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जॉनी वॉकर: शराब से ज्यादा नशीला था इस कलाकार की कॉमेडी का पैग

26 रुपए की बस कंडक्टरी की नौकरी करने वाले शख्स के लिए एक फिल्म में छोटे रोल के 80 रुपए मिलना अंधेरी रात में 'चांद' मिलने के समान था.

Rituraj Tripathi Rituraj Tripathi Updated On: Jul 29, 2018 05:05 PM IST

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जॉनी वॉकर: शराब से ज्यादा नशीला था इस कलाकार की कॉमेडी का पैग

शराब को लोग यूं ही बदनाम करते हैं, असली नशा तो जिंदगी में होता है. अक्सर जाम छलकाते हुए शराबी यह कहते मिल ही जाएंगे. वहीं जिक्र अगर जॉनी वॉकर का हो तो फिर आपको कुछ कहने-सुनने की जरूरत ही नहीं है. एक सच्चा शराबी खुद ही मोर्चा संभाल लेगा, आखिर दुनिया की सबसे पसंदीदा और महंगी शराब की बात हो रही है.

लेकिन ठहरिए, यहां बात शराब की नहीं हो रही बल्कि उस कलाकार की हो रही है जिसने अपनी कॉमेडी का जाम पिलाकर पूरी दुनिया को अपना दीवाना बना दिया. जॉनी वॉकर, यही नाम था उस कलाकार का. 50 और 60 के दशक में बॉलीवुड की फिल्मों में कॉमेडी रोल करने वाला एक ऐसा शख्स जिसने अपनी अदाकारी और हास्य के जरिए सालों तक दर्शकों के दिल पर राज किया.

आज यानि रविवार को उनकी पुण्यतिथि है और यह उनसे जुड़ी कई दिलचस्प बातों को याद करने का दिन है. मध्यप्रदेश के इंदौर में 11 नवंबर 1926 को मिडिल क्लास परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ था. बच्चे का नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी रखा गया.

उम्र बढ़ने के साथ-साथ बदरुद्दीन को फिल्मों का शौक लग गया. हालात कुछ ऐसे बने कि उनके पिता इंदौर की जिस मिल में काम करते थे, वह बंद हो गई. इस वजह से पूरा परिवार 1942 में मुंबई आ गया.

फिल्मों में काम करने की ख्वाहिश और बस कंडक्टर से शुरुआत

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मुंबई आने के बाद बदरुद्दीन के 15 लोगों के परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ती जा रही थी, इसलिए उनके पिता ने एक पुलिस इंस्पेक्टर से बात की और उनकी सिफारिश से बदरुद्दीन को बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई. इस नौकरी से बदरुद्दीन बहुत खुश हुए क्योंकि पगार के तौर पर उन्हें 26 रुपए मिलते थे साथ में मुफ्त मुंबई घूमने को मिलता था. बस कंडक्टर के तौर पर कई बार उन्हें बॉम्बे स्टूडियो भी जाने का मौका मिला.

जब वह कंडक्टरी करते थे तो आवाज लगाते थे, 'माहिम वाले पैसेंजर उतरने को रेडी हो जाओ, लेडीज लोग पहले'. उनके बोलने का अंदाज इतना निराला था कि लोगों की हंसी छूट जाती थी. कंडक्टरी करने के दौरान ही बदरुद्दीन की मुलाकात फिल्मी खलनायक एन.ए.अंसारी और के आसिफ के सेक्रेटरी रफीक से हुई. उन्हें भीड़ में खड़े रहने के लिए 5 रुपए मिलने लगे. फिर लंबे संघर्ष के बाद बदरुद्दीन को एक फिल्म में छोटा सा रोल मिला.

इस फिल्म का नाम था 'आखिरी पैमाने'. इस रोल के लिए बदरुद्दीन को 80 रुपए मिले थे. 26 रुपए की नौकरी करने वाले शख्स के लिए एक छोटे से रोल के 80 रुपए मिलना अंधेरी रात में 'चांद' मिलने के समान था. इसके बाद मशहूर अभिनेता बलराज साहनी की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने बदरुद्दीन को फिल्म डायरेक्टर गुरुदत्त से मिलने की सलाह दी. सलाह मानकर बदरुद्दीन गुरुदत्त के पास पहुंचे और एक शराबी का अभिनय करके दिखाया.

उनके अभिनय को देखकर गुरुदत्त को लगा कि बदरुद्दीन ने सच में शराब पी रखी है लेकिन जब उन्हें पता लगा कि ऐसा कुछ नहीं है तो उन्होंने खुश होकर बदरुद्दीन को 'बाजी' फिल्म में काम दे दिया.

शराब न छूने वाले बदरुद्दीन का जॉनी वॉकर बनना और छा जाना

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कहा जाता है कि गुरुदत्त की मेज पर उस समय सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली शराब जॉनी वॉकर रखी थी. गुरुदत्त को पता नहीं क्या सूझा और उन्होंने बदरुद्दीन को जॉनी वॉकर कहकर पुकारा. बदरुद्दीन को यह नाम बहुत पसंद आया और उन्होंने हमेशा के लिए अपना नाम जॉनी वॉकर रख लिया. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि शराबी का अभिनय करने वाले और खुद को जॉनी वॉकर कहलवाने वाले बदरुद्दीन ने असली जिंदगी में कभी शराब को हाथ नहीं लगाया.

उन्होंने गुरुदत्त के साथ कई फिल्में की. इन फिल्मों में आर-पार, मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा, चौदहवीं का चांद, कागज के फूल सुपरहिट साबित हुईं. इसके अलावा जॉनी वॉकर ने चोरी-चोरी, मुगल-ए-आजम, मधुमति, मेरे महबूब, नया अंदाज, टैक्सी ड्राइवर, देवदास और बहू बेगम जैसी कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया. अपनी कॉमेडी से दर्शकों को गुदगुदाने वाले जॉनी वॉकर की लोकप्रियता का आलम यह था कि उस दौर के डायरेक्टर अपनी फिल्म में उनके ऊपर एक गाना जरूर फिल्माते थे.

सीआईडी फिल्म में उन पर फिल्माए गाने 'ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हट के जरा बच के ये है बंबई मेरी जान' ने धूम मचा दी थी. 'नया दौर' फिल्म में उनका गाना 'मैं बंबई का बाबू' और 'मधुमति' फिल्म का गाना 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' उन दिनों काफी पसंद किया गया था. इसके अलावा मिस्टर एंड मिसेज 55 फिल्म का गाना 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' और 'प्यासा' फिल्म का गाना 'सर जो तेरा चकराए' भी खूब हिट हुआ था.

फाइनेंसर और डिस्ट्रीब्यूटर की मांग रहती थी कि फिल्म में एक गाना जॉनी वॉकर के ऊपर जरूर होना चाहिए. जॉनी वॉकर ने करीब 10 से 12 फिल्म में हीरो का रोल भी निभाया. 1968 में आई फिल्म 'शिकार' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार मिला. अपने पूरे करियर में करीब 300 फिल्में करने वाले इस कलाकार ने 29 जुलाई 2003 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

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