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‘घूस मत लेना! ऐसी कमाई की हवेलियां ढहती देखीं हैं’, मां की नसीहत ने कभी ‘खैरात’ कुबूल नहीं करने दी!

रामचरन सिंह के शब्दों में, ‘मां ने कहा, ‘रामचरन पुलिस की नौकरी में हराम की कमाई (घूस या रिश्वतखोरी) मत करना. हराम का रुपया-पैसा कमाना आसान होता है. हजम करना बहुत मुश्किल है.'

Updated On: Sep 09, 2018 05:19 PM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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‘घूस मत लेना! ऐसी कमाई की हवेलियां ढहती देखीं हैं’, मां की नसीहत ने कभी ‘खैरात’ कुबूल नहीं करने दी!
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थाने-चौकी, गली-मोहल्लों तक में. पुलिस और पब्लिक के बीच गाहे-बगाहे ‘जूतम-पैजार’ की शर्मसार करने वाली खबरें अक्सर देखने-पढ़ने को मिल जाती हैं. इस कलंकित और कथित ‘कुप्रथा’ से सबसे पहले अगर कोई प्रभावित होता है, तो वह है जन-मानस. ऐसे वातावरण में भी आज भला, खाकी-वर्दी में किसी 24 कैरट के ‘ईमानदार’ बेखौफ, आला पुलिस अफसर या थानेदार की तलाश में जुटना, कोरी कल्पनाओं की कश्ती में चढ़ने-उतरने से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा. ऐसा सोचते वक्त मगर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि, समाज में अच्छे-बुरे हर किस्म के लोग मौजूद हैं. जरूरत है तो सिर्फ इसकी कि, भीड़ में हम अच्छे-बुरे की पहचान कर सकें.

यह काम मैं कर रहा हूं बजरिए ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस किश्त के. बीते कल के उस बेखौफ दबंग इंस्पेक्टर को सामने लाकर जिसने, जवानी के बेशकीमती 23-24 साल, बदनाम ‘खाकी-वर्दी’ के रंग-रूप को निखार कर, उसे सजाने-संवारने पर ही ‘न्योछावर’ कर दिए. 25-26 साल की उम्र में ही ‘कोतवाल’ बना दिए जाने की खबर से खौफजदा होकर जो, बेचैनी के आलम में पूरी रात सो नहीं पाया था. वक्त ने करवट बदली. मां के दूध ने हिम्मत देकर कालांतर में जब उकसाया तो, 1960-70 के दशक में इसी थानेदार ने, ‘मांद’ से बाहर घसीट कर कितने खूंखार लाखों के इनामी डकैत गोलियों से भून डाले? 75 साल की उम्र में अब उसे भी खुद सही गिनती याद नहीं है.

1940 के दशक में बुलंदशहर (यूपी) का चरोरा गांव

 पेशे से किसान चौधरी रिसाल सिंह पत्नी मुखत्यार कौर के साथ चरोरा गांव, थाना जहांगीराबाद (अब थाना आहार) में रहते थे. उस मंदी के जमाने में भी 60 बीघा जमीन के मालिक चौधरी रिसाल सिंह इलाके के धनाढ्य काश्तकारों में शुमार थे. कालांतर में रिसाल सिंह-मुखत्यार कौर के विद्यावती, श्योराज सिंह, बेटी बलबीर कौर, रघुराज सिंह और रामचरन सिंह सहित 5 संतानों का जन्म हुआ. ‘संडे क्राइम स्पेशल’ की इस किश्त में मैं, उन्हीं रिसाल सिंह और मुखत्यार कौर के, सबसे छोटी संतान पुत्र रामचरन सिंह की मुंहजुबानी आपको पढ़वा रहा हूं. वही रिटायर्ड पुलिस इंस्पेक्टर रामचरन सिंह जिन्होंने, पुलिस जैसे चर्चित महकमे में भी ईमानदारी और बहादुरी की ‘नजीर’ कायम की. जिसने पुलिस की आने वाली पीढ़ियों के लिए जांबांजी का ऐसा बेशकीमती ‘इतिहास’ लिखा जिसे आने वाले तमाम वर्षों में भी कोई दूसरा रामचरन सिंह जल्दी नहीं दोहरा पाएगा!

