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सहगल क्यों चाहते थे कि उनके जनाज़े में 'जब दिल ही टूट गया' बजे

केएल सहगल शायद एकमात्र ऐसे गायक हैं जिनके नाम पर एक पूरा युग 'सहगल युग' है

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh Updated On: Apr 11, 2018 08:47 AM IST

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सहगल क्यों चाहते थे कि उनके जनाज़े में 'जब दिल ही टूट गया' बजे

साल 1946 में मशहूर निर्देशक एआर कारदार एक फिल्म बना रहे थे. फिल्म का टाइटल था-शाहजहां. उस फिल्म में हिंदी फिल्मी दुनिया के पहले सुपरस्टार का दर्जा हासिल करने वाले अभिनेता केएल सहगल अभिनय कर रहे थे. फिल्म के संगीत निर्देशक की जिम्मेदारी नौशाद साहब पर थी. उस वक्त तक केएल सहगल की करीब तीन दर्जन फिल्में रिलीज हो चुकी थीं. उनके अभिनय और गायकी का जादू लोगों पर छा चुका था. फिल्म शाहजहां का संगीत भी नौशाद साहब के लिए किसी सपने के पूरे होने जैसा ही था क्योंकि उससे पहले उन्हें केएल सहगल के साथ काम करने का मौका नहीं मिला था.

नौशाद साहब ने फिल्म शाहजहां का संगीत तैयार किया. आवाज केएल सहगल की थी. फिल्म के कई गाने कामयाबी की बुलंदियों तक पहुंचे. जिसमें ‘गम दिए मुस्तकिल’ और ‘जब दिल ही टूट गया’ दो ऐसे गाने थे जो आज भी लोगों को याद हैं. इन गानों से जुड़े दिलचस्प किस्सों की बात करने से पहले आपको बताएं कि आज उसी करिश्माई अभिनेता और गायक केएल सहगल का जन्मदिन है. अपने करीब डेढ़ दशक तक चले करियर में उन्होंने देवदास जैसी मशहूर फिल्म की. इसके अलावा मोहब्बत के आंसू, यहूदी की लड़की, पुजारिन, भक्त सूरदास और तानसेन जैसी फिल्मों में भी सिनेमा प्रेमियो ने उनके अभिनय और आवाज का जादू देखा.

बिना पिए गाना

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नौशाद

सहगल साहब की गायकी बहुत कामयाब रही. जिसके तमाम किस्से भी हैं. हुआ यूं कि सहगल साहब के बारे में मशहूर था कि वो शराब पीकर गानों की रिकॉर्डिंग करते हैं. नौशाद जब पहली बार फिल्म शाहजहां के लिए उनके साथ काम कर रहे थे तो उनके दिमाग में ये बात पहले से थी. सहगल साहब ने जब पहले दिन गाने की रिकॉर्डिंग की तो बात जमी नहीं. ये तय हुआ कि रिकॉर्डिंग अगले दिन के लिए टाल दी जाए. अगले दिन जब सहगल साहब स्टूडियो पहुंचे तो नौशाद ने उनसे कहाकि आज बगैर पिए गाने की रिकॉर्डिंग करते हैं. सहगल साहब बोले- ऐसा नहीं हो सकता. ऐसे तो मैं बेसुरा लगूंगा. ये नौशाद का आत्मविश्वास था कि उन्होंने हिम्मत लेकर कह दिया कि आप कोशिश करें कुछ गड़बड़ नहीं होगी. एक नए संगीत निर्देशक का भरोसा पाकर केएल सहगल बगैर पिए गाने की रिकॉर्डिंग के लिए तैयार हो गए. गाना रिकॉर्ड हुआ.

चौंकाने वाली बात ये थी कि वो गाना पहली ही बार में ‘ओके’ हो गया. सहगल साहब का गाया वही गाना “जब दिल ही टूट गया हम जीकर क्या करेंगे” आज भी लोगों को याद है. ये दुर्भाग्य ही है कि नौशाद और सहगल साहब की लाजवाब जोड़ी ज्यादा समय तक साथ काम नहीं कर पाई. इस फिल्म के बनने के अगले ही साल 1947 में सिर्फ 42 साल की उम्र में केएल सहगल का निधन हो गया. ये बात भी मशहूर है कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के वक्त ही उन्होंने कह दिया था कि वो जब भी इस दुनिया से रूखसत होंगे उनकी अर्थी के साथ यही गाना बजाया जाएगा. जाने क्यों शायद उन्हें दुनिया से अपने जाने का अहसास हो गया था इसीलिए उन्होंने ये बात कही थी. अफसोस सिर्फ एक साल के अंदर उनके चाहने वालों को ये दिन देखना पड़ा. उनकी अर्थी जब निकली तो साथ में गाना बज रहा था- ‘जब दिल ही टूट गया हम जीकर क्या करेंगे’

