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‘अ’स्वस्थ तंत्र' पार्ट 6: इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए चीन के भरोसे है विकसित भारत!

चीन के सामान पर बार-बार बैन की मांग करने वालों को कुछ तथ्य समझ लेने चाहिए

Ashutosh Kumar Singh Updated On: Sep 20, 2017 08:50 AM IST

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‘अ’स्वस्थ तंत्र' पार्ट 6: इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए चीन के भरोसे है विकसित भारत!

पाठकों को यह शीर्षक सुन-पढ़ कर थोड़ा अटपटा लग रहा होगा. लेकिन सच्चाई यही है. हमने बीमारी जापान से आयात की और इसके बचाव के लिए टीका चीन से मंगाते हैं. जी उसी चीन से जो आजकल भारत का जानी दुश्मन बना हुआ है. सुरक्षा परिषद से लेकर डोकलाम तक भारत के लिए सिरदर्द बना हुआ है. जिसके खिलाफ खूब आंदोलन हो रहे हैं. उसी दुश्मन के भरोसे हमारे देश के नौनिहालों की जान को छोड़ दिया गया है. चीन से आयातित टीके ही जापानी इंसेफलाइटिस प्रभावित राज्यों में नौनिहालों को लगाए जा रहे हैं.

धरातल पर कब उतरेगी सरकार

जापानी इंसेफेलाइटिस/एक्यूट इंसेफलाइटिस ने उत्तर प्रदेश सहित देश के 19 राज्यों के 171 जिलों को अपनी चपेट में ले लिया है. यूपी का पूर्वांचली क्षेत्र इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित है. इस बीमारी ने यूपी सरकारों की स्वास्थ्य के प्रति रही बेरूखियों की पोल खोल कर रख दी है. राज्य में आई नई सरकार भी बहुत प्रभावी अभी तक सिद्ध नहीं हो पायी है. इस संदर्भ में  वित्तीय वर्ष 2017-18 में यूपी सरकार के जन-स्वास्थ्य के लिए क्या करने जा रही है यह जानना जरूरी है. 11 जुलाई 2017 को सरकार ने अपना बजट पेश किया था.

स्वास्थ्य की कहानी वित्त मंत्री की जुबानी

अपनी सफलता का गुणगान करते हुए यूपी सरकार के वित्त मंत्री अपने बजट भाषण में कहते हैं कि, ‘स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार के लिए हमारी सरकार विशेष रूप से प्रतिबद्ध है. चाहे मस्तिष्क ज्वर हो या अन्य महामारी, उनके निराकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. साथ ही हम स्वास्थ्य व चिकित्सा पर ध्यान देकर लोगों के जीवन में सुधार लाएगे. विकास खण्डों में चिकित्सालयों की स्थापना एवं ऐसे मण्डलों जिनमें मेडिकल कॅालेज नहीं हैं, में मेडिकल कालेजों की स्थापना कराने की योजना है.

वे आगे कहते हैं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में ‘इंसेफेलाइटिस’ (मस्तिष्क ज्वर) की बीमारी के पीछे ‘गन्दगी’ एक प्रमुख कारण है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के 38 जिले इस बीमारी से प्रभावित हैं, जिनमें से 7 जिलों में इस बीमारी का प्रकोप अत्यधिक है. इस बीमारी में उपचार से ज्यादा महत्वपूर्ण है- ‘बचाव’ और बचाव के लिए आवश्यक है ‘स्वच्छता’ जिसके लिए प्रभावकारी प्रयास किए जा रहे हैं. इन जनपदों में हमारी सरकार ने पहले 100 दिनों में विशेष कैम्प लगाकर टीकाकरण अभियान चलाकर 88 लाख 62 हजार बच्चों को प्रतिरोधक टीका लगवा चुकी है.

वित वर्ष 2017-18 में स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों की सूचना देते हुए वित मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि, ‘हमारी सरकार की पहल के फलस्वरूप पिछले कुछ समय में ही हम प्रदेश को वेंटीलेटर लगी हुई 150 लाईफ सपोर्ट एम्बुलेन्स उपलब्ध करवा चुके हैं और हर जनपद को ऐसी दो-दो लाईफ सपोर्ट एम्बुलेन्स दी जा चुकी हैं. ऐसी 100 एम्बुलेन्स और उपलब्ध कराए जाने के प्रयास जारी हैं. इससे आकस्मिक चिकित्सा सुविधा की उपलब्धता में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त होगी. चिकित्सकों की उपलब्धता बनाए रखने की दृष्टि से व्यापक जनहित में उनकी सेवा निवृत्ति की आयु को 60 वर्ष से बढ़ाकर 62 वर्ष कर दिया गया है तथा एक हजार चिकित्सकों के पदों को  वॉक-इन इण्टरव्यू के माध्यम से भरा जाएगा. गरीब जनता को जेनेरिक दवाइयां सस्ते दामों पर उपलब्ध हो सकें, इसके लिए समस्त राजकीय चिकित्सालयों में जेनेरिक औषधियों की उपलब्धता हेतु ‘प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्र’ की स्थापना का निर्णय लिया गया है.