दारोगा बनने को छप्पर वाले घर में रहा

3 जनवरी सन् 1943 को जन्मे रामचरन सिंह ने सन् 1958 में जटपुरा स्थित एस.एस. हायर सेकेंडरी स्कूल से सूबे (उत्तर प्रदेश) में सातवां स्थान प्राप्त करके रिकॉर्ड नंबरों के साथ हाईस्कूल पास कर लिया. चूंकि गांव में उच्च शिक्षा का इंतजाम नहीं था. लिहाजा ग्यारहवीं में अमर सिंह ने जाट कॉलेज, लखावटी में एडमिशन ले लिया. रहने का इंतजाम किया गया सैदपुरा गांव स्थित ननिहाल के छप्पर वाले घर में. सन् 1963 में मेरठ कॉलेज से बीएससी पास किया. सन् 1965 में उत्तर प्रदेश पुलिस में सीधा सब-इंस्पेक्टर की वेकेंसी निकली. 1966-67 में सब-इंस्पेक्टर भर्ती हो गए. वेतन था 450 रुपया महीना. पुलिस ट्रेनिंग पूरी की मुरादाबाद में.

हराम की कमाई से बनी हवेलियां ढहती देखी हैं

पुलिस ट्रेनिंग पर जाते वक्त रामचरन सिंह, मां मुखत्यार कौर और पिता चौधरी रिसाल सिंह के पास पहुंचे. माता-पिता पुलिस की नौकरी को सबसे ज्यादा बदनाम, घटिया-भ्रष्ट मानते थे! अब खुद करीब 75 साल के हो चुके रामचरन सिंह के शब्दों में, ‘मां ने कहा, ‘रामचरन पुलिस की नौकरी में हराम की कमाई (घूस या रिश्वतखोरी) मत करना. हराम का रुपया-पैसा कमाना आसान होता है. हजम करना बहुत मुश्किल है. मैंने पड़ोसी गांव में अपनी आंखों से पुलिस की हराम की कमाई से बनी हवेली को ढहते, और उस हवेली के मलबे में इंसानों को जिंदा दफन (जमींदोज होकर मरते) होते देखा है. बाकी तेरी मर्जी.’ उसी वक्त मैंने मां से वायदा किया था कि, हराम और खैरात में मिल रही फूटी कौड़ी को हाथ नहीं लगाऊंगा. मां-बाप से किए वायदे पर आज तक कायम हूं. भले ही मां-बाप अब इस संसार में नहीं हैं. पुलिस की नौकरी से रिटायर (स्वैच्छिक) हुए भी मुझे 27 साल से ऊपर हो चुके हैं.’

बायें से दाए छोट बेटे शैलेंद्र सिंह, पौत्र सिद्धांत सिंह, पौत्री आराध्या गुनगन चौधरी और पुत्रवधू एकता सिंह के साथ रामचरन सिंह

बायें से दाए छोट बेटे शैलेंद्र सिंह, पौत्र सिद्धांत सिंह, पौत्री आराध्या गुनगन चौधरी और पुत्रवधू एकता सिंह के साथ रामचरन सिंह

मजबूरियांभी जिससे मांग गईं पनाह

बकौल रामचरन सिंह , ‘बात है सन् 1984 के आसपास की. मैं जिला एटा के कासगंज थाने में बतौर इंस्पेक्टर तैनात था. पत्नी रामवती के दिल का ऑपरेशन होना था. खर्चा बताया गया करीब 2 लाख रुपए. परिस्थितियां विपरीत और हाथ तंग था. मजबूरियां पांवों को जकड़ने पर तुली थीं. मेरी तंगहाली मुझ पर ही ‘अट्टाहस’ करके हंस रही थी. यूं कहूं कि, गरीबी मुझे खुलेआम चिढ़ा रही थी तो गलत नहीं. जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, मेरी पत्नी के इलाज के लिए ‘पूरी रकम’ का इंतजाम खुद कराने को तत्पर थे.

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मैं मगर किसी से कुछ कहे बिना, परिचितों-रिश्तेदारों-भाई-भतीजों से ‘उधार’ के जुगाड़ में जुटा रहा. लाखों का कर्जदार बनकर पत्नी का इलाज कराया. डीएम और एसएसपी साहब के साथ-साथ परमात्मा का भी आज मैं शुक्रगुजार हूं कि, उन विषम आर्थिक हालातों में भी उसने मुझे, ‘चंदे’ की वो रकम बतौर ‘खैरात’ कुबूल नहीं करने दी. इंसान के इरादे ईमानदार और जिगर फौलाद हो तो, ‘मजबूरियां’ तथा ‘हालात’ भी ‘पनाह’ मांग सकते हैं.’ अतीत की तमाम खट्टी-मीठी यादें बिना किसी लाग-लपेट के, सुनाते वक्त रामचरन सिंह की आंखों में भर आये आँसू बेकाबू होकर, बूढ़े गालों के गढ्ढों में खो जाते हैं.

