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जोश मलीहाबादी: जिसके सामने फ़रिश्ता भी हाथ जोड़े रहता था

जोश की शायरी में एक शायर का प्रभुत्व जगह जगह बिखरा पड़ा है जिससे हम अनजान रह जाते हैं

Nazim Naqvi Updated On: Feb 22, 2018 01:21 PM IST

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जोश मलीहाबादी: जिसके सामने फ़रिश्ता भी हाथ जोड़े रहता था

‘जोश’ एक ऐसा शब्द है जिसके बगैर इंक़लाब की बात ही नहीं हो सकती. और जोश जिस का नाम हो उसके इंकलाबी होने में शक की क्या गुंजाइश रह जाती है. जी हां, आज हम जिस जोश को याद कर रहे हैं वो 1982 में आज ही के दिन इस दुनिया से रुखसत हो गया.

शब्बीर हसन खां ‘जोश मलीहाबादी’. घन-गरज का शायर जिसे उसके चाहने वाले साहित्यप्रेमी ‘शायर-ए-इंकलाब’ कहते हैं. वह इंसानियत का पुजारी था. और इंसानियत के लिए पूरी उम्र लगा रहा. आज की पीढ़ी जोश की शायरी से नावाकिफ है तो इसकी बड़ी वजह यह है कि जिस उर्दू में जोश साहब शायरी करते थे वो जरा मुश्किल उर्दू है. हिंदुस्तान में हिंदी पाठक जिस उर्दू से वाकिफ हैं वो थोड़ी आसान है. लेकिन जोश साहब की या उस दौर के किसी भी शायर की, मिसाल के तौर पर फिराक़ गोरखपुरी की जबान आम हिंदी पाठकों के सिर के ऊपर से निकल जाने वाली शब्दावली है. उदाहरण के लिए फिराक़ साहब का यह शेर देखिए-

गम तेरा जलवा-गह-ए-कौन-ओ-मकां है कि जो था,

यानी इंसान वही शोला-ब-जां है कि जो था...

इस तरह की उर्दू पकिस्तान में भले ही लिखी-पढ़ी जाती हो, हिन्दुस्तान के आम पाठकों की जुबान नहीं है. आज के दौर की अभिव्यक्ति पर भले ही इसका असर न पड़ा हो लेकिन इस अनभिज्ञता का ये नुकसान तो बहरहाल हुआ ही है कि पिछले दौर की उर्दू में रची-बसी उस अभिव्यक्ति से हम अनजान हैं. और ये नुकसान तब बड़ा हो जाता है जब जोश मलीहाबादी को समझने से हम महरूम रह जाते हैं.

जोश की घन-गरज कमाल की थी. लेखक कोशिश करेगा एक रुबाई से आपको परिचित कराने की. जोश की शायरी जिस ऊंचाई पर थी उसका एक नमूना देखिए. पहले उनकी वह रुबाई, फिर उसे समझने की कोशिश.

ये रात गए ऐने तरब के हंगाम

परतौ ये पड़ा पुश्त से किसका सरे जाम?

'ये कौन है?' जिब्रील हूँ 'क्यों आए हो?'

'सरकार! फलक के लिए कोई पैगाम'

इसको यूँ समझिये – (पहली पंक्ति) ‘देर रात गए जब मैं परम आनंद में डूबा हुआ हूं’ (दूसरी पंक्ति) ‘ये किसका प्रतिबिंब है जो मेरी पीठ पीछे से मेरे जाम में पड़ रहा है?’ (तीसरी पंक्ति) 'ये कौन है' मैं जिब्रील हूँ (वह फ़रिश्ता जो ईश्वर-दूत को अल्लाह के सन्देश देने आता था) 'क्यों आए हो?' (चौथी पंक्ति) जिब्रील जवाब देता है ‘सरकार! आसमान यानी अल्लाह के लिए कोई सन्देश तो नहीं है आपका.'

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इस तरह की अभिव्यक्ति हमारी शायरी में कहीं और नहीं मिलती. इस तरह की घन-गरज जिसमें आसमां से संदेश लाने वाला खुद जोश से पूछ रहा हो कि सरकार मैं वापिस जा रहा था, सोचा आपसे पूछ लूं कि कहीं आपका आसमान के लिए कोई संदेश तो नहीं है. जोश की शायरी में एक शायर का प्रभुत्व जगह जगह बिखरा पड़ा है जिससे हम अनजान रह जाते हैं.