प्रदेश में कुपोषण की रोकथाम हेतु चरणबद्ध रूप से कुपोषण मुक्त गांव बनाए जाने हैं. इस हेतु ‘राज्य पोषण मिशन’ द्वारा स्वास्थ्य, बाल विकास एवं पुष्टाहार, पंचायतीराज, ग्राम्य विकास एवं बेसिक शिक्षा विभाग के सहयोग से कुपोषण की रोकथाम हेतु चलायी जा रही योजनाओं को समन्वित और प्रभावी क्रियान्वयन कराते हुए मातृ-शिशु एवं बाल मृत्यु दर और मातृ-बाल कुपोषण में कमी लायी जाएगी. अनुपूरक पोषाहार के वितरण हेतु प्रत्येक माह की 5 तारीख को ‘बचपन दिवस’, 15 तारीख को ‘लाडली दिवस’ तथा 25 तारीख को ‘ममता दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा.

कुपोषण को दूर किए जाने में सहायता हेतु नयी योजना ‘शबरी संकल्प अभियान’ की प्रारम्भिक रूपरेखा तैयार कर ली गयी है. इसके अन्तर्गत गर्भवती महिलाओं तथा 5 वर्ष तक के अति कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पोषाहार दिया जाएगा.’

स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अपनी संजिदगी को प्रदर्शित करते हुए वे आगे कहते हैं कि, ग्रामीण अंचलों में अधिक से अधिक चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया जाना प्रदेश सरकार की प्राथमिकता है. इसके अतिरिक्त पूरे प्रदेश में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के साथ-साथ इसमें गुणवत्ता परक व पारदर्शिता सुनिश्चित किया जाना भी हमारी प्राथमिकता है.

100 बेड वाले चिकित्सालयों की स्थापना हेतु 85 करोड़ 50 लाख रुपए की व्यवस्था प्रस्तावित है. जिन मण्डल मुख्यालयों पर मेडिकल कॉलेज उपलब्ध नहीं हैं, वहाँ पर 300 बेड वाले संयुक्त चिकित्सालय प्रस्तावित हैं, जैसे बरेली, मुरादाबाद एवं देवीपाटन. इस हेतु 33 करोड़ 25 लाख रुपए की व्यवस्था प्रस्तावित है. ग्रामीण क्षेत्रों में 50 बेड वाले चिकित्सालयों की स्थापना हेतु 10 करोड़ रुपए की व्यवस्था प्रस्तावित है. इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में 50 बेड वाले चिकित्सालयों के लिए 10 करोड़ रुपए की व्यवस्था है.

Gorakhpur Death Obituary

(फोटो: पीटीआई)

राज्य कर्मचारियों एवं पेंशनरों की असाध्य बीमारी के उपचार हेतु कैशलेस चिकित्सा सुविधा प्रदान किए जाने की योजना हेतु 150 करोड़ रुपए की व्यवस्था प्रस्तावित है. जिला संयुक्त चिकित्सालयों में विशिष्ट चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने हेतु 125 करोड़ रुपए प्रस्तावित है.’ साथ ही वे आयुष को बढाने की दिशा में किए गए कार्यों को गिनाते हुए कहते हैं कि, ‘ उत्तर प्रदेश सरकार आयुष चिकित्सा पद्धति के द्वारा प्रदेश की ग्रामीण एवं शहरी जनता को आयुर्वेद, यूनानी एवं होम्योपैथी विधा के माध्यम से दुष्प्रभाव रहित चिकित्सा उपलब्ध कराए जाने के उद्देश्य से इस पद्धति को और अधिक सुलभ एवं जनोपयोगी बनाने हेतु प्रतिबद्ध है.

प्रदेश के छः जनपदों - लखनऊ, कानपुर, बरेली, बस्ती, कुशीनगर एवं वाराणसी में ‘राष्ट्रीय आयुष मिशन’ के अन्तर्गत 50 एकीकृत आयुष चिकित्सालयों तथा जिला स्तर पर 16 आयुर्वेदिक कार्यालयों एवं ग्रामीण क्षेत्रों में 50 चिकित्सालयों की स्थापना का लक्ष्य है.’

वित मंत्री ने अपने समापन भाषण में यह जुमला सुनाया था-

‘‘तुम अपने पास रखो, अपने सूरजों का हिसाब.

मुझे तो आखिरी घर तक दीया जलाना हैं.. ’’

उत्तर प्रदेश की सरकारें स्वास्थ्य के मामलों में आखिरी घर तक दिया कितना जला पाई हैं इसका उदाहरण हम जापानी इंसेफलाइटिस/एक्यूट इंसेफलाइटिस के मामले में पिछले तमाम आलेखों में देख ही रहे हैं.

चीनी टीके  के भरोसे कब तक!