दरियादिल सहगल

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केएल सहगल 11 अप्रैल 1904 को जम्मू में पैदा हुए थे. कुछ जगहों पर उनका जन्मदिन 4 अप्रैल भी लिखा है, लेकिन उनके बारे में ज्यादातर जानकारियां कहती हैं कि वो 11 अप्रैल को पैदा हुए थे. पिता तहसीलदार थे. मां बहुत धार्मिक महिला थीं. बचपन से उन्हें भजन कीर्तन के कार्यक्रमों में ले जाया करती थीं. ऐसा भी कहा जाता है कि बचपन में उनकी आवाज बहुत खराब हो गई थी, जिसके बाद वो काफी समय तक चुप रहे. फिर एक पीर के कहने पर उन्होंने अपनी गायकी को दोबारा शुरू किया. बाद में केएल सहगल ने पढ़ाई भी बीच में छोड़ दी और नौकरी के सिलसिले में इधर-उधर घूमते रहे. इसी घुमक्कड़ी के दौरान गायकी का उनका शौक परवान चढ़ा और 30 के दशक में वो फिल्मी दुनिया में कदम रख चुके थे.

इसमें उनके दोस्त मेहरचंद जैन का बड़ा रोल रहा. इन दोनों की दोस्ती लाहौर में हुई थी. मेहरचंद जैन ने ही केएल सहगल को फिल्मी दुनिया में कदम रखने के लिए हौसला बढ़ाया. केएल सहगल की दरियादिली के भी कई किस्से मशहूर हैं. एक बार एक बिजनेसमैन ने उन्हें अपने यहां गाने के लिए बुलाया. फीस तय हुई बीस हजार. सहगल साहब ने हामी भर दी. उस जमाने में बीस हजार की फीस बताती है कि सहगल साहब का क्या ‘क्रेज’ रहा होगा. खैर, सहगल साहब जब उस बिजनेसमैन के यहां जाने को तैयार ही थे कि स्टूडियो के एक गरीब कर्मचारी ने उन्हें अपनी बेटी की शादी में शरीक होने का न्यौता दिया. शादी उसी दिन थी. सहगल साहब ने बीस हजार की परवाह किए बिना अपने स्टूडियो के कर्मचारी की बेटी की शादी में जाना कबूल कर लिया. कहते हैं कि उस रात केएल सहगल बड़ी देर तक गरीबों की बस्ती में बैठकर गाना गाते रहे.

ये सहगल साहब की काबिलियत और इंसानियत ही थी कि लता मंगेशकर और मुकेश जैसे गायक उनके भक्त की तरह थे. लता मंगेशकर का तो पूरा परिवार केएल सहगल की गायकी का दीवाना था. गायक मुकेश की शुरूआती गायकी में तो केएल सहगल का खासा प्रभाव दिखाई देता है. उनका गाना ‘दिल जलता है तो जलने दे’ सहगल साहब की आत्मा में घुस कर गाया हुआ गीत है. सहगल साहब भी मुकेश को बहुत स्नेह करते थे. उन्होंने मुकेश को अपना वो हारमोनियम तोहफे में दिया था जिस पर वो रियाज किया करते थे. लता खुद चाहती थीं कि उन्हें केएल सहगल को सामने बैठकर सुनने का मौका मिले.

लता मंगेशकर का मनहूस रेडियो

ये अलग बात है कि उनकी ये ख्वाहिश पूरी नहीं हुई. लता मंगेशकर बड़े शौक से पैसे जोड़-जोड़कर रेडियो खरीद कर लाई थीं. जैसे ही उन्होंने वो रेडियो सुनने के लिए ऑन किया. उस पर पहली खबर केएल सहगल के निधन की थी. लता उस खबर को सुन नहीं पाई. उन्हें लगा कि ये रेडियो उनके घर मनहूसियत लेकर आया है. उन्होंने तुरंत जाकर वो रेडियो वापस कर दिया था. उनसे मिलने और उन्हें सुनने की चाहत के पूरा ना होने का अफसोस लता मंगेशकर आज भी करती हैं.

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