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कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्य कैसे गूंथता था 'यकीन का कवि'

केदारनाथ सिंह कविता को न नारा बनने देते हैं और न ही किसी का नितांत व्यक्तिगत अनुभव

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Mar 20, 2018 01:57 PM IST

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कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्य कैसे गूंथता था 'यकीन का कवि'

हिंदी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह नहीं रहे. यूं तो एक दिन दुनिया से सभी को जाना है लेकिन सबकी इच्छा होती है कि वो दुनिया में अपनी कोई छाप छोड़कर जाए. इसी तरह कवि की भी एक इच्छा होती है कि उसे उसकी कविताओं के मार्फत जाना जाए. यानी जब वह इस दुनिया से कूच कर भी जाए तो लोग उसकी कविताओं को याद रखें. केदारनाथ सिंह की मृत्यु यानी उनके जाने के बाद उन्हीं की एक कविता ‘जाना’ का जिक्र सबसे अधिक हुआ वो कुछ यूं है-

मैं जा रही हूं- उसने कहा

जाओ- मैंने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है.

सिर्फ 4 पंक्तियों की यह कविता अपने-आप में गहरे अर्थ लिए हुए. साधारण अर्थों में यह लग रहा है कि एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को जाने को कह रहा है. पर यहां प्रेमिका का कोई साधारण जाना नहीं है बल्कि प्रेमी को पता है कि वो फिर से लौटकर नहीं आएगी. इसके बावजूद प्रेमी बहुत ही सहज तरीके से प्रेमिका को जाने की इजाजत दे देता है. यह पूरी प्रक्रिया प्रेमी के लिए खौफनाक भी है लेकिन फिर वह प्रेमिका को जाने को कह रहा है. यहां प्रेमिका द्वारा जाने की बात कहने से अधिक उस प्रेमी द्वारा प्रेमिका को इजाजत देना महत्वपूर्ण है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैसा समाज जहां हर कोई एक स्त्री को अपने पास रखना चाहता, उसे बंधन में रखना चाहता है और उसे किसी तरह की स्वतंत्रता नहीं है, वहां एक पुरुष उसे जाने को बहुत ही सहज भाव से कह रहा है.

लोकतंत्र और प्रेम

यह कविता प्रेम में लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व को स्थापित करने वाली कविता है. केदारनाथ सिंह यह कविता हम सभी को यह बताती है कि लोकतांत्रिक मूल्य के बिना प्रेम अधूरा है. कवि के लिए प्रेमिका को अपने पास रोकने से अधिक महत्वपूर्ण उसकी इच्छा का सम्मान है. इसमें कवि प्रेमिका के जाने के व्यक्गित पीड़ा की भी अभिव्यक्ति कर रहा है. ऐसा नहीं है कि कवि को निजी दुख नहीं है लेकिन उसके लिए प्रेम और एक स्त्री के सरोकार अधिक महत्वपूर्ण हैं.

जिस वक्त केदारनाथ सिंह ने लिखना शुरू किया था उस वक्त कविता में दो तरह की विचारधाराओं का प्रभाव था. एक विचारधारा में निजी दुख को ही सब कुछ मानकर रचना की जा रही थी तो दूसरी धारा में सामाजिक दुख को. केदारनाथ सिंह की पूरी रचना प्रक्रिया इन दोनों धाराओं के अतिवाद से मुक्त होने की प्रक्रिया है. उनके यहां व्यक्ति की पीड़ा समाज की पीड़ा है और समाज की पीड़ा व्यक्ति की.

प्रेम को सबसे निजी वस्तु या अनुभव माना जाता है लेकिन केदारनाथ सिंह जब भी प्रेम के बारे में कुछ लिखते हैं तो इसकी निजता का हनन किए बगैर उसे बाकि संसार से जोड़ देते. उदाहरण के लिए उनकी ये छोटी सी कविता देखी जा सकती है-

उसका हाथ

अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा

दुनिया को

हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए.

जाना की तरह यह कविता भी सिर्फ 4 पंक्तियों की है. इसी पूरी कविता में बगैर प्रेम के निजी क्षणों की गर्माहट को भंग किए कवि अपने सामाजिक सरोकारों को भी व्यक्त कर देता है. केदारनाथ सिंह कविता को न नारा बनने देते हैं और न ही किसी का नितांत व्यक्तिगत अनुभव.

'जाने' ही नहीं 'आने' के बारे में भी लिखते हैं केदारनाथ सिंह

ऐसा नहीं है केदारनाथ सिंह के यहां सिर्फ ‘जाना’ है, उनके यहां ‘आना’ भी है. जिस तरह जाना में निजी अनुभव के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्य और सामाजिक सरोकार हैं, उसी तरह ‘आना’ में भी-

आना जब भी समय मिले

जब समय न मिले

तब भी आना

आना जैसे हाथों में

आता है जांगर

जैसे धमनियों में आता है रक्त

जैसे चूल्हों में धीरे-धीरे आती है आंच

आना

इसी तरह उनकी एक और कविता है ‘तुम आईं’-

तुम आईं

जैसे छीमियों में धीरे-धीरे

आता है रस

जैसे चलते-चलते एड़ी में

कांटा जाए धंस

क्रियाओं में सौंदर्य

जब प्रगतिशील आंदोलन शुरू हुआ था तो कहा गया कि कविता में ‘श्रम में सौंदर्य’ पर बात होनी चाहिए. श्रम के मूल में क्रिया है. केदारनाथ सिंह ने क्रियाओं के सौंदर्य को अपनी कविताओं का विषय बनाया है. क्रियाओं के ऊपर केदारनाथ सिंह से पहले हिंदी में शायद ही किसी कवि ने कविता लिखी हो. केदारनाथ सिंह ने बढ़ई द्वारा लकड़ी चीरने, बोझा बांधने से लेकर धूप में कपड़े सुखने और नदी के बहने पर भी कविताएं लिखीं हैं. उनके यहां मनुष्य के श्रम का भी सौंदर्य है और प्रकृति के श्रम का भी.

दरअसल केदाननाथ सिंह किसी भी तरह के अतिवादों से संचालित हुए बगैर ‘यकीन के कवि’ हैं. जिसे मनुष्य, समाज और प्रकृति के मौलिक गुणों में भरोसा है. यही भरोसा उनकी कविताओं को आज भी प्रासंगिक बनाए रखे हुए है. वैसे केदारनाथ सिंह कोई राजनीतिक कवि नहीं हैं लेकिन उनकी यह कविता आज के राजनीतिक माहौल पर बहुत ही सटीक बैठती है-

गिरे हुए छिलके पर

टूटी हुई घास पर

हर योजना पर

हर विकास पर

दौ मिनट का मौन

इस महान शताब्दी पर

इस महान शताब्दी के

महान इरादों पर

महान शब्दों

और महान वादों पर

दो मिनट का मौन

भाइयों और बहनों

इस महान विशेषण पर

दौ मिनट का मौन.

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