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पार्ट-1: देश में पानी की कमी नहीं है लेकिन जलसंरक्षण में लगातार फेल हो रहे हैं हम !

इजरायल ने कई दशक पहले इस स्थिति को भांप लिया था, तब उन्होंने ‘वॉटर इक्वेशन’ पर काफी शोध किया और कई क्रांतिकारी और नए तरीकों को अपनाकर खुद को आत्मनिर्भर बनाया

Updated On: Jul 03, 2018 07:16 AM IST

Moin Qazi

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पार्ट-1: देश में पानी की कमी नहीं है लेकिन जलसंरक्षण में लगातार फेल हो रहे हैं हम !

एक देश के तौर पर भारत ने अपनी जिस प्राकृतिक संपदा की सबसे ज्यादा अवहेलना की है वो पानी है. देश में इस समय पानी के संरक्षण को लेकर होने वाली अव्यवस्था अपने चरम पर है, वो लगातार लोगों की परेशानी की सबब बना हुआ है. देश के छह सौ से भी ज्यादा लोग पानी के प्राकृतिक स्रोत को भरने के लिए बरसात के पानी पर निर्भर होते हैं, लेकिन जिस तरह से बारिश आंख-मिचौली का खेल पिछले कुछ सालों से खेलता आया है उससे इन लोगों के जीवन में एक किस्म की असुरक्षा घर करती जा रही है.

ये कमोबेश हर साल की कहानी है, जब पूरे देश की हालत मॉनसून का बेसब्री से इंतजार करते हुए खराब होती जाती है. लेकिन इस सबसे हम भारत के लोग न कोई सबक लेने के तैयार हैं न ही कुछ सीखने को. हमारे हाथों पानी का गलत इस्तेमाल, उसकी बर्बादी हर हाल में जारी है. भारत में इस समय दुनिया की आबादी का छठां हिस्सा रहता है लेकिन हमारे हिस्से जो जमीनी पानी आता है वो मात्र 2.4 % है, और जिसकी वैश्विक गिरावट 4% है.

इन सबके बावजूद भारत में पानी दुर्लभ चीज नहीं है. भारत में बहने वाली मुख्य नदियों के अलावा, हमें सालाना औसत तौर पर 1170 एमएल बारिश का पानी मिल जाता है, इसके अलावा रिन्यूबल वॉटर रिजर्व से भी हमें सालाना 1608 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी हर साल मिल जाता है. जिस तरह का मजबूत बैकअप हमें मिला हुआ है और दुनिया का जो नौवां सबसे बड़ा फ्रेश वॉटर रिजर्व हमारे पास है, उसके बाद भारत में व्याप्त पानी की समस्या, एक तरह से पानी के संरक्षण को लेकर हमारे कुप्रबंध को दर्शाती है न कि पानी की कमी को. देश के ज्यादातर हिस्से को अपनी जरूरत से ज्यादा पानी बारिश से मिल ही जाता है. इनमें से कई इलाके ऐसे हैं जहां बाढ़ का खतरा बना रहता है, वही इलाके कुछ महीनों बाद सूखे का प्रकोप झेलने लग जाते हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर

सरदार सरोवर बांध की तस्वीर

भारत की एक के बाद एक आई सरकारों ने बारिश के बाद के दिनों में पानी की होने वाली कमी से निपटने के लिए पानी के संरक्षण पर जरा भी ध्यान नहीं दिया है. देश में 4,525 से भी ज्यादा बड़े और छोटे डैम बनाए जाने के बावजूद, देश ने अब तक प्रत्येक व्यक्ति के दर से सिर्फ 213 क्यूबिक मीटर पानी का स्टोरेज ही बना पाई है. जो कि रूस के 6,103 क्यूबिक मीटर, ऑस्ट्रेलिया के 4,733 मीटर और चीन के 1,111 क्यूबिक मीटर के मुकाबले काफी कम है.

वॉटर हार्वेस्टिंग और मैनेजमेंट बहुत जरूरी है लेकिन इसके बावजूद इसपर काफी कम ध्यान दिया जाता है. बहुत सारे इलाके जहां बाढ़ की समस्या होती है उन्हीं इलाकों में महीनों तक सूखे की समस्या बनी रहती है. इसके नतीजा ये होता है कि देश का आधे से हिस्सा या यूं कहें कि आबादी पानी में पानी की समस्या से जूझता रहता है. हमारे देश की कुल आबादी इस समय 1.2 अरब है, जिसमें से 742 मिलियन कृषि बहुल क्षेत्र में न सिर्फ रहते हैं बल्कि खेती-बाड़ी और कृषि के व्यवसाय का काम करते हैं. इन कृषि क्षेत्रों के प्राकृतिक पानी के स्रोत की 68% भरपाई या उन्हें दोबारा भरने का काम बारिश के पानी से हो जाता है, बाकी का काम अन्य संसाधन जैसे नहर का पानी, सिंचाई में इस्तेमाल हुआ पानी, टैंकों से होने वाला रिचार्ज, तालाब और जल संरक्षण के अन्य संसाधनों से पूरा हो जाता है. इसका प्रतिशत तकरीबन 32% होता है.