पाकिस्तान जाने का अफसोस

उर्दू-अदब के इतिहास में जब नामवर लोगों का जिक्र होता है तो शब्बीर हसन खां ‘जोश’ मलीहाबादी का नाम लिए बगैर बात मुकम्मल नहीं होती. ब्रिटिश इंडिया से भारत को आजाद कराने की मुहिम में जोश ने अपनी कलम से वह चिंगारियां पैदा कीं, जिसने देशवासियों में इंकलाब का जूनून पैदा कर दिया. उनकी इन सेवाओं के लिए उन्हें 1954 में पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया. 58 में वो पकिस्तान चले गए, यह एक ऐसा फैसला था जिसपर वह आखिरी वक्त तक अफसोस करते रहे. ईस्ट-इंडिया कंपनी को संबोधित करती हुई उनकी कुछ पंक्तियों पर नजर डालिए-

किस ज़बां से कह रहे हो आज तुम सौदागरों

दहर में इंसानियत के नाम को ऊंचा करो

जिसको कहते हैं सब हिटलर भेड़िया है भेड़िया

भेड़िये को मार दो गोली पए-अम्नो-बक़ा (अमन और शांति के लिए)

हाथ है हिटलर का रख्श-ए-खुद्सरी की बाग पर (बे-लगाम घोडा)

तेग का पानी छिड़क दो जर्मनी की आग पर

अपने ज़ुल्म-ए-बे-निहायत का फ़साना याद है

कंपनी का फिर वो दौर-ए-मुजरिमाना याद है

लूटते फिरते थे जब तुम कारवां दर कारवां

सर-बरहना फिर रही थी दौलत-ए-हिन्दोस्तां

क्या अवध की बेगमों का भी सताना याद है

याद है झांसी की रानी का ज़माना याद है

ज़ेहन में होगा ये ताज़ा हिंदियों का दाग भी

याद तो होगा तुम्हें जलियान वाला बाग़ भी

वो भगत सिंह अब भी जिसके गम में दिल नाशाद है

उसकी गर्दन में जो डाला था वो फंदा याद है

खैर ए सौदागरों अब है तो बस इस बात में

वक़्त के फरमान के आगे झुका दो गर्दनें

इक कहानी वक़्त लिक्खेगा नए मजमून की

जिसकी सुर्खी को ज़रुरत है तुम्हारे खून की

वक़्त का फरमान अपना रुख बदल सकता नहीं

मौत टल सकती है, अब फरमान टल सकता नहीं

उस ज़माने के हिंदुस्तान में तीन दोस्तों का जिक्र अक्सर होता था. इनमें जोश के अलावा एक थे जवाहरलाल नेहरू और दूसरे थे फिराक गोरखपुरी. जोश की मशहूर किताब यादों की बारात में इन नजदीकियों को महसूस किया जा सकता है. इसके अलावा जोश मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से भी नजदीक थे. जवाहर लाल नेहरू आखिरी वक्त तक यह कोशिश करते रहे कि वह पकिस्तान न जाएं मगर जोश साहब जब एक बात ठान लेते थे तो उससे मुकरना जरा मुश्किल काम था.

josh-malihabadi

विरासत को संभाला और संवारा

लखनऊ के पास आमों के लिए मशहूर जगह मलीहाबाद के थे जोश और इसीलिए खुद अपनी पहचान जोश मलीहाबादी के तौर पर करते-कराते थे लेकिन कम लोग जानते हैं कि दरअसल उनका ताल्लुक फाटा यानी फ्रंटियर प्रोविंस में पश्तूनों के आफ़रीदी कबीले से था. मुगलों के आखिरी दौर में जोश के पुरखे यूपी के मलीहाबाद में आकर बसे. ये घराना फ्रंटियर में भी अदब और साहित्य की खिदमत के लिए पहचाना जाता था और यहां आकर भी उनके परदादा नवाब फ़कीर मुहम्मद खां और दादा मुहम्मद अहमद खां और पिता बशीर अहमद खां ने साहित्य और अदब की सेवा को ही अपना मिशन बनाए रखा. जाहिर है जोश को यह सबकुछ विरासत में मिला था जिसे उन्होंने और सजाया-संवारा.

