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अजब देश की गजब कहानी जंतर-मंतर से

ऐसा लगता है कि जंतर-मंतर एक मिनी भारत में बदल गया है.

Updated On: Nov 28, 2016 07:38 AM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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अजब देश की गजब कहानी जंतर-मंतर से

कभी ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप पहचान रखने वाला जंतर-मंतर अब धरना और प्रदर्शन स्थल के रूप में जाना जाता है. देश के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं. पीड़ित अपनी-अपनी समस्यायों को सरकार तक पहुंचाने के लिए नायाब तरीके अपनाते हैं. ऐसा लगता है कि जंतर-मंतर एक मिनी भारत में बदल गया है.

कई अनशनकारी ऐसे हैं जो सालों से बैठे हैं. सरकार या हुक्मरानों ने भले ही उनकी बात न मानी हो, पर वे लोग जंतर-मंतर पर आने वाले हर शख्स के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए हैं. जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन करने वाले लोग आए दिन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में बने रहते हैं.

धरना-प्रदर्शन करने वाले लोग मीडिया में बने रहने के लिए हर तरीके अपनाते हैं, जिससे उनकी बातों को ज्यादा तवज्जो मिले. यहां पर प्रदर्शन करने वाले लोग कभी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ कर तो कभी पेड़ पर चढ़ कर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं. कभी-कभी प्रदशर्नकारी ज्यादा भावना में बहकर अपनी जान भी गवां बैठते हैं.

इस समय का सर्कस स्थल जंतर-मंतर

सौरव कुमार

सौरव कुमार

जंतर-मंतर को आधुनिक भारत के सर्कस स्थल के रूप में भी जाना जाने लगा है. जिस तरह सर्कस के खेल में पात्र बदल-बदल कर लोगों को मनोरंजन करते हैं, ठीक उसी तरह यहां पर बैठे कुछ लोग आने-जाने वाले लोगों को तरह-तरह से मनोरंजन कर अपनी ओर खींचते हैं. उनको जैसे मालूम पड़ता है कि लोगों की भीड़ हमारे तरफ ज्यादा आकर्षित हो रही है या मीडिया वाले आए हुए हैं, उनके प्रदर्शन करने के तौर-तरीके में अचानक बदलाव आ जाता है. जंतर-मंतर पर कुछ लोग तो वाकई परेशान होते हैं पर कुछ लोग अपनी राजनीति या निजी स्वार्थ के लिए जंतर-मंतर का नाजायज फायदा उठाते हैं.

मैं जिंदा हूं...संतोष सूरत सिंह

35 साल के संतोष सूरत सिंह की कहानी बिल्कुल फिल्मी है. संतोष बनारस के रहने वाले हैं. ग्राम पोस्ट छितौनी, थाना चौबेपुर के रहने वाले संतोष सूरत सिंह साल 2003 में सरकारी फाइलों मर गए हैं. अपने-आपको फिल्म एक्टर नाना पाटेकर का रसोइया बताने वाले संतोष कहते हैं, ‘सगे संबंधियों ने सारी जमीन इस लिए बेच दी क्योंकि उन्होंने महाराष्ट्र की एक दलित लड़की से शादी कर ली.’ संतोष तीन बहनों में अकेले भाई हैं.

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संतोष सूरत सिंह

संतोष आगे कहते हैं ‘जिस लड़की की शादी करने पर मुझको सरकारी फाइलों में मार दिया गया. पत्नी भी छोड़ कर चली गई. मेरी 6 साल की एक बेटी है. पत्नी इस समय मराठी फिल्म में काम कर रही है. पत्नी को मराठी फिल्म के एक कलाकार ने बहला-फुसला कर अपने साथ रख रखा है.’ पूछने पर बताते हैं ‘अभी तक मेरा तलाक नहीं हुआ है. बेटी को एक नजर न देख सकने का मलाल कर भावुक हो जाते हैं.

संतोष ने किया सुषमा स्वराज को किडनी देने का ऑफर

संतोष सूरत सिंह कहते हैं,

‘क्योंकि मैं मर गया हूं, इसलिए बीमार सुषमा स्वराज जी को अपनी किडनी दान करने का प्रस्ताव भेजा है. जनवरी 2012 से जंतर-मंतर पर बैठ कर जिंदा होने का सबूत देते-देते थक गया हूं. अब सुषमा स्वराज जी को किडनी दे कर अपने जिंदा होने का सबूत देना चाहता हूं.’
संतोष ने साल 2012 में राष्ट्रपति के चुनाव का पर्चा भी भरा था.

भारतीय भाषा आंदोलन

डॉक्टर बलदेव बंसी

डॉक्टर बलदेव बंसी

भारतीय भाषा आंदोलन देश के सुप्रीम कोर्ट और संघ लोक सेवा आयोग सहित सभी सराकरी संस्थानों में अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म करने को लेकर चल रहा है. यह आंदोलन साल 1988 से लगातार चल रहे हैं. इस आंदोलन की शुरुआत दिल्ली स्थित यूपीएससी भवन से हुई थी. दिल्ली पुलिस ने बाद में इस आंदोलन को जंतर-मंतर पर शिफ्ट कर दिया. देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह सहित कई पूर्व प्रधानमंत्रियों और मंत्रियों ने भी इस आंदोलन में भाग लिया था.