औसत इंडियन को 2025 तक हर साल 814 क्यूबिक मीटर पानी मिलेगा

एशियन बैंक डेवेलपमेंट बैंक ने भविष्यवाणी की है कि साल 2030 तक भारत में मौजूदा समय उपलब्ध पानी का प्रतिशत 50% तक कम हो जाएगा. केंद्र सरकार के अनुमान के अनुसार इस समय भारत की पानी की जरूरत तकरीबन 1100 बिलियन क्यूबिक मीटर हर साल है, जो साल 2025 में बढ़कर 1200 बिलियन क्यूबिक मीटर हो जाएगी, और 2050 आते-आते ये आंकड़ा 1447 बिलियन तक पहुंच जाएगा.

1951 में प्रत्येक साल एक औसत भारतीय के हिस्से में 5200 क्यूबिक मीटर पानी आता था, उस समय भारत की आबादी 35 मिलियन हुआ करती थी. 2010 आते-आते सालाना उपलब्ध पानी की मात्रा घटकर 1600 क्यूबिक मीटर हो गई. पानी के इस लेवल को अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के स्टैंडर्ड के हिसाब से ‘वॉटर स्ट्रेस्ड’ यानि पानी के दबाव वाला या चिंताजनक माना जाता है. आज ये घटकर 1400 क्यूबिक मीटर हो गया है. विशेषज्ञों के अनुसार अगले दो-तीन दशकों में पानी की कमी का ये आंकड़ा घटकर 1000 क्यूबिक मीटर से भी नीचे जा सकता है.

भारत की नदियां लगातार सूख रही हैं और ये भारत की गंभीर होती पानी की समस्या की ओर इशारा कर रही हैं. नेश्नल इंस्टीट्यूट ऑफ हाईड्रोलॉजी की हिसाब से उनके यहां जो पानी है उनमें से ज्यादातर मनुष्यों के पीने लायक नहीं है. उनके मुताबिक इस समय प्रत्येक व्यक्ति को जो पानी उपलब्ध है उसमें से मात्र 938 क्यूबिक मीटर पानी ही इस्तेमाल योग्य है. और ये आंकड़ा आने वाले दिनों में घटेगा ही, जो साल 2025 तक आते-आते 814 क्यूबिक मीटर हो जाएगा.

भारत उन टॉप 38% देशों की लिस्ट में शामिल है जो क्लाइमेट चेंज की स्थिति में सबसे ज्यादा संवेदनशील साबित होंगे, यानि क्लाइमेट चेंज का सबसे ज्यादा नुकसान हमें उठाना पड़ सकता है, क्योंकि वो क्लाइमेट चेंज की समस्या को झेलने में समर्थ नहीं है. ये मानना है नॉटरे डेम ग्लोबल एडाप्टेशन इंडेक्स का. उनके मुताबिक ये हो सकता है कि भविष्य में भारत के गांवों में रहने वाले लोग, जिनकी आजीविका किसानी और खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं, उन्हें बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है.

Farmers

उन्हें अपना और अपने पालतू पशुओं का पेट भरने में दिक्कत का सामना करना पड़ेगा क्योंकि ऐसा करने के लिए वे पर्याप्त अनाज उगा नहीं पाएंगे. इसकी वजह क्लाइमेट चेंज के कारण लगातार बढ़ता तापमान होगा. इसके अलावा- गांव-देहात की उन महिलाओं को खासा दिक्कत का सामना करना पड़ सकता है, जिन्हें पानी लाने के लिए दूर- दूर तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है. उन्हें तपती गर्मी में और पीने का पानी लाने के लिए मुमकिन है पैदल और लंबी यात्रा करनी पड़े.