मेरी बहादुरीसे साहब को बदहजमीहो गई

‘नगीना थाने में पोस्टिंग के दौरान मार्च 1969 में एक रात एक गांव में डाका पड़ गया. नौसिखिया थानेदार समझकर, थानाध्यक्ष मुझे (सब-इंस्पेक्टर रामचरन सिंह को) मौका-ए-वारदात पर नहीं ले गया. थानाध्यक्ष घटनास्थल पर रात भर झूठ बोल कर गांव वालों को ही बहलाता रह गया. एक रात में तीन लोगों की हत्या करके भागे डाकूओं को मैं कई हथियारों और लूटे गए माल के साथ दबोच लाया. थानाध्यक्ष को मेरी यह दबंगई और पुलिसिया ‘गुडवर्क’ रास नहीं आया. सो उसने मुझे रात में ‘तार-गश्त’ (ग्रामीण इलाके और जंगलात में तांबे-बिजली तार चोरी रोकना) पर लगा दिया. साइकिल से रात भर पेट्रोलिंग करने को.’ बताते हुए बेसाख्ता खिल-खिलाकर हंसने लगते हैं, कल के दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पूर्व इंस्पेक्टर और आज 75 साल के हंसमुख-मिलनसार बुजुर्ग रामचरन सिंह.

किसी ऋषि का श्राप सा लगा जब प्रमोशन

रामचरन सिंह की ही मुंहजुबानी, ‘बात है सन् 1970 के मई-जून महीने की. बिजनौर के सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस थे के.डी. दीक्षित. पुलिस की मेरी नौकरी अभी ढाई-तीन साल की ही हुई थी. एसपी साहब ने मुझे नगीना तहसील के बढ़ापुर थाने का स्टेशन हाउस ऑफिसर (थानाध्यक्ष) बना दिया. जबकि उन दिनों मुझे, खूंखार डाकू-बदमाशों से मुकाबला करके उन्हें, दबोचने और ठोंकने (एनकाउंटर) का चस्का लगा हुआ था. पुलिसिया नौकरी में होने के बाद भी चढ़ावे, हफ्ता-वसूली से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. लिहाजा जब मुझे पहली बार थानाध्यक्ष बनाने की खबर मिली तो मैं, बेचैनी के आलम में उस पूरी रात सो नहीं सका.

बायें से दाए छोट बेटे शैलेंद्र सिंह, पौत्र सिद्धांत सिंह, पौत्री आराध्या गुनगन चौधरी और पुत्रवधू एकता सिंह के साथ रामचरन सिंह

घूसखोरीका नहीं, घुसकर मारने का शौक

रामचरन सिंह के मुताबिक, ‘कोतवाल (थानाध्यक्ष) बनाए जाने पर परेशान होने की दो वजह थीं. पहली वजह, जब मुझे घूसखोरी, उगाही-वसूली करनी ही नहीं थी तो फिर, फालतू में थानाध्यक्ष बनकर,‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत सिर पर क्यों ढोता? दूसरी वजह मुझे आमने-सामने की मोर्चाबंदी में गोलियां चलाकर बदमाशों को ‘ठोंकने’ और दबोचने की लत लगी हुई थी. थानाध्यक्षी में लिखा-पढ़ी, कोर्ट-कचहरी के पचास झंझट थे जो, मुझे कतई नहीं आती-भाती थी.’ जिंदगी में बेतरतीब इधर-उधर फैले यादों के पन्नों को करीने से सजाते-संवारते-समेटते हुए बताते-सुनाते हैं दबंग रामचरन सिंह.

बौखलाई भीड़ के आगे मैं परोसदिया!

