीड़ा सुनाई. उन्होंने मदद का पूरा भरोसा दिया और इलाके में भोजन पहुंचाया. इस काम को अंजाम देने के एवज में वहां के निवासियों ने बारामूला में करिअप्पा के सम्मान में एक पार्क का नाम उनपर रखा. बताते हैं कि यह पार्क अब भी मौजूद है.

और अंत में

करिअप्पा के बारे में कहा जाता है कि वे अपने जवानों से अक्सर कहा करते थे कि मैं आपसे वो काम करने के लिए कभी नहीं कहूंगा, जो मैं खुद नहीं कर सकता. इसके बाद एक और बात बतानी जरूरी लगती है. कुर्ग देश का एक मात्र इलाका है जिसने दो-दो आर्मी चीफ दिए हैं. पहले हैं, नॉन अदर दैन- केएम करिअप्पा और दूसरे- जनरल केएस थिमैया (KS Thimayya).

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