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छायावादी कवियों में इन खास वजहों से सबसे अलग थे जयशंकर प्रसाद

कहानियों और नाटकों के लिहाज से तो जयशंकर प्रसाद के रचनाकाल को हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रसाद युग के नाम से जाना जाता है

Updated On: Jan 30, 2018 08:37 AM IST

Piyush Raj Piyush Raj
कंसल्टेंट, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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छायावादी कवियों में इन खास वजहों से सबसे अलग थे जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद छायावाद के 4 स्तंभों में से एक हैं. छायावाद एक काव्य आंदोलन के रूप में जाना जाता है. छायावाद की जो भी प्रवृत्तियां हैं वो उस दौर की कविता में दिखती है और हर छायावादी कवि के भीतर आपको ये विशेषताएं मिल जाएंगी. लेकिन उस दौर के गद्य में छायावादी काव्य की जो विशेषताएं मिलती हैं वो जयशंकर प्रसाद की वजह से मिलती हैं.

वैसे तो निराला ने भी छायावाद के दौर में कथा-साहित्य में हाथ आजमाया था लेकिन उन्हें वो प्रतिष्ठा नहीं मिली जो जयशंकर प्रसाद की कहानियों, नाटकों और उपन्यासों को मिली. कहानियों और नाटकों के लिहाज से तो जयशंकर प्रसाद के रचनाकाल को हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रसाद युग के नाम से जाना जाता है.

जयशंकर प्रसाद कई लिहाज से छायावाद के अन्य कवियों से अलग और विशिष्ट हैं. सबसे पहली बात यह कि उम्र के लिहाज से वे छायावाद के वरिष्ठतम कवि हैं. जयशंकर प्रसाद सिर्फ कवि ही नहीं हैं बल्कि एक कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और निबंधकार भी हैं. उन्होंने इंदु नामक एक पत्रिका भी निकाली थी जिसके संपादक वे नहीं थे लेकिन पत्रिका की पूरी देखरेख वही करते थे. इस तरह से प्रसाद साहित्यिक पत्रकारिता में भी सक्रिय थे.

छायावाद में महाकाव्य की रचना करने वाला एकमात्र कवि

पूरे छायावाद के दौर में सिर्फ एक महाकाव्य लिखा गया और यह महाकाव्य लिखने का श्रेय जयशंकर प्रसाद को ही जाता है. छायावाद के अंतिम दौर में प्रसाद ने कामायनी की रचना की थी. हिंदी के वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह कामायनी को छायावाद की सम्रग अभिव्यक्ति कहते हैं. उनका कहना है कि निराला की कई कविताओं को मिलाकर पढ़ने पर ही छायावाद के हर पक्ष से वाकिफ हुआ जा सकता है जबकि कामायनी को पढ़कर छायावाद के हर पक्ष और प्रवृत्ति की जानकारी मिल जाती है.

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भारतीय संस्कृति का जितनी गहराई से वर्णन प्रसाद की रचनाओं में मिलता है, उतना किसी अन्य छायावादी कवि के यहां नहीं है. प्रसाद के यहां इतिहास बोध, दर्शन और धर्म-दर्शन के बारे में काफी चर्चा मिलती है. प्रसाद अपने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी जैसे नाटकों के माध्यम से अंग्रेजों द्वारा लिखे भारत के इतिहास के बरक्स भारतीय शैली के इतिहाल लेखन का विकास करने की कोशिश कर रहे थे. प्रसाद के नाटकों और इस नाटकों की कविताओं पर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की गहरी छाप है.

jaishankar prasad kamayani

तस्वीरः free Hindi Pdf Books से साभार

छायावाद को समग्रता में पेश करने वाला रचनाकार

प्रसाद के नाटकों और कविताओं में दर्शन पर काफी गहराई से चर्चा मिलती है. खासकर शैव दर्शन और बौद्ध दर्शन के बारे में प्रसाद ने काफी लिखा है. कामायनी में इन दोनों दर्शनों विशेषतौर से शैव दर्शन की अभिव्यक्ति मिलती है.

प्रसाद की गुंडा, आकाशदीप, छाया जैसी कहानियां छायावाद के रोमांटिसिज्म से काफी प्रभावित हैं. वैसे तो आधुनिक कहानी को यथार्थवाद या यथार्थ बोध से जोड़कर देखा जाता है लेकिन प्रसाद ने रोमांटिसिज्म से प्रभावित होकर कहानियां लिखी हैं.

कहानियों के विपरीत प्रसाद के तितली, कंकाल जैसे उपन्यास यथार्थवाद से प्रेरित हैं.

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निबंधों में प्रसाद ने साहित्य के जुड़े कई शास्त्रीय पक्षों पर भी विचार किया है, जैसे- छायावाद क्या है, यथार्थवाद क्या है आदि. इसके अलावा उन्होंने कई शोधपरक ऐतिहासिक निबंध भी लिखे हैं. उनके अधिकतर निबंध इंदु में छपे थे. प्रसाद छायावाद के एकलौते ऐसे कवि हैं जिन्होंने खड़ी बोली के साथ-साथ ब्रज में भी कविताएं लिखीं हैं. प्रसाद की साहित्यिक भाषा देशज परंपरा की खड़ी बोली हिंदी है.

कुल मिलाकर प्रसाद को छायावादी युग का समग्रता में प्रतिनिधित्व करने वाला रचनाकार कहना गलत न होगा.

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