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करगिल विजय दिवस: जब हमारा खुफिया तंत्र हारा था, बहादुर सैनिकों ने दिलाई थी जीत

भारतीय सेना यह युद्ध जीत गई लेकिन इसकी कीमत के तौर पर 1,363 सैनिक घायल हुए और 527 जवान शहीद, जिनकी शहादत की वीरगाथा के पीछे छुपकर जिम्मेदार लोगों ने निष्पक्ष आंकलन को भुलाने का प्रयास किया

Nitesh Ojha Updated On: Jul 26, 2018 07:21 AM IST

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करगिल विजय दिवस: जब हमारा खुफिया तंत्र हारा था, बहादुर सैनिकों ने दिलाई थी जीत

26 जुलाई 1999 आज से ठीक 19 साल पहले भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को करगिल से खदेड़ कर ऑपरेशन विजय को सफलता पूर्वक पूरा किया था. इसी दिन को भारत में करगिल विजय दिवस के रूप में अपनाया गया. असल में यह युद्ध जिसके जंग या मुठभेड़ होने पर अभी भी संशय है, भारत की कई मायनों मे हार थी. यह हार थी भारतीय खुफिया तंत्र की जो गहरी नींद मे था, जब पाकिस्तानी घुसपैठिए न केवल भारतीय क्षेत्रों में घुस रहे थे. बल्कि अपना हेलीपैड तैयार कर चुके थे. खुफिया तंत्र की यह नींद तब भी नहीं टूटी जब टाइगर हिल तक पाकिस्तानियों ने पांच सप्लाई रूट बना लिए थे.

पूर्व आईएएफ और आईडीएसए के निदेशक रहे जसजीत सिंह ने अपनी किताब 'करगिल 1999' में लिखा है कि सेना का खुफिया तंत्र तो काफी समय तक इसे छोटी-मोटी घुसपैठ ही मानता रहा. सेना की जागरुकता का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं कि 9 मई को सेना के नार्दन कमांड के कमांडर ले.जनरल हरी मोहन खन्ना छुट्टी पर चले गए थे. वरिष्ठ पत्रकार गौरव सावंत की किताब डेटलाइन करगिल में इस बात का जिक्र है. तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल वेद प्रकाश मलिक 10 मई को पोलैंड और चेक गणराज्य मे गुड विल यात्रा पर निकल गए थे.

21 मई को आर्मी चीफ वापस भारत आए और उन्होंने 23 मई को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट को घुसपैठ की पूरी जानकारी दी. जिसके बाद 26 मई को सेना द्वारा ऑपरेशन विजय और वायु सेना द्वारा ऑपरेशन सफेद सागर चलाया गया. यहां यह बताना जरूरी है कि करगिल में पहली शहादत 4 मई को हो गई थी. घुसपैठ की सूचना के बाद वहां पेट्रोलिंग करने गए कैप्टन सौरभ कालिया अपनी टीम के साथ 4 मई को शहीद हो गए थे. इसकी जानकारी कई दिनों बाद भारतीय सेना को मिली थी.

करगिल में राजनीतिक विफलता

राजनीतिक विफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि संचार की कमी के चलते तत्कालीन रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस 13 मई को करगिल गए और इस समस्या को 48 घंटों में सुलझा लेने का वायदा कर बैठे. जबकि सेना ने उनसे कहा था कि 48 घंटों में उन्हें समस्या की पूरी जानकारी प्राप्त हो जाएगी. वैसे साफ कर दिया जाए कि सरकार की ओर से भारतीय सेना और वायु सेना को किसी भी हाल मे सीमा पार करने की इजाजत नहीं थी.

इसी के साथ सरकार चाहती थी की युद्ध को जल्द से जल्द समाप्त किया जाए. जबकि सेना के वरिष्ठ अधिकारी करगिल में पीछे से पाकिस्तानी घुसपैठियों का सप्लाई रूट बंद करना चाहते थे. ताकि उन तक कोई मदद ना पहुंच सके और वह बुनियादी चीजों की कमी के बाद खुद आत्मसमर्पण कर दें.

करगिल शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

करगिल शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

आउटलुक में छपी खबर के मुताबिक एक जनरल ने कहा था कि इन खतरनाक पहाड़ों पर जवानों को भेजने के पहले योजना बनानी चाहिए थी. उनके मुताबिक पहाड़ को तीन तरफ से घेरकर हवाई हमला करने की योजना थी. इसका मकसद घुसपैठियों तक पहुंचाने वाली मदद को रोकना था. लेकिन राजनीतिक दवाब के चलते सेना प्रमुख त्वरित परिणाम चाहते थे.

यह जीत थी भारतीय सैनिकों के पराक्रम की

असल में यह जीत थी भारतीय सैनिकों के पराक्रम, नि:स्वार्थ लगन और भारतीय आर्टिलरी की तोपों और वायु सेना के विमानों की बेजोड़ गोलीबारी की. जिन्होंने रोजाना लगभग 5,000 राउंड दागे और पाकिस्तानी हौसलों को पस्त कर दिया. युद्धभूमि पर भारतीय सेना का नेतृत्व युवा कंपनी कमांडरों ने किया और दुर्गम घाटियों पर फिर से भारतीय तिरंगा लहरा दिया.

भारतीय सेना यह युद्ध जीत गई. लेकिन इसकी कीमत के तौर पर 1,363 सैनिक घायल हुए और 527 जवान शहीद. जिनकी शहादत की वीरगाथा के पीछे छुपकर इसके कई जिम्मेदार लोगों ने निष्पक्ष आंकलन को भुलाने का प्रयास किया. कई मायनों तक वे भारतीयों को भ्रम में डालने में सफल भी रहे. जैसे पाकिस्तान के खिलाफ पिछले युद्धों में होते आए हैं.

अपने से कई गुना छोटे देश पाकिस्तान से पहले युद्ध में जीत के बावजूद एक तिहाई कश्मीर उसे दे बैठे. तो बाकी युद्ध सैन्य समझौतों तक सीमित रह गए. और हर बार की तरह करगिल मे भी अपने ही क्षेत्र तक सीमित युद्ध को एक विशाल विजय मान कर भ्रम में जीने लगे हैं. पीछे एक अधकुचले शत्रु को छोड़ कर जो आए दिन फुंफकारता रहता है.

40 से ज्यादा के खिलाफ हुई कोर्ट ऑफ इंक्वायरी

सैन्य पराक्रम के लिए पहचाने जाने वाले करगिल युद्ध के खत्म होने के बाद तमाम विफलताओं के लिए कार्रवाई का सामना भी सैनिकों को ही करना पड़ा. भारतीय सेना के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब कम से कम 40 से ज्यादा अफसरों, जेसीओ और जवानों के खिलाफ कोर्ट ऑफ इंक्वायरी चली. इन पर आदेश की विफलता ( failure of command) और कायरता का आरोप लगा था. भारतीय सेना के इतिहास में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में अफसरों और जवानों के खिलाफ इंक्वायरी हुई थी. 1962 के युद्ध में हार के बाद भी इस तरह की कार्रवाई नहीं हुई थी.

इस युद्ध में अपनी जान की परवाह ना करते हुए कई युवा अफसरों ने इस असंभव मिशन में सर्वस्व न्योछावर कर दिया था. कैप्टन विक्रम बत्रा, कैप्टन मनोज पांडे, कैप्टन विजयंत थापर जैसे जवानों के पराक्रम की बदौलत हम यह युद्ध जीत गए.

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