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सेक्युलर समय में श्रीकृष्ण: कृष्ण बनकर नियम तोड़ें तो कोई बात है

राम मनोहर लोहिया ने समझाया था कि कृष्ण अगर नियमों तोड़ता है तो इसलिए कि क्षुद्र स्वार्थ की परिधि से बाहर उठ सके

Updated On: Sep 02, 2018 04:11 PM IST

Chandan Srivastawa Chandan Srivastawa
लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों के शोधकर्ता और इन्क्लूसिव मीडिया फॉर चेंज के संस्थापक सदस्य हैं

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सेक्युलर समय में श्रीकृष्ण: कृष्ण बनकर नियम तोड़ें तो कोई बात है

कृष्ण की कितनी छवियां हैं भारतीय मन में ? इस प्रश्न को पूछते ही छवियों का एक पूरा रेला बंद आंखों की पुतलियों पर डेरा डालता है! याद करें, युद्ध को तत्पर बंधु-बांधवों के सामने गांडीव छोड़कर कर्तव्य-अकर्तव्य के प्रश्नों से जूझता हतचित् अर्जुन और उसे ना ‘हन्यते हन्यमाने शरीरे’ का आत्मबोध कराते गीता के ब्रह्नवेता कृष्ण! इस ब्रह्मवेता कृष्ण से कितनी अलग है द्वारिकाधीश उस कृष्ण की छवि जो जनमत के आगे इतना विवश हो उठा कि श्यामंतक मणि चुराने का कलंक धोने के लिए जाम्बवंत की गुफा तक जा पहुंचा?

और इसके बाद याद करें सूर्य के रथ और प्रताप को रोक सकने वाले सुदर्शनधारी, महा-रणनीतिकार कृष्ण को जो महाभारत के महाविनाश और यदुकुल के नाश के बाद अचानक अपने अकेलेपन और क्लांति से विश्रांत किसी विजन (एकांत)-वन में लेट जाता है. एक व्याध का तीर जिसके अंगूठे को मृत्यु का संदेश लेकर वेध जाता है!

कृष्ण की इन छवियों के सामने खड़ा करें उस कृष्ण को जो हमारे-आपके हृदय में ना जाने कब से तिरछे गड़ा पड़ा है- गोपियों के साथ चांदनी रात में यमुना किनारे रास रचाते किशोर-कृष्ण! किशोरवय की तरफ बढ़ता यह कृष्ण यमुना में नहाती गोपियों के वस्त्र छुपाकर कदंब की डाल पर बैठा उनकी परेशानी पर मंद-मंद मुस्कुराता है तो लगता है सामाजिक मर्यादाएं अब बस भरभराकर गिरने ही वाली हैं.

krishna

मगर इस किशोर-कृष्ण से कहीं बड़ी और वेधक है बालकृष्ण की छवि-ऐसा लगता है, महाभारत का नीतिवेत्ता कृष्ण कोई और है. गोकुल की गलियों का चमत्कारिक बालकृष्ण कोई और. जो माखन चुराता है, मटका फोड़ता है, 'बांह उठाई काजर-धौरी गैयन टेरी बुलावत.' यह कृष्ण मुंह खोलता है तो मां को पूरा ब्रह्मांड दिखाकर आकुल कर देता है.

कृष्ण की बाकी छवियों के ऊपर बालकृष्ण और किशोर कृष्ण की छवियां ज्यादा भारी हैं. जन्माष्टमी के ही बारे में सोचें, अखिल भारतीय विस्तार वाली यह पूजा गीता का उपदेश देने वाले कृष्ण की तो नहीं है. यह पूजा तो उसी मटकीतोड़-माखनचोर नंदनंदन की है जो अपनी जसुमति मैया से अबोध सवाल पूछता है कि- मैया, मेरी यह चोटी कब बढ़ेगी, 'इत्ती बार मोहे दूध पीवत भई यह अजहूं है छोटी?' और शिकायत करता है कि- ‘ मैया यह ग्वाल-बाल मेरे सांवले रंग को लेकर बहुत चिढ़ाते हैं ’, मुझसे कहते हैं- 'गोरे नंद, यशोदा गोरी तुम कत स्याम सरीर.' जन्माष्टमी की पूजा का कितना भी विस्तार करें इसकी धुरी रास रचाने वाले किशोरकृष्ण से लेकर माखनचुराने वाले बालकृष्ण तक ही घूमती है. इसी धर्मकथा या कुछ छूट लेकर कहें तो साहित्यकथा का विस्तार इस सेक्युलर समय में भी हुआ है.

