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‘राजनीति’ से तौबा क्यों करती हैं महिला पत्रिकाएं

सभी फीमेल स्पेशल मैगज़ीन में न तो कभी देश की सामरिक नीतियों पर कोई चर्चा होती है, न ही आस-पास हो रहे किसी प्रकार के राजनैतिक परिवर्तनों के बारे में

Anu Shakti Singh Updated On: Sep 06, 2017 07:29 PM IST

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‘राजनीति’ से तौबा क्यों करती हैं महिला पत्रिकाएं

हाल ही में निर्मला सीतारमण भारत की रक्षा-मंत्री के पद पर नियुक्त हुई हैं. उनकी नियुक्ति के साथ ही केंद्र के तीन ताकतवर मंत्रालय रक्षा, विदेश और सूचना-प्रसारण अब महिला जन-प्रतिनिधियों के जिम्मे है. यह राजनैतिक खबर महिला-सशक्तिकरण के लिहाज से एक बेहद महत्वपूर्ण खबर है. जिसका जिक्र लगभग तमाम अखबार, पत्रिकाओं और खबरिया वेबसाईट ने किया, सिवाय उन पत्रिकाओं के जिन्हें फीमेल मैगज़ीन या फिर स्त्री-केंद्रित पत्रिका कहा जाता है.

जब खबर के सारे रंग सुश्री सीतारमण की उपलब्धियों के रंग में रंगे थे, उस वक्त महिलाओं के लिए खास तौर पर छपने और संपादित होने वाली इन पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं में क्या खबर छप रही थी?

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गुलाबी खबरों की दुनिया में

अग्रेंजी से लेकर हिंदी, सारी भाषाओं की फीमेल मैगजीन आंखों के लिहाज से खूब सारा आकर्षण समेटे होती हैं. खूब सारी तस्वीरों और हल्की-फुल्की मजेदार खबरों के गुलाबी रंग से रंगी हुई ये पत्रिकाएं अपने आर्टिकल और फीचर कई सेग्मेंट्स में पाठकों तक लाती हैं.

अंग्रेजी पत्रिका एल्ल इंडिया अपने लेखों को तकरीबन फैशन, ब्यूटी, कल्चर, एस्ट्रो(भविष्यफल), ब्यूटी, ब्यूटी अवार्ड्स जैसे खंडों में बांट कर प्रस्तुत करती हैं. इन सेग्मेंट्स के आलेख और रिपोर्ताज सौंदर्यीकरण, फैशन के नए मापदंड जैसे मुद्दों के आस-पास घूम रहे होते हैं.

इसी ढर्रे पर चलते हुए कॉस्मोपॉलिटन वेबसाइट अपने आलेखों को सेलिब्रिटी, सौंदर्य, फैशन, रिश्ते और जीवन जैसे विषयों के करीब बांध लेता है. वोग इंडिया की वेबसाइट पर एक अतिरिक्त टैब ‘न्यूज़’ का दिखता है. इस खास न्यूज सेगमेंट में सबसे ग्लैमर के उस संसार से होती हैं जहां डेविल प्राडा पहनते हैं और शाहरुख खान की बिटिया सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक.

नामचीन हिंदी पत्रिका गृहलक्ष्मी सेग्मेंट्स के मामले में अंग्रेजी पत्रिकाओं के बनिस्पत अमीर है. यह वेब-पत्रिका ब्यूटी, प्रेगनेंसी, धर्म, साहित्य, मनोरंजन, ट्रेवल, लाइफस्टाइल, जैसे सब्जेक्ट लाइन पर बात करने की कोशिश करती है. इन सब पत्रिकाओं में अकेला अछूता विषय ‘राजनीति और समाज’ हैं, जिससे जुड़ी हुई एक भी गंभीर खबर किसी पेज पर नजर नहीं आती.

टीवी तक संक्रमण

महिलाओं से राजनीति की ख़बरों को दूर रखने का यह अभियान सिर्फ महिला-केंद्रित वेबसाइट/पत्रिकाएं ही नहीं चलातीं. यह रोग मुख्य खबरिया वेब-पत्रों और न्यूज चैनलों तक भी फैला हुआ है. उनके महिला विमर्श केंद्रित अंकों और प्रोग्राम्स में भी चर्चा सीमित मुद्दों के आस-पास ही सिमटती नजर आती हैं. यह खास बात है कि इन सभी फीमेल स्पेशल शो और मैगज़ीन में पीरियड और सेक्स जैसे मुद्दे पर खुल कर बात होती है, पर न तो कभी देश की सामरिक नीतियों पर कोई चर्चा होती है, न ही आस-पास हो रहे किसी प्रकार के राजनैतिक परिवर्तनों के बारे में. इन खबरों से एक अनजान दूरी बना कर रखी जाती है, जैसे इस तरह की खबरों से स्त्रियों का कोई राबता ही न हो.

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सॉफ्टर जेंडर के लिए सॉफ्ट खबरें

महिला केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं और टीवी प्रोग्राम के इस ट्रेंड पर प्रख्यात अमेरिकी स्त्रीवादी नाओमी वुल्फ लिखती हैं, 'सुंदरता का मिथक कई स्तरों पर काम करता है. उनमें से एक अहम् स्तर औरतों को खबरों से और राजनीति से दूर रखना भी है.' अपनी बात रखते हुए नाओमी ने उदाहरण भी दिया कि किस तरह से जानीमानी महिला-पत्रिका ‘ग्लैमर’ में से राजनीति का कॉलम निकाल कर वह पन्ना ‘भविष्यफल’ को दे दिया गया था. उसके बाद शायद ही किसी महिला केंद्रित पत्रिका ने इन विषयों को वापस समेटने की कोशिश की है.

यहां, यह गौरतलब है कि इन पत्रिकाओं को सॉफ्ट-जर्नल कहा जाता है, जबकि देश और राजनीति से जुडी खबरें हार्ड-न्यूज का हिस्सा मानी जाती हैं. खबरों के बीच का यह भेद-भाव कुछ उस तरह का भेद है जैसा आम जीवन में स्त्रियों और पुरुषों के बीच किया जाता है. स्त्रियां कोमलांगी हैं और पुरुष मजबूत.

राजनीतिक खबरों और इससे आम महिलाओं लागातार कायम रही दूरी पर बात करते हुए अक्सर कुछ मिथक दिमाग में कौंध जाते हैं. यह पितृसत्ता का वह खेल नजर आता है जिसमें स्त्रियों को तमाम मजबूत विषयों से जान-बूझकर दूर रखा गया हो. अधिकतर लडकियां ‘गणित’ और ‘होम साइंस’ के विकल्प में होम-साइंस चुन लेती थीं क्योंकि उनसे बहुत सारे लोग कह देते थे कि तुम लड़की हो ‘गणित’ समझना तुम्हारे लिए मुश्किल होगा. न वे गणित समझेंगी, न ही ‘अर्थ’ और ‘वित्त’ जैसे मुद्दों पर उनका अधिपत्य हो पाएगा.

अंग्रेजी और हिंदी, तमाम भाषाओं की महिला पत्रिकाएं लगभग वैसी ही पितृ-सत्तात्मक भूमिका निभाती नजर आती हैं. स्त्रियों के लिए राजनीति को ‘ब्लैक होल’ सरीखा बना दिया जाए, ताकि वे खुद इससे दूर होती जाएं.

हो सकता है, इसी सिलसिले में प्लेटो ने कहा हो, 'राजनीति में शामिल न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आप अपने से कम क्षमतावान लोगों की सत्ता के नीचे होते हैं.’

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