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केसरबाई केरकर: भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर की पसंदीदा शास्त्रीय गायिका की कहानी

26 साल गुरू शिष्य परंपरा में संगीत सीखने के बाद जब उस्ताद नहीं रहे तब केसरबाई केरकर ने अकेले मंचीय प्रस्तुतियां देना शुरू किया

Updated On: Jul 13, 2018 07:13 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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केसरबाई केरकर: भारत रत्न से सम्मानित लता मंगेशकर की पसंदीदा शास्त्रीय गायिका की कहानी
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हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में जयपुर अतरौली घराने का बड़ा नाम है. उस्ताद अल्लादिया खां को इस घराने की शुरुआत करने वालों में गिना जाता है. उस्ताद अल्लादियां खां भारतीय शास्त्रीय संगीत गायकी का बहुत बड़ा नाम थे. उनका रियाज बड़ा कठोर माना जाता था. कहते हैं कि वो भारतीय शास्त्रीय संगीत के सबसे दुर्लभ और कठिन रागों को गाया करते थे.

ऐसा कहा जाता है कि एक बार की बात है उनके पास एक शादीशुदा जोड़ा पहुंचा. पति की इच्छा थी कि उसकी पत्नी को अल्लादियां खां साहब शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखाएं. ऐसा नहीं है कि शास्त्रीय संगीत सीखने का शौक उस महिला को नया-नया लगा था. उन्होंने पहले भी कई बड़े नामों से शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखी थीं. अब उनकी इच्छा थी कि वो इस कला में और पारंगत हो जाएं. लिहाजा वो लोग उस्ताद अल्लादिया खां के पास पहुंचे थे.

उस्ताद अल्लादिया खां ने पहले तो उस महिला कलाकार को सीखाने से मना किया. फिर कुछ सोच समझकर कुछ शर्तें रखीं कि अगर वो शर्तें पूरी हो जाती हैं तो वो उस महिला को सीखाएंगे. शर्तें ऐसी वैसी नहीं थीं. खासी पेचीदी, खासी मुश्किल. उस्ताद अल्लादिया खां की पहली शर्त थी कि वो उस महिला कलाकार को तभी सीखाएंगे जब वो कम से कम दस साल तक उनसे सीखें.

उस्ताद अल्लादिया खां को दस साल तक सीखाने की फीस पहले ही दे दी जाए, चाहे वो कलाकार अंत तक सीखे ना सीखे. उस जमाने में उस्ताद जी ने अपने लिए 200 रुपए हर महीने की फीस तय की थी. अंत में जब उन्हें पांच हजार रुपए की रकम मिल गई तब उन्होंने उस महिला कलाकार को सीखाने के लिए हामी भरी. वो महिला कलाकार थीं- भारतीय शास्त्रीय संगीत की दिग्गज कलाकार- केसरबाई केरकर.

कुछ पारिवारिक वजहों से उनको वापस गोवा लौटना पड़ा

केसरबाई केरकर का जन्म 13 जुलाई 1892 को गोवा के पणजी के पास के एक गांव केरी में हुआ था. बचपन में आस-पास के मंदिरों में होने वाले भजन कीर्तन की आवाज उनके कानों में बसती चली गई. धीरे-धीरे वो उन धुनों को गुनगुनाने लगीं. घर में मामा थे, जिन्हें गाने बजाने का बड़ा शौक था. उन्होंने छोटी सी बच्ची को संगीत सीखने की प्रेरणा दी. शुरूआत पास के मंदिर के पुजारी से हुई. उसके बाद जब वो आठ साल की थीं तब शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकार उस्ताद अब्दुल करीम खां ने उन्हें संगीत की बारीकियां सीखानी शुरू कीं लेकिन ये सिलसिला लंबा नहीं चला.

केसरबाई केरकर उस्ताद अब्दुल करीम खां से सीखने के लिए कोल्हापुर में रहने लगीं. फिर कुछ पारिवारिक वजहों से उनको वापस गोवा लौटना पड़ा. कुछ समय के लिए संगीत शिक्षा रूक गई. लेकिन जल्द ही उन्होंने रामकृष्ण बुवा से सीखना शुरू किया. ये सिलसिला भी चार-पांच साल ही चला. केसरबाई केरकर को अपनी मां और मामा के साथ बॉम्बे आना पड़ा. यहां उन्होंने कुछ समय तक सितार वादक उस्ताद बरकतुल्ला खां से शास्त्रीय गायकी सीखी. इतने गुरूओं के पास सीखने के बाद केसरबाई केरकर उस्ताद अल्लादियां खां साहब के पास पहुंची थीं. इसी दौरान उनका विवाह भी हो गया था.

