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विभाजन न होता तो ‘मुगले-आज़म’ न बनती...

15 वर्षों की मेहनत के बाद 5 अगस्त 1960 को ये फिल्म पूरे हिंदुस्तान में रिलीज हुई

Updated On: Aug 05, 2017 12:25 PM IST

Nazim Naqvi

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विभाजन न होता तो ‘मुगले-आज़म’ न बनती...

भारत का विभाजन और दुनिया के नक्शे पर पकिस्तान जैसे एक नए देश का उदय, एक ऐसी इंसानी त्रासदी थी जिसे दर्द की कलम और आंसुओं की स्याही से लिखा गया. कागज के पन्ने पर बने नक्शे पर पेंसिल से खींची गई निर्ममता की एक लकीर ने, अचानक, करोड़ों लोगों को अपनी मातृभूमि से जुदा कर दिया, सरहद के दोनों तरफ, करीब 10 लाख लोगों को अपने खून से इस विभाजन की गवाही देनी पड़ी.

लेकिन क्या पता था कि यही इंसानी त्रासदी ‘अनारकली’ की तकदीर में एक ऐसी मिसाल बन जाएगी जो इतिहास रच देगी. जी हां, ये सच है कि अगर विभाजन न होता तो हिंदुस्तान को एक ऐसी फिल्म न मिलती जिसपर आज भी करोड़ो भारतीयों को नाज है.

यूं आया फिल्म का बनाने का खयाल

आज 70 बरस के बाद भी उस जैसी फिल्म कोई नहीं बना सका जिसे लोग ‘मुगले-आज़म’ के नाम से जानते हैं. चूंकि फिल्म को इतिहास रचना था इसलिए इसका निर्माण (मेकिंग) भी किसी इतिहास से कम नहीं. ये बात है 1943-44 की. हुआ यूं कि इम्तियाज अली ‘ताज’ ने 1920 में एक ड्रामा ‘अनारकली’ के नाम से लिखा. जब बंबई में इसका मंचन हुआ तो के.आसिफ को इसने बड़ा प्रभावित किया.

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के. आसिफ ने इम्तियाज अली ताज से मुलाकात की और उन से कहा कि मैं इस ड्रामे पर फिल्म बनाना चाहता हूं. उस जमाने में ‘अमौस सिने लेबोरेट्रीज’ के मालिक सेठ शिराज़ अली हाकिम, फिल्म के निर्माण के लिए तैयार हो गए. फिल्म का नाम ‘अनारकली’ रखा गया.

के.आसिफ ने शहजादा सलीम के किरदार के लिए अदाकार सप्रू को, अनारकली के लिए नर्गिस को, अकबर बादशाह के लिए चंदर मोहन और जोधा बाई के किरदार के लिए दुर्गा खोटे का इंतेखाब किया. ये सारा काम 1944 से 1947 तक होता रहा. कुछ फिल्म (लगभग 10 रील) बन भी चुकी थी लेकिन चंदर मोहन की मृत्यु और विभाजन के बाद शिराज़ अली हाकिम के पकिस्तान चले जाने पर फिल्म का काम खत्म हो गया.

अनारकली से मुगले-आज़म

इस बीच के. आसिफ की एक फिल्म ‘हलचल’ (1951) की रिलीज के बाद के.आसिफ ने अपनी बंद पड़ी अनारकली पर फिर काम करने के लिए कमर बांधी. इस बार इसका नाम अनारकली के बजाय ‘मुगले-आज़म’ रखा.

चंदर मोहन दुनिया से जा चुके थे इसलिए अब अकबर के रोल के लिए पृथ्वीराज कपूर और शहजादा सलीम के लिए दिलीप कुमार को कास्ट कर लिया. इसके साथ ही शकील बदायूंनी और नौशाद का चुनाव भी हो गया. कहानी लिखने की जिम्मेदारी वजाहत मिर्ज़ा को सौंपी गई डायलॉग लिखने के लिए उनके साथ अहसान रिज़वी अमान (जीनत अमान के पिता) को ले लिया गया. फिल्म के शुरू की कमेंट्री 'मैं हिंदुस्तान हूं...' भी अमान की आवाज में है.

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लेकिन हिरोइन के नाम पर कहानी में एक मोड़ आ गया. इसे जानने के लिए आइए एक किताब के पन्ने पलटते हैं. टी.जे.एस. जॉर्ज ने ‘दस्ताने-नर्गिस’ में लिखा है कि राजकपूर ने फिल्म ‘अंदाज़’ के बाद नर्गिस को दिलीप कुमार के साथ काम करने से रोकने की हर संभव कोशिश की और कामयाब भी रहे.

