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कश्मीरनामा: कश्मीर की निष्पक्ष कहानी कहती है ये किताब

कश्मीरनामा इस साल पुस्तक मेले की सबसे चर्चित किताबों में से एक रही है

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jan 22, 2018 04:05 PM IST

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कश्मीरनामा: कश्मीर की निष्पक्ष कहानी कहती है ये किताब

साल 2018 में हिंदी की सबसे चर्चित किताबों की बात करें तो उसमें कश्मीरनामा का नाम निश्चित रूप से होगा. राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित अशोक कुमार पांडेय की किताब की चर्चा अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में भी रही. कश्मीर  हमेशा से लोगों के बीच चर्चा का विषय रहा है. ऐसे में कई लोगों के जेहन में सवाल उठता है कि क्या कश्मीरनामा कश्मीर से जुड़े सारे सवालों के जवाब देती है?

कश्मीर में बहुत सारे दायरे हैं, काले सफेद और ग्रे. हिंदुस्तान, पाकिस्तान और कश्मीर तीन ध्रुव हैं और इन तीन ध्रुवों पर खड़े लोगों के पास हर बात के तीन वर्जन हैं. ऐसे में 460 पेज का कश्मीरनामा हर बात का जवाब दे, उम्मीद करना बेमानी है. पढ़ने की सुविधा के लिए किताब को तीन हिस्सों में बांटा जा सकता है. एक जिसमें इतिहास, पुराण और मिथकों का जिक्र है. दूसरा अंग्रेजों के समय का कश्मीर जिसमें नेहरू, हरि सिंह, शेख अब्दुल्ला हैं. तीसरा कश्मीरी पंडितों और आतंकवाद से जूझता कश्मीर.

पौराणिक कहानियों और प्राचीन इतिहास वाले हिस्से की बात करें तो इसे पढ़ना मजेदार है. इसके साथ ही इसमें एक और खास बात है. अशोक कुमार पांडे लेफ्ट की विचारधारा से घोषित रूप से जुड़े हैं. इसके बावजूद पौराणिक कहानियों को काफी अच्छे ढंग से लिखा है. इसके साथ ही जहां कहीं लोक कहानियों का भूगोल से जुड़ाव दिखता है वहां भी वो उसे ईमानदारी से लिखते हैं. उनकी ये ईमानदारी बाकी किताब में भी दिखती है.

दूसरा हिस्से में शेख अबदुल्ला छाए रहते हैं, ज्यादातर हिस्से में अच्छे और कुछ जगहों पर बुरे. मसलन शेख अब्दुल्ला के भारत और कश्मीरियत की बात को ईमानदारी से उठाया गया है. इसके साथ ही जहां वो इस्लाम को कश्मीरियत के ऊपर रखने वाले बयान देते हैं वहां उनकी आलोचना भी की जाती है. कमोबेश इसी तरह का जिक्र हरि सिंह के बारे में मिलता है.

तीसरे हिस्से यानी कश्मीरी पंडितों का पलायन और घाटी में आतंकवाद थोड़ा निराश करता है. इससे पहले की घटनाओं का जितना विस्तृत जिक्र हम इस किताब में पाते हैं, उसकी तुलना में इस हिस्से को कम जगह मिली है. ये हिस्सा इतिहास से ज्यादा राजनीति के सिलेबस में है इसलिए इसको लिखने मे अतिरिक्त सावाधानी रखी गई है जो दिखती है. साथ ही साथ किताब के इस हिस्से में तस्वीरों का न होना अखरता है. कश्मीरी पंडितों का पलायन, सेना का मार्च, 80-90 के दशक का सुलगता कश्मीर, इन सबकी तस्वीरें होतीं तो किताब पढ़ने का अनुभव और बेहतर हो सकता था.

किताब में कुछ हिस्से हैं जो पढ़ने वालों को थोड़ा नया अनुभव देते हैं. जैसे विश्वयुद्ध और कश्मीर में रोजगार पर इसका असर. पटेल का कश्मीर को लेकर रुख. हालांकि पटेल वाले हिस्सों को पढ़कर लगता है कि इसपर और भी कुछ पढ़ा जाना चाहिए. चूंकि रिफरेंस दिए गए हैं, इससे आगे का कुछ पढ़ने और राय बनाने या बदलने का मौका बना रहता है.

फिर भी कुल मिलाकर किताब अच्छी है. इसमें लेखक की मेहनत झलकती है साथ ही निष्पक्ष रहने की कोशिश भी. हर बात का सही से रिफरेंस दिया गया है. किताब कश्मीर पर पाठक की तस्वीर साफ करती है, साथ ही मौका देती है कि आप इसके रेफरेंस में जाकर और जानकारी जुटा सकें.

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