S M L

काकीनाडा ऑपरेशनः इतिहास, कूटनीति और मानवीयता का त्रिकोण

काकीनाडा मिशन दिखाता है कि तटीय राज्य भारत की कूटनीति के लिए अहम साबित हो सकते हैं

Jitendra Nath Misra Updated On: Jan 11, 2018 09:23 AM IST

0
काकीनाडा ऑपरेशनः इतिहास, कूटनीति और मानवीयता का त्रिकोण

पिछले हफ्ते मैं अपने दोस्तों से मिलने और तटवर्ती आंध्र संस्कृति के बारे में सीखने के लिए काकीनाडा गया. लेकिन, मैंने पाया कि इस इलाके का ऐतिहासिक सामुद्रिक व्यापार पूरी तरह से भुला दिया गया है. जिन तीन कॉलेज के छात्रों से मैंने बात की उनमें से किसी को भी सातवाहन वंश के बारे में नहीं पता था, जिन्होंने तटीय आंध्र प्रदेश पर शासन किया था. द्राक्षरामम के भीमेश्वरा स्वामी मंदिर के पुजारी ने वीरता की रोचक कहानियां सुनाईं.

लेकिन, सातवाहन कौन थे? वे अपने दौर के महान भारतीय शासक थे. इतिहास में यह दर्ज है कि सातवाहन शासन के दौरान आंध्र प्रदेश बाहरी दुनिया से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ था. इस इलाके में रोमन सिक्के मिले हैं. इनसे पता चलता है कि किस तरह से भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अग्रणी था. यह सब भुला दिया गया है.

कौन कहता है भारत पूर्वी देशों से जुड़ा नहीं है?

एक घटना से इस भुला दी गई विरासत को लेकर मेरी दिलचस्पी बढ़ गई. यह मेरी ईस्ट गोदावरी जिले के कलेक्टर कार्तिकेय मिश्रा के साथ हुई मुलाकात थी. वह ऐसी जानकारी इकट्ठा कर रहे थे जो कि इतिहास को वर्तमान से, घरेलू राजनीति को विदेशी मामलों से और याद्दाश्त को वास्तविक रहन-सहन से जोड़ती है. मैं इस बात को लेकर आश्चर्यचकित था कि कैसे इतने कामों में उलझा हुआ कलेक्टर यह सब कर सकता है.

मिश्रा ने 22 सितंबर 2017 को विदेश मंत्रालय से आई एक कॉल के बारे में मुझे बताया. इस कॉल में उनसे एक मानवीय मदद ऑपरेशन को समयबद्ध और तत्काल रूप से चलाने के लिए कहा गया था. इसमें उनसे कहा गया, ‘सरकार इसे टॉप प्रायोरिटी दे रही है, ऐसे में इस काम को उचित रूप से करना सुनिश्चित करें.’

जिला प्रशासन को चटगांव में रोहिंग्या शरणार्थियों के लिए खरीदारी, पैकेजिंग और लोडिंग के काम में नैफेड की मदद करनी थी. मिश्रा ने कहा, ’48 घंटे के भीतर सामान जुटा लिया गया, इसे बोरों में भरा गया और भारत सरकार की ओर से एक बांग्ला में मैत्री संदेश के साथ इसे आईएनएस घड़ियाल में चटगांव को 25 सितंबर को रवाना कर दिया गया.’

इस तुरत-फुरत किए गए काम से मिश्रा और उनकी टीम ने गुजरे वक्त को फिर से जिंदा कर दिया था. इस शिपमेंट की अहमियत बाद में समझ आई. बांग्लादेश और यहां तक कि म्यांमार में भी कूटनीतिक तौर पर गर्माया हुआ माहौल कुछ ठंडा पड़ा. शरणार्थियों के कैंप्स में बीमारियां फैल रही थीं और यह संकट तत्काल हल किया जाना जरूरी था. ऐसे में एक मानवीय मदद से बेहतर और क्या हो सकता था?

