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अगर पर्यावरण से प्यार करते हैं तो बस मांस खाना छोड़ दीजिए !

अगर आप पर्यावरणवादी और मानवता-प्रेमी बनना चाहते हैं तो फिर आपको इसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करना है—बस मांस खाना छोड़ दीजिए !

Maneka Gandhi Maneka Gandhi Updated On: Feb 21, 2018 05:17 PM IST

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अगर पर्यावरण से प्यार करते हैं तो बस मांस खाना छोड़ दीजिए !

मान लीजिए कि आप किसी दूसरे ग्रह के प्राणि यानि एलियन हैं और आप भूले-भटके इस धरती पर आ जाते हैं. यहां आकर आप सुनते हैं कि धरती पर ज्यादातर लोगों को रोजाना एक बाल्टी से भी कम पानी में काम चलाना पड़ रहा है क्योंकि कुछ दूसरे लोग बहुत ज्यादा पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे इस पानी का इस्तेमाल जानवरों को खिलाने, नहलाने-धुलाने और जान से मारने में कर रहे हैं ताकि इन जानवरों का मांस वे खा सकें जबकि ऐसा करने की जरूरत ही नहीं है, तो फिर, आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी ?

डगलस एडम्स की मशहूर किताब ‘हेचहाइकर्स गाइड टू द गैलेक्सी’ में जिक्र आता है कि ब्रह्मांड ने एक खास फैसला लिया है. फैसला यह कि धरती को मटियामेट कर देना है ताकि धरती का वजूद हटे तो एक राह बनाई जा सके. लेकिन अब इस इंतजार की जरूरत ही नहीं रहे कि ब्रह्माण्ड की कोई शक्ति आए और हमारा सत्यानाश करे, दरअसल हम अपना सत्यानाश तो रोजाना ही कर रहे हैं.

मांस का उद्योग दुनिया का एक तिहाई ताजा पानी प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से इस्तेमाल करता है. वैश्विक स्तर पर मांस का उत्पादन अब दोगुना होने जा रहा है. साल 2000 में 229 मीट्रिक टन मांस का उत्पादन हुआ था जिसके 2050 में बढ़कर 465 मीट्रिक टन होने की संभावना है. धरती के जल-संसाधनों पर पहले ही इतना ज्यादा बोझ है कि अब बेसंभाल हो रहा है.

हालात की गंभीरता को समझने के लिए इस तथ्य पर विचार कीजिए – अगर दुनिया का हर देश मांस के बढ़े हुए उपभोग के मामले में अमेरिकी ढर्रा अपना लेता तो दुनिया से पानी साल 2000 में ही खत्म हो चुका होता. बहरहाल, भारत और चीन में मांसाहार का चलन लगातार बढ़ रहा है सो अगले 25 सालों में पानी खत्म हो जाएगा और आप में से कई लोग जीते जी अपनी आंखों से ये हालत देखेंगे.

हर साल 4 अरब जानवर मारे जाते हैं. इस सालाना संहार का सबसे ज्यादा शिकार मुर्ग होते हैं. दुधारू पशुओं की तुलना में वे आकार में छोटे होते हैं सो इसकी भरपाई उन्हें ज्यादा संख्या में मारकर की जाती है.

पॉल्ट्री(मुर्गा-पालन) भारत में तेजी से बढ़ता उद्योग है. लोगों के बीच मुर्ग के मांस को सस्ता और पोषक आहार बताकर प्रचार किया जाता है. भारत में मुर्गे का एक किलो गोश्त 100 रुपए में मिल जाता है और कभी-कभी यह कीमत दाल से भी कम पड़ती है! पता नहीं क्या वजह है जो लोग मुर्ग का मांस खाने को अपनी जीवन-स्तर की बढ़वार से जोड़कर देखते हैं.

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किसी परिवार का सामाजिक रुतबा बुलंदी चढ़े तो वह अपनी हैसियत के ऐलान में बीफ या मटन की जगह चिकन खाना पसंद करता है. फास्ट फूड के विदेशी चेन इसको और ज्यादा लोकप्रिय बना रहे हैं. हां, यह बात जरूर है कि विदेशी निर्माता चिकन के नाम पर जो परोसते हैं वह एक किस्म का गुलाबी गोंद होता है जिसे बनावटी तरीके से गोश्त का रूप दे दिया जाता है.