कहां निकाला जाता है सबसे ज्यादा भूजल

पिछले तीन दशकों में प्राइवेट ट्यूबवेल की संख्या में अचानक से काफी वृद्धि हुई है, ऐसा होने की वजह भरोसे लायक भूमि-सिंचाई की व्यवस्था या साधन न होने के कारण हुआ है. कुछ सूखाग्रस्त राज्यों में किसानों को तो अब पानी के लिए 300-300 फीट (91 मीटर) जितनी खुदाई भी करनी पड़ रही है, जो साल 1961 में पांच फीट यानि 1.5 मीटर हुआ करती थी. वे लोग कुंआ खोदने के लिए जुते हुए खेतों की भी 700-800 फीट नीचे तक के ज्वालमुखी समान चट्टानों की गहराई तक ड्रिलिंग कर रहे हैं- कभी-कभी ये 900 फीट तक भी चला जाता है.

भारत हर साल 230-250 क्यूबिक किलोमीटर भूजल का निष्कर्षण करता है, जो पूरी दुनिया में निकाले जा रहे भूजल का एक तिहाई है. जो किसान इस भूजल का इस्तेमाल खेती के लिए करते हैं वो जमीन के ऊपर के पानी की तुलना में दोगुना अनाज पैदा करते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि भूजल किसानों को अपनी सुविधा के अनुसार खेती करने की अनुमति देता है.

1960-70 के दशक में भारत भूजल का सबसे बड़ा निष्कर्षक नहीं था. लेकिन हरित-क्रांति ने सबकुछ बदल दिया. आजादी के दौरान भारत के कृषि में भूजल का 35% हिस्सा इस्तेमाल होता था, आज ये 70% तक पहुंच गया है. आज कृषि क्षेत्र निकाले गए भूजल का 90% पानी ले लेता है लेकिन देश की जीडीपी में उसका योगदान मात्र 15% है. अगर हम दूसरे मीटर पर भी मापें तो पाएंगे कि भारत में निकाला गया 89% भूजल का इस्तेमाल कृषि क्षेत्र में होता है, घर के कामकाज में 9% और उद्योगों में 2%.

भारत में बिना आगे का सोचे, तात्कालिक फायदे के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले कृषि उपाय भी पानी की इस कमी के लिए जिम्मेदार हैं. इसका खामियाज़ा कुछ प्रदेशों को पानी की कमी से भुगतना पड़ रहा है, और पूरे देश का जल-संतुलन बिगड़ रहा है. ये राज्य हैं पंजाब, महाराष्ट्र और हरियाणा. आसान मुनाफे के लिए यहां के युवा किसानों की कृषि संबंधी प्राथमिकताएं बदल गईं हैं, जिससे हालात और खराब हो गए हैं. महाराष्ट्र के जो किसान पहले बाजरा, ज्वार और धान उगाया करते थे वे अब गन्ना उगाने लगे हैं. गन्ना भले ही उन्हें ज्यादा पैसे कमा कर देता है लेकिन वो बहुत ज्यादा पानी सोख़ता है. उसी तरह से पंजाब और हरियाणा के किसान चावल और गेहूं उगाने लगे हैं, जबकि उनके यहां का भूजल पहले ही काफी नीचे जा चुका है और खेत सूख चुके हैं.

भारत में महाराष्ट्र कृषि संबंधी तकलीफों का केंद्र है और उससे जुड़ा मराठवाड़ा इलाका बहुत ही दयनीय स्थिति में है. सरकारी अनुदान के लालच में जो किसान इन इलाकों में पलायन करके आए थे, उन्होंने यहां गन्ना उगाना शुरू कर दिया जो कि अपनी उपज के लिए बहुत ज्यादा पानी सोखता है, लेकिन वो मराठवाड़ा के अर्धशुष्क मौसम के अनुकूल नहीं है.

एक हेक्टेयर में लगा गन्ने का फसल 14 महीने में 22.5 मिलियन लीटर पानी मांगता है (गन्ना का फसल 14 महीने में तैयार होता है), जबकि चार महीने में तैयार होने वाला मटर का फसल सिर्फ 4 मिलियन लीटर पानी की खपत मांगता है. इलाके में डैम की मदद से जितने खेतों की जुताई की जा सकती है, उसका सिर्फ 38% हो पा रहा है, जबकि पूरे महाराष्ट्र में ये प्रतिशत 76 है. मराठवाड़ा इलाके में प्रत्येक व्यक्ति को होने वाली कमाई बाकी महाराष्ट्र से 40% कम है.

जिन इलाकों में पहले से सूखे की आशंका हो, अगर वहां गन्ने की खेती की जाए तो महामारी तय है. लेकिन, पैसे की लालच में किसान गन्ने की खेती ही करना चाहते हैं. राज्य में 1970-71 के दौरान 167,000 हेक्टेयर भूमि पर गन्ने की खेती होती थी, साल 2002-04 में ये आंकड़ा बढ़कर 300,000 और साल 2011-12 में ये आंकड़ा 1,022,000 हेक्टेयर हो गया, और इलाके की 70% सिंचाई का पानी इसके हिस्से में जाने लग गया.