‘अगस्त सन् 1973 से मार्च 1974 तक किच्छा (अब जनपद ऊधम सिंह नगर) थाने में रहा. एक रात काशीपुर थाना इलाके में जाने-अनजाने एक एडिशनल एसपी की मौजूदगी में एक ही रात में चार कत्ल हो गए. कत्ल का मामला थाने में दर्ज हुआ. 4 हत्याओं का आरोप लगा एडिशनल एसपी के माथे! मारे गए चार लोगों में थे मुकुंदपुर गांव का प्रधान, उसके दो बेटे तथा एक अन्य. काशीपुर थाने पर गुस्साई भीड़ ने पथराव कर दिया. वहां तैनात थानाध्यक्ष को हटाकर मुझे चार्ज दे दिया गया. मैं सोच रहा था चार-चार कत्ल. वो भी पुलिस अफसर से! नाराज भीड़ पता नहीं मेरा क्या हाल करेगी? फिर भी गनीमत रही कि, आला-पुलिस अफसरों ने जिस विश्वास के साथ उन बदतर हालातों में, मुझे गुस्साई भीड़ के सामने ‘थानाध्यक्ष’ बनाकर ‘परोसा’ था. उसमें मैं कामयाब रहा. बौखलाई भीड़ मुझे देखते ही ‘ठंडी’ हो गयी.’ 75 साल की उम्र में, 44 साल पुरानी सोई हुई यादों को जगाते हुए बताते हैं, कभी खूंखार डाकूओं में ‘खौफ और मौत’ का दूसरा नाम रहे रामचरन सिंह.

मां-बीबी ने दी गरम-जैकेट सिलवाकर

बात है करीब 49 साल पहले यानि सन् 1969 के आसपास की. हाड़तोड़ जाड़े के दिन थे. अक्सर शीत-लहर चला करती थी. मां मुखत्यार कौर और पत्नी रामवती की नजर पड़ी कि, रामचरन सिंह के पास जाड़ों में पुलिस की वर्दी के ऊपर पहनने के लिए थानेदार होने के बाद भी गरम-जैकेट नहीं है. एक दिन पता चला कि, सास-बहू (रामचरन की मां मुख्त्यार कौर और पत्नी रामवती) ने मिलकर रामचरन के लिए नई गरम जैकेट का इंतजाम कर लिया है. रामचरन ने उनसे पूछा कि, जैकेट सिलवाने के लिए पैसों का इंतजाम कैसे हुआ? तो मां-पत्नी बोलीं कि उन लोगों ने (सास-बहू), अपने खर्चे काटकर और चोरी-छिपे पैसे बचाकर वह गरम जैकेट सिलवाई थी.

डाकू निपटाने के बाद भी गोलियां बच गईं

अमूमन किसी भी इंसान की जिंदगी के अनुभव-यादें, एक अदद किताब में ही समेट या लिख दिए जाते हैं. रामचरन सिंह की जिंदगी को ‘किताब’ में समेटने की कोशिश करना भी बेईमानी होगा. वजह, रामचरन सिंह का पुलिसिया जीवन और उनके उसूल. भारतीय पुलिस या खाकी वर्दी की आने वाली पीढ़ियों के लिए, किसी ‘ग्रंथ’ से कम नहीं है. ग्रंथ इसलिए क्योंकि, 1960 से 1990 के दशक के बीच में, उत्तर-प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े सूबे की हद में शायद ही कोई ऐसा खूंखार अपराधी या डकैत बचा हो जो, खुद के सिर पर इनाम की मोटी-से-मोटी रकम का बोझ लाद कर दर-ब-दर की खाक छानते हुए, रामचरऩ की गोलियों का शिकार बनकर दिल-दहला देने वाली ‘मौत’ मरने से बाकी बच गया हो! यह अलग बात है कि रामचरन सिंह के पास बोरी में भर सरकारी गोलियां बाद में तमाम थानों के मालखाने में जमा कराईं गयीं.

सीने-माथे में लगी हर गोली पर मिलता रामचरन

इन डाकूओं में चाहे उस जमाने का एक लाख का इनामी पोथीराम, महाबीरा, करुआ, रोहताश के साथ 2 और डाकू की मौत का चर्चा हो. उत्तराखंड के (उस जमाने में यूपी का नैनीताल जिला) कुख्यात ‘किलर’ हरभजन सिंह उर्फ भजना की मौत. पीलीभीत का कुख्यात बदमाश कश्मीर. आगरा रेंज के मठसेना थाना क्षेत्र में वीरभान गूजर गैंग का सफाया. हरि सिंह मल्लाह गैंग का सफाया (पांच डाकू मारे गए, 4 जिंदा पकड़े). कुख्यात अतिराज-जोराबर गैंग का थाना मठसेना इलाके में सफाया. इन दोनो डकैतों से उस जमाने में एटा, इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद में आतंक के पर्याय डाकू छबिराम और पोथीराम भी ‘पनाह’ मांगते थे. इन सबकी मौत इंस्पेक्टर रामचरन सिंह की ही गोली से हुई थी.