यकीन नहीं आता तो बच्चों की लंबाई बढ़ाने वाले एनर्जी-ड्रिंक के एक पुराने टेलीविजन विज्ञापनों को याद करें. उसमें कोई औसत से कम लंबा बच्चा इसलिए लटकेराम बना रह जाता है क्योंकि अलां या फलां एनर्जी-ड्रिंक नहीं पीता और जैसे कृष्ण ने यशोदा से पूछा था- मैया, यह चोटी कब बढ़ेगी, इतने दिन तो ‘दूध पीवत भई यह अजहूं है छोटी’ उसी तरह विज्ञापनों के लटकेराम अपनी मां से पूछते हैं- ‘ मां, मैं बड़ा तो हो गया हूं लेकिन बढ़ूंगा कब?'

कभी बालकृष्ण को ग्वालबाल ने उनके सांवले रंग का ताना देकर चिढ़ाया था कि- नंद गोरे, यशोदा गोरी तो तू काला क्यों? और कृष्ण मां के पास शिकायत लेकर पहुंच गए थे- 'मैया, मोहे दाऊ बहुत खिझायो- मों सो कहत मोल को लीनो, तोहे जसुमति कब जायो.' मध्यकाल के सूरदास के इस धर्माधर बालकृष्ण का सवाल ऐन आधुनिक इक्कीसवीं सदी के इस सेक्यूलर समय में भी जब-तब उस फिल्मी-गीत में सुनायी देता है-'जसोमती मैया से बोले नंदलाला, राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला.'

क्या-क्या नहीं सुना कृष्ण ने?

सूरदास की गोपियों ने कुब्जादासी से ब्याह करने वाले कृष्ण को लंपट कहकर ताना दिया था. वहीं सूरदास के परवर्ती, प्रेम की एकनिष्ठता के गीत गाने वाले घनानंद ने कृष्ण की निठुराई को पहचानते हुए उन पर अंगुली उठाई थी कि तुमने तो ना जाने कितनों से प्रणय किया, एकनिष्ट प्रेम की पीड़ा को तुम क्या पहचानोगे- 'कान्हा परे बहुतायन में- एकलैन की वेदन जानो कहा तुम.'

रासरचैया कृष्ण से गोपियों और घनानंद की शकायत का ही विस्तार है वह फिल्मी गीत जिसमें कोई सवाल करता है- ‘कृष्ण तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करे मीरा को यों ही बदनाम’ और जवाब मिलता है- ‘सांवरे की बंसी को बजने से काम, राधा का भी स्याम हो तो मीरा का भी स्याम.'

ईश्वर की आंख से दुनिया को देखने वाले मध्यकालीन समय से लेकर दुनिया की आंख से ईश्वर को देखने वाले इस आधुनिक समय तक बालकृष्ण और किशोरकृष्ण की लीलाएं भारतीय मन में विस्तार पाती रहीं-ऐसा क्यों ?

राममनोहर लोहिया ने कोशिश की थी इस प्रश्न का उत्तर खोजने की. उनका जवाब था- ‘राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं. राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है. कृष्ण की उन्मुक्त या संपूर्ण व्यक्तित्व में और शिव की असीमित व्यक्तित्व में लेकिन हरेक पूर्ण है.’

यह बात लोहिया ने ही समझाई कि कृष्ण अगर नियमों तोड़ता है तो इसलिए कि क्षुद्र स्वार्थ की परिधि से बाहर उठ सके. लोहिया का वाक्य है- 'कृष्ण की सभी चीजें दो हैं- दो मां, दो बाप दो नगर दो प्रेमिकाएं या यों कहिए अनेक.' कृष्ण के इस छलिया रूप की व्याख्या में लोहिया ने लिखा- 'मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख है, यह शारीरिक सीमा उसे अपना एक दोस्त, एक मां, एक बाप, एक दर्शन वैगरह देती रहती है. किन्तु समय हमेशा इस सीमा से बाहर उछालने की कोशिश करता रहता है. मन ही के द्वारा उछल सकता है, कृष्ण उसी तत्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलांघता-उलांघता सबमें मिला देता है. किसी से भी अलग नहीं रखता.'

बालकृष्ण और किशोरकृष्ण की कथाएं अनादि-अनंत जान पड़ती हैं तो इसलिए कि वे कोरी उपदेश-कथा नहीं बल्कि भारतीय स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध के आस-निरास, आशा-आकांक्षा को अभिव्यक्ति करने वाली एक राष्ट्र-निर्मायक किंवदन्ती हैं!

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