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पुण्यतिथि विशेष: जब इंदिरा की विदेश नीति पर एक दूसरे से भिड़ गए थे अटल और लिमये

इंदिरा गांधी की पहली पुण्य तिथि पर लिखे अपने लेख में मधु लिमये ने एक अनसुनी-अनजानी बात लिख दी थी. विदेश मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के समय ही चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया था

Updated On: Oct 31, 2018 10:49 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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पुण्यतिथि विशेष: जब इंदिरा की विदेश नीति पर एक दूसरे से भिड़ गए थे अटल और लिमये
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प्रधानमंत्री ‘इंदिरा गांधी ने अफगानिस्तान के मामले में भारत और सोवियत संघ को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने के प्रयास को नाकाम बना दिया था.’

पूर्व समाजवादी सांसद मधु लिमये की इस सराहनापूर्ण टिप्पणी उन दिनों चर्चित रही. यह 1985 की बात है. अटल जी के खिलाफ मधु लिमये की एक टिप्पणी को अटल जी नजरअंदाज नहीं कर सके. क्योंकि टिप्पणी कड़ी थी.

इंदिरा जी की सराहना की चर्चा इसलिए हुई क्योंकि मधु लिमये ने उससे पहले लगातार कांग्रेस व खासकर इंदिरा गांधी का विरोध किया था. सांसद के रूप में उन्होंने कांग्रेस सरकारों पर समय-समय पर तीखे हमले किए.

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हालांकि इस अवसर पर भी एक अन्य मामले में मधु जी ने इंदिरा गांधी की आलोचना की. खासकर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर. पर साथ ही मधु लिमये ने चरण सिंह के खिलाफ भी कड़ी टिप्पणी कर दी. अटल जी उस पर भी चुप नहीं रहे.

जब आमने-सामने हो गए अटल और लिमये

मधु लिमये ने लिखा कि ‘अफगानिस्तान का प्रश्न भी चरण सिंह सरकार के अंतिम दिनों में यानी इंदिरा गांधी द्वारा शपथ ग्रहण के पहले ही उपस्थित हो गया था. चरण सिंह अनुभवहीन और इतने गंभीर प्रश्न पर सही निर्णय करने में सर्वथा असमर्थ व्यक्ति थे.’

मधु लिमये

मधु लिमये

जवाब देते हुए पूर्व विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि मैं यह नहीं मानता कि सोवियत संघ और भारत के मैत्री संबंध इतने कच्चे और कमजोर हैं कि भारत द्वारा अफगानिस्तान के प्रश्न पर एक सिद्धांतपरक रवैया अपनाते ही वे टूट जाते.’

इंदिरा गांधी की पहली पुण्य तिथि पर लिखे अपने लेख में मधु लिमये ने एक अनसुनी-अनजानी बात लिख दी थी. विदेश मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के समय ही चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया था.

याद रहे कि अटल जी मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री थे. मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक प्रधान मंत्री थे.

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इस बारे में मधु लिमये लिखते हैं कि ‘चीन ने वियतनाम पर हमला किया और उसकी सूचना तक अटल जी को नहीं दी. अटल जी के साथ एक पत्रकार भी चीन गया था. उसने नई दिल्ली को फोन किया.

तब उस पत्रकार को मालूम हुआ के जापान न्यूज एजेंसी की ओर से खबर प्रसारित की गई है कि वियतनाम पर चीन ने हमला कर दिया है. तब कहीं अटल जी को पता चला. मोरारजी देसाई ने इस हमले की निंदा करते हुए अटल जी से कहा कि ‘आतिथ्य बहुत हुआ,अब चुपचाप वापस आ जाइए.’

इतनी कड़ी टिप्पणी पर अटल जी भला कैसे रुकते ?

अटल जी ने लिखा कि ‘लिमये जी को पूरा अधिकार है कि वे इंदिरा जी की विदेश नीति की तारीफ में जमीन आसमान एक करें. किंतु उन्हें यह अधिकार नहीं है कि वे जनता सरकार की विदेश नीति को बदनाम करने के लिए तथ्यों को तोड़ें मरोड़ें और निराधार कहानियां गढ़ें.

लिमये के अनुसार, मेरी चीन यात्रा के दौरान जब चीन ने वियतनाम पर हमला कर दिया तो मोरार जी देसाई ने इस हमले की निंदा करते हुए अटल जी से कहा कि आतिथ्य बहुत हुआ, अब चुपचाप वापस आइए.

अटल के अनुसार श्री लिमये की यह कहानी मन गढ़ंत है. वियतनाम के खिलाफ चीन की कार्रवाई के विरोध स्वरूप अपनी यात्रा को बीच में ही रद कर स्वदेश लौटने का निर्णय मेरा अपना निर्णय था.इस बारे में मैंने श्री मोरारजी भाई से किसी तरह का परामर्श नहीं किया था. न ही मोरार जी भाई ने ही इस बारे में मुझे कोई संदेश भेजा था.

Former prime minister Atal Bihari Vajpayee

चीनी कार्रवाई के खिलाफ मैंने सबसे पहले चीन में बोला.फिर मैंने हांगकांग में चीन की कार्रवाई की आलोचना की और भारत आकर संसद में स्पष्ट शब्दों में उसे आक्रमण की संज्ञा दी थी.

याद रहे कि जब यह बौद्धिक मुठभेड़ चल रही थी,उन दिनों मोरारजी देसाई भी जीवित थे. इस विवाद पर उनकी कोई टिप्पणी नहीं आई.दरअसल तब तक वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे.

चरण सिंह पर मधु लिमये की तीखी टिप्पणी का जवाब देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि मधु लिमये ने चौधरी चरण सिंह पर जो व्यक्तिगत आक्षेप किये हैं, वे आपत्तिजनक व अशोभनीय हैं.

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यदि चौधरी साहब इतने गंभीर प्रश्न पर सही निर्णय करने में सर्वथा असमर्थ व्यक्ति थे तो श्री मधु लिमये ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाने में मदद क्यों की?’

इसके जवाब में मधु लिमये ने कहा कि मैंने जिस नीति की आलोचना की है, वह वाजपेयी और उनके सलाहकार जगत मेहता की अपनी नीति थी. विदेश नीति के बारे में जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्य समिति या केंद्रीय संसदीय बोर्ड में कभी चर्चा नहीं हुई.

मैं श्री वाजपेयी की तरह न तो कवि हूं और न ही हिन्दी भाषा पर मेरा उनकी तरह अधिकार है. मेरे उत्तर का आधार तर्क, सत्य और अकाट्य प्रमाण हैं.

(ये लेख पहले भी प्रकाशित हो चुका है)

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