जब 2005-06 में जापानी इंसेफेलाइटिस ने नौनिहालों को निगलना शुरू किया तब सरकार की नींद खुली और उसने टीकाकरण अभियान शुरू किया. इस बीमारी से बचाव के लिए भारत के पास टीका नहीं था. ऐसे में उसे चीन से टीका का आयात करना पड़ा. वर्ष 2006 और 2010 में इंसेफेलाइटिस प्रभावित जिलों में करोड़ों बच्चों को यही टीका लगाया गया और इसके अच्छे प्रभाव को देखते हुए पिछले तीन वर्ष से 150 जिलों में दो वर्ष तक के 10 करोड़ से अधिक बच्चों को यह टीका दो बार लगाया जा रहा है.

वर्ष 2006 में चार राज्यों के 11 जिलों में 1 करोड़ 6लाख 83 हजार बच्चों को और 2007 में नौ राज्यों के 27 जिलों में एक करोड़ 80 लाख 20 हजार बच्चों को टीका लगाया गया. वर्ष 2008 में 22 और 2009 में 30 जिलों में एक से 15 वर्ष के बच्चों को सिंगल डोज टीका लगाया गया. इसका सकारात्मक असर देखने को मिला. इसके बाद वर्ष 2011 में 181 जिलों में 16 से 18 महीने के बच्चों को नियमित टीकाकरण के तहत चीन निर्मित इस टीका का सिंगल डोज दिया गया.

इस वैक्सीन से जापानी इंसेफेलाइटिस की रोकथाम में अच्छे नतीजे मिलने के बाद केन्द्र सरकार ने वर्ष 2013 में इंसेफेलाइटिस प्रभावित जिले में प्रत्येक बच्चे को यह टीका लगाने का निर्णय लिया. बाद में जापानी इंसेफेलाइटिस के टीके को नियमित टीकाकरण में शामिल कर लिया गया . अब शून्य से दो वर्ष के बच्चों को दो बार यह टीका लगता है. पहली बार नौ से 12 माह के बीच और दूसरा 18 से 24 माह के बीच. स्वास्थ्य कार्यकर्ता गांवों में जाकर बच्चों को यह टीके लगाते हैं.

gorakhpur

उत्तर प्रदेश के इंसेफेलाइटिस प्रभावित सभी  जिलों में यह टीका बच्चों को लगाया जा रहा है. एक अनुमान के मुताबिक एक करोड़ से भी अधिक बच्चों को चीनी आयातित टीका लगाकर उन्हें जापानी इंसेफेलाइटिस से प्रतिरक्षित किया जा रहा है. पूरे देश में करीब 11 करोड़ बच्चों को इस वैक्सीन से प्रतिरक्षित किया जा रहा है.

चीनी टीका का इतिहास

चीन की यह वैक्सीन टिश्यू कल्चर पर बनी है. इसे लाइव एटीनेयूटेड एसए 14-14-2 कहते हैं जिसे चीन की ‘चेगदू इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल प्रोडक्ट्स’ कंपनी बनाती है. चीन निर्मित यह वैक्सीन बेहद सस्ती है और इसकी एक डोज की कीमत 20-22 रुपए ही है. चीन ने यह वैक्सीन वर्ष 1988 में विकसित की. चीन न सिर्फ अपने देश के बच्चों को यह वैक्सीन देता है बल्कि भारत, नेपाल, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, श्रीलंका, कम्बोडिया, थाईलैण्ड आदि देशों को भी भेजता है.

इस वैक्सीन पर हुए अध्ययन के मुताबिक सिंगल डोज पर इसकी सफलता दर 90 फीसदी तक और डबल डोज पर 98 प्रतिशत पायी गई है. इतना सस्ता टीका मिलने के बावजूद हमारे देश की सरकार ने टीके लगाने का निर्णय लेने में काफी देर की.

2013 में बनी जेइ की देसी वैक्सीन

वर्ष 2013 में भारत में जेइ का देशी वैक्सीन बनी. यह वैक्सीन हैदराबाद स्थित निजी क्षेत्र की संस्था भारत बायोटेक इंटरनेशनल ने इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी की मदद से तैयार किया. यह वैक्सीन कर्नाटक के कोलार जिले में वर्ष 1981 में जापानी इंसेफेलाइटिस के एक मरीज से प्राप्त जेइ वायरस के स्ट्रेन से तैयार की गई. इस वैक्सीन को अक्टूबर 2013 में लांच किया गया लेकिन अभी देश की जरूरतों के मुताबिक यह वैक्सीन उत्पादित नहीं हो पा रही है. यही कारण है कि नियमित टीकाकरण में अभी चीन निर्मित वैक्सीन का ही उपयोग हो रहा है.

यहां पर बड़ा सवाल यह है कि सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत के पास सही अर्थों में जेइ/एइएस से लड़ने वाली वैक्सिन का उत्पादन क्यों नहीं हो पा रहा है. मेडिसिन के क्षेत्र में चीन पर निर्भरता भारतीय स्वास्थ्य की लचर व्यवस्था की ओर इशारा करता है. अब भी समय है. हमें यह सोचना है कि हमें बुलेट ट्रेन की पहले जरूरत है अथवा अपनी जनता को स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने की!

(लेखक स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं. हाल ही में स्वस्थ भारत अभियान के तहत 'स्वस्थ बालिका-स्वस्थ समाज' का संदेश देने के लिए 21000 किमी की भारत यात्रा कर लौटे हैं. ) 

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