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जोश ने 1914 में सेंट पीटर्स कॉलेज आगरा से कैम्ब्रिज पास किया और अरबी और फारसी के अलावा संस्कृत की शिक्षा भी टैगोर यूनिवर्सिटी से हासिल की. लेकिन 1916 में पिता की मौत के बाद पढ़ाई का सिलसिला रुका और शायरी  और अंग्रेजी साहित्य का उर्दू में अनुवाद का पुश्तैनी काम शुरू हुआ. 1925 में हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में मुलाजमत भी की लेकिन जोश की रगों में तो इंकलाब मचल रहा था इसलिए निजाम हैदराबाद की हुकूमत के खिलाफ एक जोशीली नज़्म लिख डाली और उन्हें हैदराबाद की रियासत से निकाल दिया गया.

जोश भर देने वाले जोश मलीहाबादी

इसी बीच हिंदुस्तान में आजादी का आंदोलन शुरू होने पर ये ‘शायर-ए-इंकलाब’ अंग्रेजों के खिलाफ अपने लेखों और नज्मों से आग उगलने लगा. जिन मुशायरों या सियासी जलसों में उनकी नज्में पढ़ी जातीं वहां ऐसा माहौल हो जाता जैसे पूरा मजमा निहत्था ही अंग्रेजों पर टूट पड़ेगा और उनकी तोपें कुछ काम न आएंगी.

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जोश की शख्सियत का एक पहलू यह भी था कि वह बहुत ही खुशदिल और हाजिरजवाब इंसान थे. उनके कई किस्से बहुत मशहूर हैं. इन्हीं में से एक किस्सा उनकी शराब नोशी को लेकर भी है. जोश साहब को रोजाना शराब पीने की आदत थी. लिहाजा शाम होते ही उनकी बेगम अंदर से पैग बना-बनाकर भेजती रहती थीं और ये सिलसिला कोई चार घंटे चलता था, यानी रात के खाने तक. एक शाम आज़ाद अंसारी भी उनके साथ थे, जिन्हें उनकी बेगम पसंद नहीं करती थीं. जोश ने उस शाम जब शराबनोशी के लिए अंदर पैगाम पहुंचाया तो बजाय पैग के पूरी बोतल भेज दी गई. जोश काफी देर तक सोडा आने का इंतजार करते रहे, आधे घंटे बाद भी जब सोडा न मिला तो बेगम को बाहर तलब किया और बड़ी नरमी से ये शेर पढ़ा –

कश्ती-ए-मय को हुक्मे रवानी भी भेज दो

जब आग भेज दी है तो पानी भी भेज दो

इसी तरह मुंबई के एक मुशायरे का किस्सा भी बहुत मशहूर है. जोश साहब अपनी एक नज़्म पढ़ रहे थे जिसपर उन्हें खूब दाद मिल रही थी. इस मुशायरे का संचालन उर्दू के मशहूर शायर कुंवर महेंद्रसिंह बेदी कर रहे थे. उन्होंने जोश को भरपूर दाद देते हुए दर्शकों की तरफ देखा और कहा ‘हजरात मुलाहिजा करें एक पठान इतनी अच्छी नज़्म सुना रहा है’ जोश फ़ौरन हाज़िरजवाबी के साथ बोले ‘हजरात यह भी मुलाहिजा करें कि एक सरदार इतनी अच्छी दाद दे रहा है’ और ये सुनते ही पूरा मुशायरा हंस-हंसकर लोट-पोट हो गया.

एक किस्सा मौलाना मौदूदी का भी है. मौलाना और जोश के बीच बड़े अच्छे ताल्लुकात थे. जब वो काफी दिनों के बाद जोश से मिलने आए तो उन्होंने इसका सबब पूछा. मौलाना ने कहा ‘क्या बताऊं जोश साहब पहले एक गुर्दे में पथरी थी, उसका ऑपरेशन हुआ फिर अब दूसरे गुर्दे में भी पथरी निकल आई’. जोश ने फ़ौरन मुस्कुराते हुए कहा ‘मौलाना अल्लाह ताला आपको अंदर से संगसार (पत्थर मारना) कर रहा है’.

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