वरिष्ठ साहित्यकार बलदेव वंशी के भावुक विचार

भारतीय भाषा आंदोलन के संस्थापक अध्यक्ष और दिल्ली विश्वविद्यालय के अरविंदो कॉलेज के हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ बलदेव वंशी से कहते हैं 

'जब तक जिंदा हूं, संघर्ष करता रहूंगा. सारे राजनेता एक हैं. जब-जब उनको फायदा हुआ मेरे मंच का उपयोग किया. पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपयी के साथ देश के पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी इस आंदोलन का हिस्सा रह चुके हैं, नतीजा आप देख रहे हैं. आज भी जंतर-मंतर पर हमलोग मौजूद हैं.’
 बलदेव वंशी जी लगभग 80 साल के हैं.

 नूर सबा की कहानी बेटे की जुबानी

नूर सबा

नूर सबा

73 साल की विधवा नूर सबा उत्तर प्रदेश के रामपुर की रहने वाली हैं. 19 नवंबर 2015 से पेंशन की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर धरने पर बैठी हैं. नूर सबा के अनुसार वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के रिश्तेदार हैं. नूर सबा खुद को जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के संस्थापकों में से एक जस्टिस सरदार वली खान की पुत्रवधू बताती हैं। सबा बैठने और बोलने से लाचार हैं, पर वकील बेटा का साथ मिल रहा है. बेटा आविद उमर खान सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं.

नूर सबा के बेटे आविद उमर खान कहते हैं 'मेरे वालिद श्री मसूद उमर खान राजकीय पब्लिक हाईस्कूल रामपुर में प्रधानाध्यापक थे. दिनांक 05-04-1980 को सेवाकाल के दौरान ही उनकी मौत हो गई थी. पिता के मरने के 36 साल बाद रिश्वत नहीं देने के कारण मेरे मां को पेंशन और सेवाओं से वंचित रखा गया. दूसरी तरफ फर्जी दस्तावेज का हवाला देकर पेंशन और सुविधाओं का भुगतान दिखा दिया गया. मेरे पिता के सारे कागजात सरकारी ऑफिस से गायब करवा दिये गये. रामपुर जिला प्रशासन ने गायब हुए रिकॉर्ड को 19-08-2000 को सुप्रीम कोर्ट में जमा किया, बावजूद इसके आज तक पेंशन से वंचित रखा गया.’

नूर सबा के बेटे आविद के अनुसार, केस देश की निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चला. जिसमें निराशा हाथ लगी. राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक गुहार लगाई गई. नूर सबा आज भी न्याय की आस लिए जंतर-मंतर पर डटी हुई हैं.

भगाणा कांड संघर्ष समिति का आंदोलन

भतेरी देवी

भतेरी देवी

हरियाणा के हिसार जिले में हुए भगाणा गोली कांड में 137 दलित परिवार विस्थापित हो गए थे. उस परिवार के लोग न्याय की तलाश में आज भी जंतर-मंतर पर बैठे हैं. अनशन पर बैठी 70 साल की एक महिला भतेरी देवी के पति को गोलीकांड में आरोपी बना दिया गया था. इसके विरोध में भतेरी देवी जैसे कई परिवार धरने पर बैठे हुए हैं. भगाणा में एक खेल मैदान की जमीन को लेकर भी जाट और दलितों के बीच लड़ाई हुई थी, जिसमें कई परिवारों को हिसार छोड़ना पड़ा था. भगाणा कांड के पीड़ित पिछले 4 साल से जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं.

ऑल इंडिया एसएसबी गुरिल्ला एसोसिएशन

ब्रह्मानंद दलाकटी

ब्रह्मानंद दलाकाटी

ऑल इंडिया एसएसबी गुरिल्ला एसोसिएशन (एसएसबी गुरिल्ला) के स्वयंसेवक स्थाई नियुक्ति और पेंशन की मांग को लेकर पिछले 10 सालों से आंदोलन कर रहे हैं. एसोसिएशन के अध्यक्ष ब्रह्मानंद दलाकाटी के अनुसार, 1962 की लड़ाई के बाद एसएसबी गुरिल्लाओं का गठन किया गया था। इन लोगों का काम होता है एसएसबी मुख्यालय के संपर्क में रहना और सरकार को गोपनीय सूचना देना.

एसोसिएशन के अध्यक्ष ब्रह्मानंद की मांग है कि उनके लोगों को सेवा में स्थाई किया जाए और सेना को जो सुविधा दी जाती है, वह भी प्रदान किया जाए.’