शायद यही वजह भी थी कि उस्ताद अल्लादियां खां ने केसरबाई केरकर को शिष्या बनाने से पहले कई कठिन शर्तें रखी थीं. एक कठिन शर्त ये भी थी कि केसरबाई केरकर जब भी शास्त्रीय कार्यक्रमों में गाएंगी अपने गुरू के साथ ही गाएंगी.

खैर, इन मुश्किल शर्तों के बीच केसरबाई केरकर से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दीक्षा ली. उन्होंने हमेशा अपने गुरू के साथ ही कार्यक्रम किए. गुरू की तरह ही कठिन रियाज उनकी भी आदत में शुमार था. केसरबाई केरकर 10-10 घंटे रियाज किया करती थीं. यही वजह थी कि केसरबाई केरकर और उस्ताद अल्लादिया खां का साथ तब तक रहा जब तक उस्ताद जी जीवित थे.

26 साल गुरू शिष्य परंपरा में संगीत सीखने के बाद जब उस्ताद नहीं रहे तब केसरबाई केरकर ने अकेले मंचीय प्रस्तुतियां देना शुरू किया.

केसरबाई केरकर का उस कंपनी से बड़ा विवाद हुआ

अपने गुरू की तरह ही केसरबाई केरकर अक्खड़ स्वभाव की गायिका रहीं. उन्होंने आकाशवाणी से अपने कार्यक्रम के प्रसारण की हामी कभी नहीं भरी. एक बड़ी संगीत कंपनी के साथ रिकॉर्डिंग का उनका किस्सा बड़ा मशहूर है. गानों की रिकॉर्डिंग के बाद जब उनके ‘अप्रूवल’ के लिए रिकॉर्डिंग भेजी गई तो उन्हें उनमें से कुछ गाने दोबारा रिकॉर्ड करने थे. उन्होंने ये जानकारी कंपनी के लोगों को दे दी. इसी दौरान उनकी तबियत थोड़ी नासाज हो गई. कंपनी वाले बीच-बीच में आते रहे और केसरबाई केरकर उन्हें टालती रहीं. आखिरकार एक दिन कंपनी ने तय किया कि वो बगैर दोबारा रिकॉर्डिंग किए गाने रिलीज कर देगी.

इस बात को लेकर केसरबाई केरकर का उस कंपनी से बड़ा विवाद हुआ. उन्होंने गुस्से में कहा कि वो कभी उस कंपनी के स्टूडियो में दोबारा नहीं जाएंगी. उस दौर में गायक गायिका इतने बड़े फैसले लेने से कतराते थे लेकिन केसरबाई केरकर ने ऐसा करके दिखाया. 1977 में केसरबाई केरकर ने दुनिया को अलविदा कहा. ये भी एक संयोग ही है कि इतने महान कलाकारों से सीखने के बाद 80 साल की उम्र तक केसरबाई केरकर ने कोई शिष्य नहीं बनाया. या यूं कहें कि उन्हें कोई ऐसा शिष्य मिला ही नहीं जिसे वो अपनी कला के वारिस के तौर पर देखतीं. केसरबाई केरकर को गुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘सुरश्री’ की उपाधि दी थी.

महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें राज्य गायिका की पदवी से नवाजा था. इसके अलावा केसरबाई केरकर को पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से भी नवाजा गया. केसरबाई केरकर की एक पहचान ये भी है कि वो उसी इलाके से आती हैं जहां से भारतीय फिल्म गायकी में महान लता मंगेशकर का भी नाम जुड़ा है. लता मंगेशकर के मन में हमेशा से केसरबाई केरकर के लिए इज्जत का भाव रहा है. यहां तक कि एक इंटरव्यू में जब लता मंगेशकर से पूछा गया कि उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में अगर किसी एक महान गायक या गायिका का नाम चुनना हो तो वो किसे चुनेंगी, लता मंगेशकर का जवाब था- केसरबाई केरकर.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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