कौन कहता है कि भारत ने पूर्वी देशों के साथ कनेक्टिविटी के लिए कुछ काम नहीं किया है? दो अहम पड़ोसियों से संबंधित मामले में किया गया यह काम एक अलग ही तस्वीर दिखाता है. बांग्लादेश के लिए यह भाईचारे के लिए किया गया काम था, वहीं, म्यांमार के लिए इसने रोहिंग्या मसले की हैंडलिंग को लेकर हो रही आलोचना से ध्यान हटा दिया.

मयांमार को मदद

शरणार्थियों को राहत पहुंचा कर भारत ने म्यांमार के कंधों पर एक नैतिक बोझ डाल दिया था. भारत ने बांग्लादेश की वाहवाही भी हासिल की. साथ ही म्यांमार के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को भी बरकरार रखा. यह एक स्मार्ट कदम था जिसने इन तीनों देशों के हितों को पूरा किया. यह एक उदार अंतरराष्ट्रीयकरण का उदाहरण था. हालांकि, इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिए कि रोहिंग्या मसले पर भारत के कई स्तरों पर किए गए मानवीयता के आधार कामों की ज्यादा खबरें नहीं आईं.

भारत के लोगों को इस तरह की अहम गतिविधियों की शायद ही कोई जानकारी हो. यहां तक कि अगर काकीनाडा शिपमेंट हमारी पूर्वी देशों के साथ ऐतिहासिक सामुद्रिक गतिविधियों की यादों को ताजा करती है, तब भी स्थानीय स्तर पर लोग इससे अनभिज्ञ ही हैं.

इस ऑपरेशन के साथ काकीनाडा लोकल को रीजनल के साथ जोड़ता है और इससे हमारी आपस में जुड़ी हुई तकदीर को और मजबूत करता है. काकीनाडा भारत की कूटनीतिक पहुंच में भी योगदान देता है. मेरी बात जिन लोगों से हुई उनमें केवल जिला कलेक्टर ही इस बात को समझते हैं.

स्थानीय सामान को मानवीय मदद के लिए पहुंचाना और राज्य सरकार को केंद्र सरकार के साथ कनेक्ट करना इस ऑपरेशन का वास्तविक काम था. इस काम के पूरा होने के बाद यह महसूस हुआ है कि तटीय राज्य भारत की नई कूटनीति के लिए काफी अहम साबित हो सकते हैं. सहयोगात्मक संघवाद भारत के लिए एक अच्छी चीज है.

इंसान प्रतिस्पर्धा करने और सत्ता का खेल खेलने के लिए बने हैं. लेकिन, ये सामुदायिक भावना देने की क्षमता भी रखते हैं. किसने सोचा था कि काकीनाडा इतना बड़ा मानवीय रोल निभाने में सफल होगा?

ऐसे में कनेक्टिविटी केवल एक आकांक्षा नहीं है. वादों को हकीकत में न बदलने के लिए सरकार की खूब बुराई की जा सकती है, लेकिन विदेश मंत्रालय राज्यों की उसकी कूटनीतिक पहुंच में अहमियत को अच्छे से समझता है. स्टेट्स डिवीजन बनाना कोई यूं ही लिया गया फैसला नहीं है.

2004 में भारत का सुनामी पर उठाया गया तत्काल कदम याद कीजिए. बांग्लादेश और म्यांमार में जो भी होता है उसका असर भारत पर भी पड़ता है. लेकिन, काकीनाडा में जो होता है वह भी चटगांव में इंसानों के भाग्य को प्रभावित करता है. साथ ही यह बांग्लादेश और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों के साथ गणित को भी तय करता है.

(जितेंद्र नाथ मिश्रा एक रिटायर्ड राजदूत हैं और जवाहरलाल नेहरू हॉकी टूर्नामेंट सोसाइटी के वाइस प्रेसिडेंट हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Test Ride: Royal Enfield की दमदार Thunderbird 500X

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi