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जब इमरजेंसी के बाद हाथी पर जनता से मिलने पहुंची थीं इंदिरा गांधी

विपक्ष में रहते हुए सरकार के प्रति विरोध जताने के लिए आम आदमी के परिवहन साधनों का प्रयोग अब भले ही प्रतीकात्मक हो मगर इंदिरा गांधी के नाम इसका अमिट रिकॉर्ड है

Anant Mittal Updated On: Jun 25, 2018 09:04 AM IST

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जब इमरजेंसी के बाद हाथी पर जनता से मिलने पहुंची थीं इंदिरा गांधी

गुजरात के भावी विधानसभा चुनाव के लिए सौराष्ट्र अंचल में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब बैलगाड़ी पर सवार होकर जनता को लुभाने की कोशिश कर रहे थे, उसी दौरान उनकी पार्टी के कार्यकर्ता पंजाब और दिल्ली में पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई के खिलाफ बैलगाड़ियों की सवारी करके विरोध जता रहे थे.

आवाज की गति से भी तेज यानी सुपरसोनिक विमानों के इस युग में बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, ऊंटगाड़ी, रिक्शा या साइकिल पर चढ़कर जनता के बीच जाने, विधायी सदनों में आने अथवा विरोध प्रदर्शन करने की परंपरा भारतीय राजनीति में नई नहीं है.

इसका सिलसिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के 1966 में रूपए का पहली बार अवमूल्यन करने के समय शुरू हुआ था. उस समय विपक्ष के खांटी नेता राममनोहर लोहिया, राजनारायण, पीलू मोदी, अशोक मेहता आदि नेताओं ने रूपए के अवमूल्यन से पेट्रोलियम पदार्थ महंगे होने के विरोध में साइकिल रिक्शा, बैलगाड़ी में संसद भवन पहुंचकर विरोध जताया था. उसके बाद तो संसद सहित देश भर की तमाम विधानसभाओं में भी ऐसे नजारे अक्सर नमूदार होने लगे.

महज चार ही साल पहले जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बेतहाशा बढ़ने के चलते यूपीए सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बढ़ाने पड़े थे तो अनेक विपक्षी सांसद विरोध स्वरूप साइकिल रिक्शा और बैटरी रिक्शा में बैठकर संसद भवन पहुंचे थे.

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भारत का संसद भवन (फोटो: पीटीआई)

जनता के परिवहन इस्तेमाल करने में माहिर थीं इंदिरा गांधी

विपक्ष में रहते हुए सरकार के प्रति विरोध जताने के लिए आम आदमी के परिवहन साधनों का प्रयोग अब भले ही प्रतीकात्मक हो मगर इंदिरा गांधी के नाम इसका अमिट रिकॉर्ड है. वे 1977 के अगस्त महीने में बतौर विपक्षी नेता हाथी की पीठ पर आधी रात में बिहार के बेलछी गांव पहुंच गई थीं. उनके उस दुस्साहस की बराबरी पक्ष-विपक्ष का कोई भी नेता भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में आज तक नहीं कर पाया. बमुश्किल 500 बेहद गरीब लोगों का बेलछी गांव तब नरसंहार के कारण सुर्खियों में था.

इंदिरा गांधी आपातकाल के बाद 1977 में हुए ऐतिहासिक आम चुनाव में बतौर प्रधानमंत्री अपनी और कांग्रेस की बुरी तरह हुई हार के बाद घर पर बैठी थीं. प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की सदारत में जनता पार्टी की सरकार बने बमुश्किल नौ महीने हुए थे तभी बिहार के इस दूरदराज गांव में दलितों का यह जघन्य कत्लेआम हो गया.

जनता की नब्ज पकड़ने में माहिर इंदिरा गांधी ने मौका ताड़ा और दिल्ली से हवाई जहाज के जरिए सीधे पटना और वहां से कार से बिहार शरीफ पहुंच गईं. तब तक शाम ढल गई और मौसम बेहद खराब था. नौबत इंदिरा गांधी के वहीं फंस कर रह जाने की आ गई लेकिन वे रात में ही बेलछी पहुचने की जिद पर डटी रहीं. स्थानीय कांग्रेसियों ने बहुत समझाया कि आगे रास्ता एकदम कच्चा और पानी से लबालब है लेकिन वे पैदल ही चल पड़ीं. मजबूरन साथी नेताओं को उन्हें जीप में ले जाना पड़ा मगर जीप कीचड़ में फंस गई. फिर उन्हें ट्रैक्टर में बैठाया गया तो वह भी गारे में फंस गया.

इंदिरा तब भी अपनी धोती थामकर पैदल ही चल दीं तो किसी साथी ने हाथी मंगाकर इंदिरा गांधी और उनकी महिला साथी को हाथी की पीठ पर सवार किया. बिना हौदे के हाथी की पीठ पर उस उबड़-खाबड़ रास्ते में इंदिरा गांधी ने बियाबान अंधेरी रात में जान हथेली पर लेकर पूरे साढ़े तीन घंटे लंबा सफर किया.

वे जब बेलछी पहुंची तो खौफजदा दलितों को ही दिलासा नहीं हुआ बल्कि वे पूरी दुनिया में सुर्खियों में छा गईं. हाथी पर सवार उनकी तस्वीर सब तरफ नमूदार हुई जिससे उनकी हार के सदमे में घर में दुबके कांग्रेस कार्यकर्ता निकलकर सड़क पर आ गए. इंदिरा के इस दुस्साहस को ढाई साल के भीतर जनता सरकार के पतन और 1980 के मध्यावधि चुनाव में सत्ता में उनकी वापसी का निर्णायक कदम माना जाता है.