 

कुछ यूनियन की बेतुकी मांग

प्रेस रिपोर्टर्स यूनियन भी धरना पर

प्रेस रिपोर्टर्स यूनियन भी धरना पर

जंतर-मंतर पर मैं जिंदा हूं, पोस्टर के ठीक सामने प्रेस रिपोर्टर यूनियन नाम का एक बैनर लगा हुआ है. फर्स्ट पोस्ट ने जब बैठे लोगों की समस्या जाननी चाही तो वहां पर बैठा एक भी सदस्य कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ. काफी पूछने के बाद हेमंत रावत नाम के एक शख्स ने कहा कि पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर भरत चौहान नाम के एक पत्रकार यहां पर बैठे हुए हैं.

और भी आंदोलन

इसके साथ-साथ जंतर-मंतर पर कई और आंदोलन चल रहे हैं. जैसे कोल माईन्स इंजीनियरिंग वर्कर्स एसोसिएशन. यह संगठन देश के कोयला मजदूरों की हालत को लेकर प्रदर्शन कर रहा है.

नोटबंदी को लेकर अखंड राष्ट्रवादी पार्टी के कार्यकर्ता प्रधानमंत्री मोदी के फैसले को सही करार देने के लिए जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं.

ऑल इंडिया ह्यूमन राइट्स एसोसिएशन हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहा है.

संत रामपाल और आशाराम बापू के समर्थक भी धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. दोनों के समर्थकों की नजर जब मीडिया या किसी वीआईपी पर पड़ती है तो ये लोग और जोरों से नारे लगाना शुरू कर देते हैं.

इस दशक में जंतर-मंतर की पहचान

आधुनिक भारत में जंतर-मंतर देश के कई आंदोलनों का गवाह बना है. उन आंदोलनों में से एक था जन लोकपाल आंदोलन. 2011 के अन्ना आंदोलन के बाद नहीं जानने वाले लोग भी जंतर-मंतर को जानने लगे. जेपी आंदोलन के बाद जन लोकपाल आंदोलन ऐसा आंदोलन था, जिसे देश और दुनिया में जबरदस्त तरीके से सराहा गया.

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 कई निर्भया न्याय की आस में

निर्भया रेप कांड जैसी पीड़ितों की आवाज आज भी न्याय की आस में जंतर-मंतर से उठ रही है. निर्भया जैसी कई और लड़कियां हैं, जिनके लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन किए जा रहे हैं.

जंतर-मंतर दागदार कब हुआ?

26 मार्च, 2012 को तिब्बत के एक लड़के ने खुद को आग के हवाले कर दिया. 95 फीसदी जलने के बाद अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई. वह चीन के राष्ट्रपति का भारत आने का विरोध कर रहा था.

21 अप्रैल, 2015 को जंतर-मंतर तब फिर से सुर्खियों में आया, जब राजस्थान के दौंसा के एक किसान ने आत्महत्या कर लिया. गजेंद्र चौहान नाम का वह किसान आम आदमी पार्टी की रैली में शामिल होने के लिए आया था. जिस वक्त उसने आत्महत्या किया, ठीक उसी वक्त दिल्ली के सीएम केजरीवाल मंच से भाषण दे रहे थे. यह मामला आज भी दिल्ली पुलिस के फाइलों में चल रहा है.

इसी साल 2 नवबंर, 2016 को एक पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल ने जहर खा लिया था, जिनकी बाद में राममनोहर लोहिया अस्पताल में मौत हो गई थी. रामकिशन ग्रेवाल जंतर-मंतर पर चल रहे ओआरओपी आंदोलन में भाग लेने गए थे. वे रक्षामंत्री को ज्ञापन देने जा रहे थे, तभी रास्ते में जहर खा लिया.

आयरन लेडी के नाम से मशहूर मणिपुर की इरोम शर्मिला पर जंतर-मंतर पर आत्महत्या करने का आरोप लगा था. लंबे समय से शर्मिला भूख हड़ताल कर रही थी. इरोम शर्मिला ने हाल ही में भूख हड़ताल वापस लेकर एक नई पार्टी बनाई है.

जंतर-मंतर का ऐतिहासिक महत्व

जंतर-मतर का अपना एक पुराना इतिहास रहा है. आज से 292 साल पहले जंतर-मंतर की स्थापना एक खगोलीय वेधशाला के रूप में हुई थी. दिल्ली में जंतर-मंतर की स्थापना की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. उस समय मोहम्मदशाह के शासनकाल में ग्रहों की स्थिति को लेकर हिंदू और मुस्लिम खगोलशास्त्रियों में बहस छिड़ गई थी. इसे देखते हुए राजा जयसिंह ने भारत में चार जंतर-मंतर केंद्र बनाए. दिल्ली का जंतर-मंतर भी उनमें से एक है. यह इमारत प्राचीन भारत की वैज्ञानिक प्रगति का जबरदस्त नमूना है. आजादी के बाद भारत सरकार ने 1948 में इसको राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया. आज भी जंतर-मंतर पर कई प्रकार के यंत्र लगे हैं, जो सूर्य की सहायता से वक्त और ग्रहों की सही जानकारी देते हैं. यह साल के सबसे बड़े और छोटे दिन को भी माप सकता है.

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