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कमलेश्वर: आम आदमी के जीवन को कागज और पर्दे पर उकेरने वाला कथाकार

कमलेश्वर एक ऐसे कथाकार थे जो आम आदमी की परेशानियों को एक आम आदमी की निगाह से परख कर रचनात्मक अभिव्यक्ति देते थे

Updated On: Jan 27, 2018 12:38 PM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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कमलेश्वर: आम आदमी के जीवन को कागज और पर्दे पर उकेरने वाला कथाकार

कमलेश्वर हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए नई कहानी के एक प्रमुख कथाकार हैं तो 70 और 80 के दशक की फिल्मों और दूरदर्शन पर आने वाले सीरियलों के शौकीनों के लिए एक बेहतरीन पटकथा लेखक. मनोहर श्याम जोशी के अलावा हिंदी के किसी गंभीर कथाकार ने सिनेमा को साहित्य से जोड़ने का काम किया है तो वे कमलेश्वर ही हैं.

कमलेश्वर हिंदी साहित्य में नई कहानी के दौर से लेकर 90 के दशक के आखिर तक सक्रिय रहे. बदले दौर के साथ कमलेश्वर ने अपने लेखन में भी बदलाव किया. मोहन राकेश और राजेंद्र यादव के साथ-साथ कमलेश्वर भी नई कहानी दौर के प्रमुख लेखक थे.

इस दौर में उन्होंने राजा निरबंसिया, कस्बे का आदमी, मांस का दरिया जैसी प्रमुख कहानियां लिखीं. ये कहानियां किसी आग्रह या पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर नहीं लिखीं गई थीं. इन कहानियों में उस वक्त के जीवन का यथार्थ था. दरअसल यह यथार्थ आजादी के बाद के भारत का यथार्थ था. कमलेश्वर कस्बों में रहने वाले मध्यवर्ग और निम्न-मध्यवर्ग की कहानियां लिख रहे थे. आजादी के बाद यह वर्ग काफी तेजी से बढ़ा था और अपने वक्त के संकटों का सामना कर रहा था.

कमलेश्वर ने इस मध्यवर्ग की कहानी को सिनेमा और टीवी सीरियलों के माध्यम से भी पेश किया. आंधी, मौसम, सारा आकाश, रजनीगंधा, छोटी सी बात, मिस्टर नटवरलाल, सौतन जैसी फिल्मों की पटकथा कमलेश्वर ने ही लिखी थी. इसमें दिलचस्प तथ्य यह है कि रजनीगंधा फिल्म मन्नू भंडारी की कहानी ‘यही सच है’ पर बनी थी लेकिन जब फिल्म बनने की बात आई तो पटकथा कमलेश्वर ने लिखी.

कमलेश्वर फिल्मी दुनिया की तकनीकी बारीकियों से भी परिचित थे और साहित्य की संवेदना से भी. कई बार ऐसा होता है कि किसी साहित्य रचना पर बनी फिल्म उस रचना के मूल भाव से दूर हो जाती है. लेकिन रजनीगंधा फिल्म को देखने और यही सच है को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि फिल्म ने रचना के साथ बहुत हद तक न्याय किया है. ऐसा कमलेश्वर की वजह से ही संभव हो पाया.

कमलेश्वर ने इसके अलावा चंद्रकाता, दर्पण, और एक कहानी जैसे टीवी सीरियलों की भी पटकथा लिखी.

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यह भी एक तथ्य है कि जिस कमलेश्वर ने नई कहानी की शुरुआत में योगदान दिया था उसी कमलेश्वर ने 1972 में नई कहानी की प्रवृतियो में आए पतन को देखकर समांतर कहानी आंदोलन की शुरुआत की. इस कहानी आंदोलन में आम आदमी को वर्गों में न बांटकर एक संश्लिष्ट आम आदमी के रूप में देखा गया. इस दौर की कहानियों में आम आदमी के जीवन संघर्ष के बारे में लिखा गया.

कमलेश्वर ने कई उपन्यास भी लिखे. इनके अधिकतर उपन्यास आधुनिकता और परंपरा के संघर्ष को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं. अपनी कहानियों की तरह कमलेश्वर उपन्यासों में भी कस्बाई जीवन में आ रहे बदलावों को कथा में पिरोते हैं. कमलेश्वर को सबसे अधिक ख्याति उन्हें अपने अंतिम उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ से मिली. यह उपन्यास 2000 में प्रकाशित हुआ था.

इस उपन्यास के द्वारा कमलेश्वर ने मानव सभ्यता की पड़ताल करके मनुष्य को आपस में बांटने वाली प्रवृतियों को पहचानने की कोशिश की है. इस उपन्यास में इतिहास और समय नायक हैं. लेखक के पाकिस्तान किसी देश का नामभर नहीं है बल्कि उन सारी भावनों का प्रतीक है जो आज भी मनुष्य से मनुष्य को धर्म, जाति, संप्रदाय आदि के नाम पर बांट रही है. कितने पाकिस्तान के लिए कमलेश्वर को साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिला.

कमलेश्वर एक ऐसे कथाकार थे जो आम आदमी की परेशानियों को एक आम आदमी की निगाह से परख कर रचनात्मक अभिव्यक्ति देते थे.

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