दुख की बात ये है कि मराठवाड़ा में राज्य का मात्र 4 प्रतिशत कृषि क्षेत्र है. महाराष्ट्र भारत का दूसरा सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक है, जबकि वो देश के सूखाग्रस्त राज्यों में से एक है. कुछ ऐसी ही कहानी पंजाब और हरियाणा की है, लेकिन यहां गन्ने की जगह चावल ने ले रखी है. पंजाब की 62% कृषि भूमि को चावल या धान की फसल ने घेर रखा है, जो 1970 में सिर्फ 10% था. पड़ोसी राज्य हरियाणा की भी धान की फसल को लेकर यही कहानी है. हालांकि, सूखे का असर लगभग भारत में उपजाए जाने वाली हर फसल पर पड़ा है लेकिन इसके बाद भी हमारे देश में चावल, गेहूं और चीन की पैदावार हमारी खपत से ज्यादा होती है.

farmer representational image

प्रतीकात्मक तस्वीर

सरकार अब किसानों से धान के बजाए ऑयल-सीड्स यानि तेल निकाले जाने वाले अनाज और दालों की खेती करने को कह रही है लेकिन उनकी मदद के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है. इसके अलावा राजनीतिक वर्ग को फायदा पहुंचाने के लिए, सरकार उन्हें या तो मुफ्त में या छूट सहित अनुचित ताकत भी दे देती है. जबकि, 23 किस्म की फसल पर एमएसपी यानि मिनिमम सपोर्ट प्राइस की घोषणा की जा चुकी है. इसमें सबसे कारगर गन्ना, गेहूं और चावल है. इससे ज्यादा पानी सोखने वाली इन फसलों को ऊंचा मुनाफा मिलने में सहूलियत होती है.

भारत में पानी संरक्षण का ज्यादातर काम पारंपरिक स्तर पर ही होता है, जो आमतौर पर विविध और कल्पनाशील कटाई, सिंचाई, संरक्षण और बारिश व नहर के पानी का कारगर इस्तेमाल पर ही निर्भर है. ये आमतौर पर सामुदायिक स्तर पर होता है. लेकिन, सुधार और संशोधन के नाम पर इन पारंपरिक तरीकों को छोड़ दिया गया. ऐसा करने के पीछे कहीं न कहीं वो सोच थी जो बाहरी ज्ञान को पारंपरिक समझदारी से बेहतर या श्रेष्ठ मानती थी. जबकि आज भी वे पारंपरिक तरीके न सिर्फ साध्य हैं बल्कि भूजल को दोबारा भरने का सस्ता और सुलभ तरीका भी है.

सरकारी मदद से उन पारंपरिक तरीकों को न सिर्फ दोबारा जीवित किया सकता है बल्कि उन्हें आधुनिक तकनीक से लैस कर बेहतर और ज्यादा कारगर भी बनाया जा सकता है. भारत को इस समय जितना बारिश का पानी मिलता है वो इसका सिर्फ  35 ही इस्तेमाल कर रहा है. ऐसे में अगर हम रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग यानि बारिश के पानी का संरक्षण करें तो बर्बाद हो रहे वर्षा जल का इस्तेमाल खेती के लिए कर सकते हैं.

इजरायल ने कई दशक पहले इस स्थिति को भांप लिया था, तब उन्होंने ‘वॉटर इक्वेशन’ पर काफी शोध किया और कई क्रांतिकारी और नए तरीकों को अपनाकर खुद को आत्मनिर्भर बनाया. ऐसा करके वे सिर्फ प्रकृति की दया पर निर्भर नहीं रहे. ऐसा कर पाने में इजरायल को 70 साल लग गए, भारत को उतना वक्त नहीं लगेगा, क्योंकि वो आसानी से इजरायल के नुस्खों को अपने यहां लागू कर सकता है.

ऐसा करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है. पानी खत्म होने से पहले. सरकारी कामकाज के तरीकों में बदलाव लाकर, धन जुटाकर और नई युक्तियों को अमलीजामा पहनाकर इसे हासिल किया जा सकता है. जरूरत सिर्फ इन कोशिशों को समय देने की है- क्योंकि पर्यावरण बहुत तेजी से बदल रहा है और अब समय आ गया है कि हम कोई कदम उठाएं.

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