वर्दी की इज्जत बढ़ाने के लिए गोलियों से सीने को छलनी कराके भी जिंदा बचे रहने वाले पूर्व दबंग इंस्पेक्टर रामचरन सिंह की खाकी में यादगार तस्वीर

वर्दी की इज्जत बढ़ाने के लिए गोलियों से सीने को छलनी कराके भी जिंदा बचे रहने वाले पूर्व दबंग इंस्पेक्टर रामचरन सिंह की खाकी में यादगार तस्वीर

जब बहादुर के सीने को भी छेद गईं गोलियां

सन् 1979 के मार्च महीने में सैंय्या थानाध्यक्ष सब-इंस्पेक्टर गजेंद्र सिंह पंवार के हत्यारे राजस्थान के खतरनाक हरि सिंह गैंग की जिंदा गिरफ्तारी. राजस्थान का ही खूंखार नेकसा काछी गैंग (26 जनवरी सन् 1980 को नेकसा और उसके चार अन्य खूंखार डाकू गोलियों से भून डाले) का सफाया. एक लाख के इनामी शिवराज सिंह यादव और उसके 6 डाकूओं की मेरे साथ हुई मुठभेड़ में मौत. शिवराज गैंग के साथ हुई मुठभेड़. ‘इन सब डाकूओं के सीने-माथे भीतर से मिलीं अधिकांश गोलियां रामचरन सिंह के ही हथियार से निकली हुआ करती थीं.’ गर्वीली आवाज में बताते हैं रामचरन सिंह. शिवराज यादव के साथ हुई खूनी मुठभेड़ के दौरान ही इंस्पेक्टर रामचरन सिंह के सीने में गोलियां जा घुसी थीं.

कितने मारे सही गिनती भी याद नहीं

1980 के दशक में एटा जिले के अलीगंज थाना इलाके में हुए नथुआपुर कांड में इंस्पेक्टर राजपाल सिंह, दो सब-इंस्पेक्टर (पाण्डेय, रावत) और पीएसी के कई बहादुरों सहित 12 लोगों की शहादत का बदला तीन डकैत ढेर करके लिया. डाकू दौलता और उसके 5 साथी डाकूओं सहित 6 डकैतों की, कासगंज के ढोलना इलाके में रामचरन सिंह के साथ हुई मुठभेड़ में मौत. जुलाई सन् 1983 को कासगंज थाने के नौरथा इलाके में डाकू जयपाल जाटव और उसके दो साथी डाकूओं की मौत. थाना साहबर इलाके में एक लाख के इनामी डाकू काशी बाबा की मौत के साथ ही, उसके गैंग का सफाया आदि-आदि. बकौल पूर्व दबंग इंस्पेक्टर रामचरन सिंह, ‘ऊपर लिखे हर खौफनाक नाम वाले डकैत के सीने और माथे में, मेरे हाथों में मौजूद पुलिसिया हथियार से निकली कम से कम एक गोली तो जरुर घुसी मिली थी दौरान-ए-पोस्टमॉर्टम.’

भतीजी का एक्सीडेंट करने वाले को भगा दिया

अतीत के पन्ने पलटते हुए बेबाक रामचरन सिंह बताते हैं, ‘मैं उन दिनों हल्द्वानी में पोस्टिड था. मेरी भतीजी नीलम रिक्शे से कहीं जा रही थी. उसी दौरान दुपहिया सवार एक लड़के ने रिक्शे में टक्कर मार दी. भतीजी के गंभीर चोट आयी. मैं मौके पर पहुंचा तो लोग आरोपी (टक्कर मारने वाले लड़के को) की जान लेने पर उतारु दिखाई दिए. मैने मौके की नजाकत को देखते हुए आरोपी लड़के को मौके से भगा कर भीड़ से सुरक्षित कर दिया. बाद में भतीजी की जिंदगी दिल्ली के अस्पताल में महीनों चले इलाज के बाद बचाई जा सकी.’ जरा सोचिये कि, यह घटना अगर आज के किसी सिपाही-हवलदार-थानेदार की रिश्तेदार के साथ घटी होती तो, वो आरोपी को जेल में ठुंसवाए बिना क्या रह पाता?