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इंदिरा गांधी

कभी साइकिल से संसद आते थे हमारे नेता

परिवहन के आम-फहम साधनों का आजादी के आंदोलन में भी बखूबी प्रयोग हुआ. महात्मा गांधी सहित तमाम नेताओं ने पैदल और हाथी-घोड़ों की पीठ पर मीलों सफर करके आजादी की अलख जगाई. आजादी के बाद 1952 में गठित पहली निर्वाचित संसद के अनेक सदस्य भी स्थानीय परिवहन के लिए साइकिल आदि का ही प्रयोग करते थे. वे साइकिल पर ही संसद के सत्र में शामिल होने आते थे. संसद के पहले निर्वाचित सदन में सदस्य रहे रिशांग कीशिंग के अनुसार वे 1952 में अपनी साइकिल पर ही संसद भवन जाते थे.

किशिंग बताते हैं कि उस जमाने में मंत्री ही अंबेसेडर कार में सवार होकर संसद भवन में आते थे बाकी सांसद अधिकतर साइकिलों पर या पैदल ही सत्र में शामिल होने आ जाते थे. मणिपुर से सोशलिस्ट पार्टी की ओर से निर्वाचित होकर आए रिशांग कीशिंग तब महज 32 साल के थे और 60 साल तक लगातार सांसद रहे.

उधर नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री मार्क रट्स तो देश की राजधानी द हेग में आज भी सरेआम अपनी साइकिल पर ही घूमते हैं. वे न सिर्फ अपने घर से दफ्तर तक अकेले ही साइकिल चलाकर आते हैं बल्कि अपनी खरीदारी आदि के लिए भी उसी तरह घूमते हैं. उनके साथ सुरक्षा के तामझाम कारों या मोटरसाइकिलों का भी कोई काफिला नहीं होता. इतना ही नहीं मार्क ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नीदरलैंड्स दौरे में उन्हें भी खुद चलाने के लिए साइकिल भेंट की थी. श्री मोदी इसी साल जून महीने के आखिर में नीदरलैंड्स के दौरे पर गए थे और उन्होंने उपहार में मिली साइकिल पर चढ़कर अपनी तस्वीर भी ट्विटर पर साझा की थी.

ऑटो में चलने वाली राजदूत

मेक्सिको की दिल्ली स्थित राजदूत मेलबा प्रिआ का तो सरकारी वाहन ही ऑॅटो रिक्शा है. वे दिल्ली में और प्रदूषण न बढ़ाने के लिए अपने दूतावास के चिन्ह और डिप्लोमैटिक नंबर वाले तिपहिये में ही घूमती हैं. चाहे भले ही उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री से मिलने रायसीना की पहाड़ी पर आना हो या खरीदारी के लिए बाजार जाना हो.

मेलबी अपने विशेष ऑटो में ही आती जाती हैं

मेलबा अपने विशेष ऑटो में ही आती जाती हैं

सुरक्षा की चिंता नहीं होती? पूछने पर उनका जवाब होता है यहां लाखों लोग तिपहिए में ही सवारी करते हैं तो उनके क्या सुर्खाब के पर लगे हैं! उधर पार्च्ड फिल्म में अपने बोल्ड अभिनय के लिए चर्चित बॉलीवुड अभिनेत्री राधिका आप्टे ने अपने दर्शकों पर छाप डालने की कोशिश में तिपहिया में फैशन शूट ही करवा डाला. उन्होंने अपनी ऐसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की तो जाहिर है कि पसंद करने वालों का तांता लग गया.

इसी बीच कांग्रेस की लोकसभा सदस्य रंजीत रंजन ने महिला दिवस पर मोटर साइकिल खुद चलाकर संसद भवन पहुंच कर सुर्खियां बटोर लीं. उनका कहना है कि वे लैंगिक भेदभाव की दीवार गिराने के लिए मोटर साइकिल चलाकर आई थीं, हालांकि देश के तमाम शहरों में लड़कियां पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में मोपेड-स्कूटी और मोटर साइकिल बखूबी चलाती हैं. हां, उनकी तरह किसी महिला सांसद ने मोटर साइकिल चलाकर संसद भवन में आने का प्रयोग जरूर पहली बार किया. अब अगर मुलायम-अखिलेश सिंह यादव कुनबे की बात करें तो उनकी समाजवादी पार्टी का तो चुनाव चिन्ह ही साइकिल है.

अखिलेश ने साल 2012 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई हजार किलोमीटर साइकिल चलाकर सीधे मुख्यमंत्री की कुर्सी ही लपक ली थी. साफ है कि तेज गति वाहनों में सरपट सत्ता की मंजिलें नापने वाले राजनेता भी जनता के दरबार में प्रतीक रूप में ही सही, आम परिवहन के साधनों की शरण में जाते हैं तो उन्हें जनता का भरोसा जीतने में आसानी होती है. शायद साइकिल को प्रतिरोध का जरिया बनाने की नेताओं की इसी प्रवृत्ति के चलते बाजार में अब लीडर साइकिल भी मिलने लगी है.

(यह लेख पूर्व में छप चुका है)

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