मधुबाला ऐसे बनी अनारकली

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फिल्म ‘मुगले-आज़म’ की दस रीलें तैयार हो चुकी थीं. के. आसिफ नर्गिस को ही अनारकली के रोल में रखना चाहते थे लेकिन राजकपूर बीच में कूद पड़े और नर्गिस को फिल्म की कास्ट से बहार निकालने में कामयाब हो गए. जॉर्ज के मुताबिक, राजकपूर किसी दूसरे के साथ नर्गिस के रोमांस के सीन बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. नर्गिस को भी इसका अंदाजा था क्योंकि नर्गिस ने अपने एक इंटरव्यू में बताया कि मि. राजकपूर को मेरा किसी और के साथ तेजी के साथ मकबूल होने वाली जोड़ी बनाने का खयाल पसंद नहीं था.

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कहा तो ये भी जाता है कि दिलीप कुमार ‘गंगा-जमना’ में नर्गिस को लेना चाहते थे. लेकिन ऐसा न हो सका. मुगले-आज़म के नए निर्माता शापूर जी पलूंजी ने ‘मुगले-आज़म’ पर पानी की तरह दौलत बहाई, मोहन स्टूडियो में शानदार सेट लगाये गए. मुगल दौर को दर्शाने वाली सारी चीजें इकठ्ठा कर दी गईं.

अनारकली के लिए मधुबाला को चुन लिया गया. और आखिरकार 15 वर्षों की मेहनत के बाद 5 अगस्त 1960 को ये फिल्म पूरे हिंदुस्तान में रिलीज हुई और हिन्दुस्तान की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म साबित हुई.

फिल्म के डायलॉग 'ये जख्म नहीं फूल हैं दुर्जन... और फूलों का मुरझाना बहार की रुसवाई है' या फिर 'ये वो तलवार है जिसने बड़े-बड़े शहंशाहों के गुरुर को तोड़ा है... ये मुहाफिज (रक्षक) आज भी अनारकली और उन तमाम मोहब्बत करने वालों की जिन्हें एक तंग-दिल शहंशाह की गुलामी मंजूर नहीं...' और गीतों ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी.

सिर चढ़कर बोला फिल्म का जादू

मुगले-आज़म ब्लैक एंड वाइट फिल्म थी लेकिन ‘प्यार किया तो डरना क्या’ और ‘जब रात है ऐसी मतवाली’ ये दोनों गाने रंगीन फिल्माए गए. फिल्म का आखिरी सीन भी रंगीन रखा गया था.

फिल्म इतनी बड़ी हिट होगी इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था. देश के कई सिनेमाघरों में ये फिल्म लगातार कई वर्षों तक चलती रही. अखबारों में फिल्म को लेकर दर्शकों के दिलचस्प इंटरव्यू भी छपते थे. कोई कहता कि मैंने फिल्म सौ बार देखी है तो कोई कहता था दो सौ बार देखी है.

फिल्म की रिलीज के छ: महीने बाद इसमें दो गाने और बढ़ाए गए (उस जमाने में भी पैसा कमाने के नए-नए तरीके खोज ही लिए जाते थे) 'हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती' (लता) और 'ये सब दुनियावाले बेकार की बातें करते हैं' (लता) गानों को फिल्म में जोड़ा गया और इस तरह फिल्म 25 रीलों तक पहुंच गई.

दो गानों को जोड़ने का नतीजा ये हुआ कि ‘मुगले-आज़म’ के दीवानों ने इसे फिर दो-दो और चार-चार बार देखा. 2004 में (रिलीज के 44 साल बाद) कंप्यूटर के जरिए पूरी फिल्म को रंगीन करके एक बार फिर रिलीज किया गया और उसी तरह लोगों ने उसे टूटकर देखा.

अकबर के रोल में पृथ्वीराज कपूर की अदाकारी का जादू तो यहां तक पहुंच गया कि लोगों की कल्पना में अकबर का चेहरा पृथ्वीराज कपूर का चेहरा बन गया. 1960 के लिए बेहतरीन फिल्म का फिल्म फेयर अवार्ड मुगले-आज़म को मिला लेकिन के. आसिफ ने ये अवार्ड नहीं लिया उनका कहना था कि जब ये बेहतरीन फिल्म है तो हर अवार्ड ‘मुगले-आज़म’ को मिलना चाहिए था.

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मुगले आज़म को फिल्म फेयर ने दो अवार्ड और दिए. बेहतरीन फोटोग्राफी के लिए आर.डी. माथुर को और बेहतरीन डायलॉग के लिए वजाहत मिर्ज़ा को, मधुबाला को अवार्ड न मिलना अभी तक लोगों को हैरत में डाल देता है.

के. आसिफ की मुगले-आज़म दिलीप कुमार और मधुबाला की एक साथ आखिरी फिल्म थी. इस फिल्म में मधुबाला ने अमर हो जाने वाला अनारकली का किरदार किया और अपनी अदायगी से पूरी फिल्म को बांधे रखा. मुगल दरबार की बदकिस्मत रक्कासा के इस किरदार को उन्होंने बड़ी खूबसूरती से निभाया.

लोगों की राय है कि शायद ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि इस रक्कासा की जिंदगी की बहुत सी मुश्किलें खुद मधुबाला की जिंदगी से मिलती-जुलती थीं. यकीनन मधुबाला अपने इसी किरदार से आज तक हिंदुस्तान के दिल पर राज करती है.

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