द ग्लोबल एग्रीकल्चरल इन्फॉरमेशन नेटवर्क का कहना है भारत में प्रसंस्कृत(प्रोसेस्ड) चिकन का उपभोग सालाना 15-20 फीसद की तेजी से बढ़ रहा है. साल 2017 में चिकन का उत्पादन 7 प्रतिशत बढ़कर 4.5 मिलियन टन हो गया है. भारतीय पशुपालन, डेयरी और मत्स्य-पालन विभाग के मुताबिक भारत में साल 2016 में गोश्त के लिए तकरीबन 238 करोड़ मुर्गे मारे गए.

इस पॉल्ट्री उत्पादन के 70 फीसद हिस्से पर बड़ी कंपनियों का कब्जा है जो हैचरी(चूजे तैयार करने की सुविधा) फीड(दाना) मिल चलाती हैं तथा मुर्ग को मारने तथा गोश्त निकालने की मशीनें लगाती हैं. मांस के उत्पादन के इन सभी चरणों में भरपूर पानी का इस्तेमाल होता है.

मुर्गे के भोजन के लिए दाना तैयार करने में और उनकी प्यास बुझाने के लिए अगर पानी का इस्तेमाल होता है तो उन्हें जिस परिवेश में पाला जाता है उसके रख-रखाव में तथा मुर्गे को मारने, साफ करने तथा उसके मांस को प्रोसेस्ड करने में भी. उत्पादन के हर चरण में पॉल्ट्री से पानी प्रदूषित होता है.

इस पानी को फिर से साफ नहीं किया जा सकता. ना तो इस पानी को पिया जा सकता है और ना ही ऐसे पानी का फसलों के लिए इस्तेमाल हो सकता है. इस पानी में खूब सारे एंटीबायोटिक्स तथा पेस्टीसाइड होते हैं सो इस पानी के इस्तेमाल से अगर कोई फसल उगाई जाय तो सेहत के लिए गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. पानी का इस्तेमाल और पानी का प्रदूषण- इन दो चीजों को एक साथ जोड़कर देखें तो पॉल्ट्री का वाटर फुटप्रिंट बहुत ज्यादा है.

याद रहे कि 238 करोड़ मुर्ग का मतलब हुआ भारत की जितनी आबादी है उसके दोगुने से भी ज्यादा. अगर एक मुर्गे पर रोजाना के हिसाब से एक लीटर पानी की खपत भी मान लें तब भी आंकड़ा 238 करोड़ लीटर पानी का आता है. उत्तर भारत के सारे गांवों को मिलाकर देखें तब भी वहां इतना पानी मौजूद नहीं. लेकिन एक मुर्गे पर रोजाना एक लीटर या साल में 365 लीटर ही पानी नहीं लगता. पानी की मात्रा इससे कहीं ज्यादा बल्कि यह कहना ठीक होगा कि बहुत ज्यादा लगती है.

पॉल्ट्री के एतबार से जिन पक्षियों का पालन किया जाता है वे मकई के दाने, सोयाबीन से तैयार आहार, ज्वार-बाजरा, गेहूं और चावल की खुद्दी आदि खाते  हैं जो अक्सर कान्सेन्ट्रेट्स के रुप में परोसे जाते हैं और इसके लिए पानी की जरूरत होती है. आहार में दिए जाने वाले 1 किलोग्राम कान्सेन्ट्रेटस् को तैयार करने में औसतन 1000 लीटर पानी की खपत होती है.

अगर पॉल्ट्री के पक्षियों को कुदरती तौर पर भोजन करने दिया जाय तो कान्सेन्ट्रेट्स रूप में दिए जाने वाले आहार की मात्रा 40 फीसद हो जाएगी लेकिन आधुनिक पॉल्ट्री इंडस्ट्री पक्षियों को तंग दड़बे में रखती हैं और उन्हें आहार का 70 फीसद हिस्सा कान्सेन्ट्रैट्स के रूप मे दिया जाता है. चूंकि ज्यादातर फॉर्म चारे की बढ़वार के लिए रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल करते हैं सो इस क्रम में कुछ और लीटर पानी प्रदूषित होता है और वाटर फुटप्रिन्ट बढ़ता है.

अगर किसी पॉल्ट्री केंद्र में 1000 पक्षी हों तो उसमें रोजाना औसतन 400 लीटर पानी पीने के लिए इस्तेमाल होता है. नए चलन के बॉयलर हाउस में पक्षियों को इतने तंग दड़बे में रखा जाता है कि वे ठीक से अपने पंख भी नहीं फड़फड़ा सकते. ऐसे बॉयलर हाउस में कूलिंग सिस्टम लगा होता है ताकि पक्षी जीवित रह सकें. गरमी के दिनों में कूलिंग सिस्टम में बहुत ज्यादा पानी की खपत होती है. पक्षियों की मल-मूत्र और उनके झड़े हुए पंखों तथा उनकी रहने की जगह की सफाई में भी पानी का इस्तेमाल होता है.

