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काका हाथरसी: आज की कॉमेडी की तरह उनका हास्य कुंठा से भरा नहीं था

आज काका हाथरसी की जन्मतिथि-पुण्यतिथि दोनों है

Alok Puranik Alok Puranik Updated On: Sep 18, 2017 10:18 AM IST

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काका हाथरसी: आज की कॉमेडी की तरह उनका हास्य कुंठा से भरा नहीं था

हंसना मुश्किल काम है और हंसाना और भी ज्यादा मुश्किल और उस पर भी ऐसे हंसाना, जिसमें दूसरों का अपमान ना किया गया हो, जिसमें कुंठाएं ना झलकती हों, बहुत  मुश्किल काम हैं. बहुत लोग हंसा देते हैं. कपिल शर्मा हाल तक हंसाते रहे हैं, कपिल शर्मा के शो में एक बुआजी नामक चरित्र की महिला होती थी, जो अविवाहित दिखायी जाती थीं और खासी बड़ी उम्र की होती थीं.

इस अविवाहित बुआजी को कई स्टारों के साथ अपना चक्कर चलाते हुआ दिखाया जाता था, यह बहुत अपमानजनक होता था. ऐसा हंसाना सार्थक नहीं है. काका हाथरसी ने बरसों बरस पब्लिक को हंसाया पर सहज हास्य से. काका हाथरसी उन चुनिंदा लोगों में हैं, जिनकी जन्मतिथि और पुण्यतिथि दोनों एक ही दिन में पड़ती है- 18 सितंबर. 18 सितंबर, 1906 को जन्मे काका 18 सितंबर, 1995 को इस दुनिया से विदा हुए. जिस दिन बंदा पैदा हो, उसी दिन अनंत यात्रा पर निकल ले, तो एक चक्र संपूर्ण हुआ माना जाना चाहिए.

हास्य को केंद्र में लाए

काका हाथरसी ने कविता के मंच पर हास्य को स्थापित किया, पचास के दशक में काका हाथरसी कविता के मंच पर आये, तब मंच पर गीतों का बोलबाला था. हास्य को बहुत कम जगह मिलती थी. काका हाथरसी के आने के बाद हाल यह हुआ कि जिसे कवि सम्मेलन कहा जाता था, वह हास्य-कवि सम्मेलन हो गया. हास्य हाशिए से उठकर केंद्र में आ गया. काका  हाथरसी को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए.

काका हाथरसी, नीरज और बालकवि बैरागी, यह त्रयी एक दौर में कवि सम्मेलन की सफलता की गारंटी मानी जाता थी. काका हाथरसी हास्य के थे, नीरज प्रेम-श्रृंगार और बालकवि बैरागी ओज-वीर रस के कवि थे. पचास, साठ, सत्तर के दशकों तक यह तिकड़ी बहुत सक्रिय रही. काका हाथरसी की नकल पर कई हास्य कवि हाथरस से आये, पर कोई भी काका  जैसा कमाल ना पैदा कर पाया.

काका की खासियत यह थी कि उनका  हास्य अ-कुंठ था, कुंठाविहीन सहज हास्य, स्थितियों  से उपजता हुआ. स्थितियों के गहरे ऑब्जर्वेशन से उपजा हुआ. काका की एक रचना ‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’ इसका प्रमाण देती है. इसके कुछ अंश देखिए-

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?

नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और.

शक्ल-अक्ल कुछ और नैनसुख देखे काने,

बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने.

कह ‘काका’ कवि, दयारामजी मारे मच्छर,

विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर.

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,

श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप.

पूरी कविता आसपास उपलब्ध नामों में झांकती विसंगतियों को चीन्हती चलती है. काका हाथरसी ने सहज हास्य रचने में प्रतिमान कायम किए.

बहु-प्रतिभावान होने के खतरे

काका हाथरसी संगीत के बड़े जानकार थे, इतने बड़े कि उनकी लिखी एक किताब अब भी तमाम संगीत विद्यालयों में चलती है. पर काका हाथरसी ने ब्रांडिंग के एक नियम के तहत अपनी इस प्रतिभा का ज्यादा प्रचार प्रसार नहीं किया. बतौर हास्य कवि शोहरत हासिल हो गयी,  उसमें अगर संगीत का छौंक लगाया जाता, तो शायद ब्रांड डाइल्यूशन या ब्रांड संकोचन हो जाता.

काका एक वक्त चैन की बांसुरी बजाते थे, पर बाद में हास्य कविता के सुपर स्टार हो गये. काका के हास्य से नयी पीढ़ी उतनी वाकिफ नहीं है, जितना होना चाहिए. कुछ ऐसा संस्थागत इंतजाम होना चाहिए कि हम हास्य कविता और समग्र कविता में अपने बुजुर्गों के कामकाज से लगातार वाकिफ होते रहें. हास्य कविता मंचों पर धुआंधार जमती है, पर तमाम पाठ्यक्रमों में इसे वह सम्मान नहीं मिलता है, जो इसे मंचों पर मिलता है.

काका हाथरसी के नाम पर एक हास्य-पुरस्कार भी स्थापित किया गया. सबसे पहला काका हाथरसी सम्मान हास्य कवि स्वर्गीय ओमप्रकाश आदित्य को दिया गया. बाद में इस पुरस्कार को हासिल करनेवालों में स्वर्गीय शरद जोशी, प्रोफेसर अशोक चक्रधर प्रमुख रहे हैं. इन  पंक्तियों के लेखक को भी यह पुरस्कार (2012) में मिल चुका है.

काका हाथरसी की एक और कविता

जय बोलो बेईमान की!

चैक केश कर बैंक से, लाया ठेकेदार,

आज बनाया पुल नया, कल पड़ गई दरार.

बांकी झांकी कर लो काकी, फाइव ईयर प्लान की,

जय बोलो बईमान की!

वेतन लेने को खड़े प्रोफेसर जगदीश,

छह सौ पर दस्तखत किए, मिले चार सौ बीस.

मन ही मन कर रहे कल्पना शेष रकम के दान की,

जय बोलो बईमान की!

खड़े ट्रेन में चल रहे, कक्का धक्का खाए,

दस रुपए की भेंट में, थ्री टायर मिल जाए.

हर स्टेशन पर हो पूजा श्री टी.टी. भगवान की,

जय बोलो बईमान की!

बेकारी औ’ भुखमरी, महंगाई घनघोर,

घिसे-पिटे ये शब्द हैं, बंद कीजिए शोर.

अभी जरूरत है जनता के त्याग और बलिदान की,

जय बोलो बईमान की!

मिल-मालिक से मिल गए नेता नमक हलाल,

मंत्र पढ़ दिया कान में, खत्म हुई हड़ताल.

पत्र-पुष्प से पाकिट भर दी, श्रमिकों के शैतान की,

जय बोलो बईमान की!

न्याय और अन्याय का, नोट करो जिफरेंस,

जिसकी लाठी बलवती, हांक ले गया भैंस.

निर्बल धक्के खाए, तूती होल रही बलवान की,

जय बोलो बईमान की!

पर-उपकारी भावना, पेशकार से सीख,

दस रुपए के नोट में बदल गई तारीख.

खाल खिंच रही न्यायालय में, सत्य-धर्म-ईमान की,

जय बोलो बईमान की!

नेता जी की कार से, कुचल गया मजदूर,

बीच सड़कर पर मर गया, हुई गरीबी दूर.

गाड़ी को ले गए भगाकर, जय हो कृपानिधान की,

जय बोलो बईमान की!

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