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कामराज प्लान: जब नेहरू के कहने पर शास्त्री और मोरारजी जैसे नेताओं ने छोड़ी कुर्सी

उम्मीद थी कि कामराज प्लान से कांग्रेस को फायदा मिलेगा लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा

Updated On: Apr 16, 2018 08:43 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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कामराज प्लान: जब नेहरू के कहने पर शास्त्री और मोरारजी जैसे नेताओं ने छोड़ी कुर्सी

‘संसद का सत्र समाप्त हो जाने के बाद 1963 के मई या जून महीने में जवाहर लाल जी कश्मीर गए थे. वहां बीजू पटनायक से उनकी मुलाकात हुई थी. वहां से लौटने के बाद श्री पटनायक ने मुझे जवाहर लाल जी के साथ हुई मुलाकात की बात बताई थी. उस बातचीत में श्री पटनायक ने जवाहर लाल जी को एक योजना सुझाई जो बाद में ‘कामराज योजना’ के नाम से मशहूर हुई. कामराज ने अपनी ओर से वह योजना 1963 के जून के अंत या जुलाई में प्रस्तुत की.’ ये बातें पूर्व प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने अपनी जीवनी में लिखी हैं.

याद रहे कि ‘कामराज योजना’ के तहत जिन नेताओं को सरकार से हटा कर पार्टी के कामों में लगाया गया, उनमें बीजू पटनायक और मोरारजी देसाई भी शामिल थे. याद रहे कि 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय के बाद यह धारणा बन रही थी कि जनता के बीच कांग्रेस का प्रभाव कम हो रहा था. फिर से जनता से कांग्रेस को मजबूती से जोड़ने के लिए कुछ बड़े नेताओं को संगठन के काम में लगाने का निर्णय हुआ था. मूल योजना यह थी कि दो-तीन मुख्य मंत्रियों और राज्यों के कुछ मंत्रियों को उनके पदों से हटाया जाए. पर बाद में उस सूची में छह केंद्रीय मंत्रियों के नाम भी जोड़ दिए गए.

हटाए गए केंद्रीय मंत्रिमंडल में लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, एस. के. पाटील, जगजीवन राम और गोपाल रेड्डी प्रमुख थे. जिन मुख्य मंत्रियों से इस्तीफा लिया गया उनमें कामराज-मद्रास, बी. आर. मंडलोई-मध्य प्रदेश, विनोदानंद झा-बिहार, चंद्र भानु गुप्त-उत्तर प्रदेश शामिल थे. इसके साथ ही एक अनोखी राजनीतिक घटना भी हुई. आज के राजनीतिक हालात में तो उस तरह की घटना की कल्पना तक नहीं की जा सकती. उस समय नेशनल कांफ्रेंस के नेता गुलाम मुहम्मद बख्शी कश्मीर के मुख्य मंत्री थे. यानी वे कांग्रेस में नहीं थे. इसके बावजूद उन्होंने कहा कि ‘चूंकि इस योजना के तहत किसी मुसलमान नेता का इस्तीफा नहीं लिया जा रहा है, इसलिए मैं मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देता हूं ताकि देश में अच्छा संदेश जाए.’ साथ ही वे कांग्रेस में शामिल भी हो गए.

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भारत विभाजन के मुद्दे पर बैठक करते हुए नेहरू, माउंटबेटन और जिन्ना

उधर चंद्रभानु गुप्त मुख्य मंत्री पद से अपना इस्तीफा नहीं भेज रहे थे. क्योंकि बहुत दिनों बाद उन्हें सत्ता मिली थी. इस योजना के संबंध में मोरारजी देसाई से तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि आपको इस्तीफा दे देना चाहिए. इस पर देसाई ने कहा कि मुझे इस्तीफा देकर खुशी होगी. किंतु आप चंदभानु गुप्त से इस्तीफा न लें. क्योंकि इससे लोगों को लगेगा कि चूंकि आप उन्हें नापसंद करते हैं, इसलिए उन्हें हटना पड़ा. इसलिए इस पर थोड़ा और सोच लें. पर गुप्त जी को अंततः जाना ही पड़ा.

उसी दौरान मोरारजी देसाई और लाल बहादुर शास्त्री के बीच की एक दिन हुई बातचीत भी उल्लेखनीय है. शास्त्री जी ने मोरार जी देसाई से कहा कि मैंने स्वयं ही पद मुक्त होने का आग्रह किया है. इसलिए मैं तो मुक्त होऊंगा ही. पर आपको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है. आपके ऊपर यह योजना लागू नहीं होनी चाहिए. मोराजी देसाई के अनुसार ‘दूसरे दिन जवाहर लाल जी ने मुझे बुलाकर इस बारे में बातचीत की. उन्होंने कहा कि इस योजना के अंतर्गत अब मैं और आप दो ही वरिष्ठ बच रहे हैं. जिनमें से एक तो जाना ही चाहिए. मैं पद से न हटूं , ऐसा सबका आग्रह है. इसलिए मुझे लगता है कि संगठन के काम के लिए आपको ही पदमुक्त करना चाहिए. आखिर मोरार जी मुक्त हुए भी.

लाल बहादुर शास्त्री, के कामराज और जवाहरलाल नेहरू

लाल बहादुर शास्त्री, के कामराज और जवाहरलाल नेहरू

कामराज योजना के लागू होने के बाद सबसे पहला आम चुनाव सन 1967 में हुआ. उस समय तक लोक सभा और विधान सभाओं के चुनाव एक ही साथ होते थे. कुछ हलकों में यह उम्मीद की गयी थी कि कामराज योजना से कांग्रेस को चुनाव लाभ मिलेगा. पर ऐसा हुआ नहीं.

जिन छह राज्यों के मुख्य मंत्रियों को इस योजना के तहत हटाया गया था, उनमें भी सन 1967 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता से हट गयी. वैसे कुल नौ राज्यों में तब कांग्रेस हार गयी थी. राज्य स्तर पर कांग्रेस की आजादी के बाद की पहली बड़ी हार थी. उससे पहले सिर्फ केरल में कांग्रेस की चुनावी पराजय हुई थी.

कुल मिलाकर लोक सभा में भी कांग्रेस का बहुमत सन 1962 के मुकाबले घट गया. यानी बड़े नेताओं को सत्ता से हटा कर संगठन के कामों में लगाने का भी कोई राजनीतिक लाभ कांग्रेस को नहीं मिला था. क्योंकि अन्य कई कारणों से आम लोग कांग्रेस से नाराज थे.

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