एसएसपी की मासूम चाहतने कलेजा चीर दिया!

बकौल रामचरन सिंह, ‘एटा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक विक्रम सिंह (यूपी के रिटायर्ड पुलिस महानिदेशक पूर्व आईपीएस) मैं और डिप्टी एसपी/सर्किल अफसर (अब रिटायर्ड) अमर सिंह, महाबीरा और उसके गैंग के कई डाकूओं को एनकाउंटर में ढेर करके वापिस लौट रहे थे. जीप अमर सिंह साहब चला रहे थे. महाबीरा के मरने से बेहद खुश, रास्ते में एसएसपी विक्रम सिंह साहब, अमर सिंह से बोले ‘अमर सिंह मैं उस मां के पांव छूना चाहता हूं, जिसकी कोख से रामचरन सिंह ने जन्म लिया है. कल तुम मुझे रामचरन सिंह के गांव चरोरा ले चलो.’ विक्रम सिंह साहब की ‘चाहत’ सुनते ही, रामचरन सिंह का कलेजा मुंह को आ गया.

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रामचरन सिंह की ही मुंहजुबानी, ‘ मुझे लगा मानो किसी ने मेरे जिगर में खंजर घोंप दिया हो! मेरी आंखें डबडबा आईं. मैंने विक्रम सिंह साहब को ब-अदब बताना शुरु किया तो, जुबान लड़खड़ा रही थी...’सर, मुझे जिस मां मुखत्यार कौर की कोख ने जन्मा है वह, अब इस दुनिया में नहीं है.’ सच्चाई जब विक्रम साहब को पता लगी तो, उनकी आंखों में भर आए आंसू भी बिलख पड़े होंगे. इतना मुझे विश्वास है.’

उत्तर प्रदेश के पूर्व आईपीएस पुलिस महानिदेशक दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डॉ. विक्रम सिंह, जिन्होंने मातहत इंस्पेक्टर रामचरन सिंह को जन्म देने वाली उनकी मां के पांव छूने की हसरत जताई थी कभी

उत्तर प्रदेश के पूर्व आईपीएस पुलिस महानिदेशक दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट डॉ. विक्रम सिंह, जिन्होंने मातहत इंस्पेक्टर रामचरन सिंह को जन्म देने वाली उनकी मां के पांव छूने की हसरत जताई थी कभी

सबको निपटाकर खुद मशरूफ हो गए

16 जून सन् 1967 को रामचरन सिंह की शादी रामवती से हुई थी. रामवती अलीगढ़ के थाना- अतरौली के गांव राजगांव की रहने वाली थीं. रामवती के पिता चौधरी देवी सिंह सम्पन्न किसान थे. कालांतर में रामचरन सिंह और रामवती के तीन संतान शाकेंद्र सिंह, चेतना सिंह और शैलेंद्र सिंह का जन्म हुआ. शाकेंद्र पत्नी एवा (पत्नी मूलत: पोलैंड निवासी) और दो बेटों चौधरी गुरुष गैबरियल सिंह और चौधरी दिग्विजय सिंह के साथ कोटा (राजस्थान) में रह रहे हैं.

बेटी चेतना सिंह पति संजीव कुमार (भारतीय फौज में कर्नल) और बेटी वीजल के साथ फिलहाल श्रीनगर (कश्मीर) में है. जबकि रामचरन सिंह छोटे बेटे शैलेंद्र सिंह और उनकी पत्नी एकता, पोती आराध्या चौधरी गुनगुन और पोते सिद्धांत सिंह सिद्धू संग, उत्तराखंड के किच्छा में रहकर बड़े पैमाने पर खेतीबाड़ी और गऊशाला के कामकाज में मशरुफ हैं. एक्सीडेंट के बाद कई गंभीर ऑपरेशन के चलते रामचरन सिंह ने, दिसंबर सन् 1991 में सीबीसीआईडी बरेली में रहते हुए यूपी पुलिस की इंस्पेक्टरी से स्वैच्छिक सेवा-निवृत्ति ले ली.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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