पक्षियों को मारने से पहले उन्हें बड़े से इलेक्ट्रिक वाटर बाथ में डालकर सुन्न किया जाता है. इसमें बहुत ज्यादा पानी लगता है और इस पानी को बार-बार बदलना पड़ता है क्योंकि मरता हुए पक्षी इस पानी में मल-मूत्र त्याग करता है. छीलने के लिए पक्षियों के शरीर को खौलते पानी में डाला जाता है. इसके बाद पक्षी के शरीर को एक बार ठंढे पानी में डाला जाता है ताकि उसकी चमड़ी बची रह सके.

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मारे गए पक्षी को उपभोग के लायक बनाने के लिए उसके शरीर के भीतरी हिस्से को साफ किया जाता है. इसमें कुछ अंग हटाने होते हैं. इस प्रक्रिया में भी हजारों लीटर पानी खर्च होता है. कंप्रेसर और पंप को ठंढा रखने तथा औजारों को साफ-सुथरा करने में भी पानी की खपत होती है.

हर पक्षी के शरीर को उपभोग के लायक बनाने में 35 लीटर पानी का खर्च होता है सो कुल पानी की मात्रा निकालने के लिए आप 238 करोड़ में 35 से गुणा कर दीजिए.

प्रोसेसिंग प्लांट से निकले गंदे पानी में बहुत सी प्रदूषणकारी चीजें तथा सस्पेन्डेंड मैटर होते हैं. पानी को बाहर फेंकते हुए इन्हें साफ नहीं किया जाता. यह गंदा पानी आस-पास के इलाके के पानी से मिलता है और कुछ और पानी प्रदूषित होता है.

मुर्गे के एक किलोग्राम मांस के उत्पादन में औसतन 4325 लीटर पानी खर्च होता है. जब जब आप मुर्गे का 1 किलोग्राम मांस खाते हैं तो दरअसल आप 4325 लीटर पानी की भी खपत कर रहे होते हैं और इतना पानी तो यूपी के किसी गांव को पूरे हफ्ते भर में नहीं मिलता. तुलना कीजिए कि 1 किलोग्राम सब्जी के उत्पादन में 322 लीटर पानी लगता है, 1 किलो फल के उत्पादन में 962 लीटर जबकि 1 किलोग्राम अनाज के उत्पादन में 1644 लीटर पानी की खपत होती है.

भारत में दुनिया का बेहतरीन शाकाहारी भोजन उपलब्ध है, यहां कई किस्म की सब्जियां और अनाज मौजूद हैं. दाल और सोया प्रोटीन के बेहतर वैकल्पिक स्रोत हैं और इनके लिए कहीं कम पानी की जरुरत होती है. मुर्ग के मांस के 1 ग्राम प्रोटीन के लिए 34 लीटर पानी की जरुरत होती है लेकिन दाल के 1 ग्राम प्रोटीन के उत्पादन में केवल 19 लीटर पानी की खपत होती है.

भारत की स्थिति ऐसी नहीं कि वह इतने इफरात में पानी की बर्बादी करे. पानी की कमी, सूखा तथा अकाल हमारी आज की सच्चाइयां हैं. धनी देश मुर्ग और अंडे के रुप में एक तरह से देखें तो हमसे पानी का ही आयात कर रहे हैं लेकिन बिन पानी की दुनिया कैसी होती है, यह सबसे पहले हम विकासशील देशों को देखना और झेलना होगा.

ना, आप वह तो नहीं ही कर सकते जो इजरायल कर रहा है. इजरायल मशीनों के जोर से समुद्र के पानी को पेयजल के रूप में तब्दील कर रहा है. समुद्रों से मछलियां लगातार खत्म हो रही हैं और समुद्र में कई जगहों पर डेड जोन बन गए हैं जहां कुछ भी नहीं उपज सकता. इन डेड जोन्स को आप गूगल पर देख सकते हैं. यहां पानी मृत हो चुका है और अब इस पानी का कोई इस्तेमाल नहीं हो सकता. अगर आप पर्यावरणवादी और मानवता-प्रेमी बनना चाहते हैं तो फिर आपको इसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करना है—बस मांस खाना छोड़ दीजिए !

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