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आजाद भारत की पहली किरण के साथ गूंजी थी उस्ताद की शहनाई

उस्ताद ने लाल किले पर रघुपति राघव राजा राम को राग भैरवी में बजाया.

Tabassum Kausar Updated On: Aug 15, 2017 01:03 PM IST

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आजाद भारत की पहली किरण के साथ गूंजी थी उस्ताद की शहनाई

आजाद हवा की तासीर उस दिन बदली-बदली सी थी. सब कुछ पहले जैसा था, वही लाल किला, वही सड़कें, लेकिन लोग गुलामी की बेड़ियों से आजाद थे. आजाद हिंद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू लाल किले पर भाषण देने वाले थे. उनका काफिला लाल किले की तरफ बढ़ रहा था और सबसे आगे-आगे चल रहा था काशी का एक नौजवान. हाथ में शहनाई थामे हुए. और फिर शहनाई से राग भैरवी निकली, धुन थी रघुपति राघव राजा राम... यह और कोई नहीं, काशी के गौरव, शहनाई सम्राट 'भारत रत्न' उस्ताद बिस्मिल्ला खां थे.

वही बिस्मिल्लाह खां जिनके लिए शहनाई महज वाद्ययंत्र नहीं, रूह थी. यह उनकी आत्मा से निकली राग भैरवी ही थी जिसे पूरा देश कई साल तक स्वतंत्रता दिवस पर टीवी और रेडियो पर सुनता रहा.

खुद जवाहर लाल ने दिया था शहनाई बजाने का न्योता

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले के मंच पर शहनाई बजाने का न्योता दिया था. आजादी की तारीख तय हो गई थी और पंडित नेहरू को पहला प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा भी हो गई थी. 15 अगस्त को पंडित जी का लाल किले से भाषण होना था. खुद पंडित जी ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को दिल्ली आने का न्योता दिया था. उन्होंने उस्ताद से कहा था, आपकी शहनाई की धुन से आजाद भारत का आगाज हो, इससे शुभ और कुछ हो ही नहीं सकता. फिर क्या दिल्ली के लाल किले पर आजादी की उस बेला का साक्षी कौन नहीं बनना चाहता. उस्ताद भी वक़्त से दिल्ली पहुंच गए.

Ustad Bismillah Khan

उस्ताद की आत्मा थी रघुपति राघव राजा राम धुन

वैसे तो बिस्मिल्लाह खां कई रागों के माहिर थे, लेकिन शहनाई मानो उनके मन को पढ़कर खुद ही बजने लगती थी. पर जब लाल किले पर शहनाई बजाने की बात चली तो उस्ताद ने रघुपति राघव राजा राम को राग भैरवी में बजाने का फैसला किया. वो इसलिए कि बिस्मिल्ला खां बापू से बहुत प्रभावित थे. उस्ताद के बेटे नाज़िम हुसैन ने अपने अब्बा से ही सुनी उस वक्त की यादों को साझा करते हुए बताया कि 15 अगस्त को अब्बा लाल किले की हद से लेकर बहादुर शाह जफ़र के मकबरे तक गांधी के प्रिय भजन 'रघुपति राघव की' धुन शहनाई पर बजाते हुए चल रहे थे, वहीं उनके पीछे-पीछे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और तमाम दिग्गज नेता. इसके बाद लाल किले में बहादुर शाह जफ़र के मकबरे के पास बने मंच पर उनका कार्यक्रम हुआ. यहां पर उन्होंने राग तोड़ी और राग काफी बजाया जिसे आजाद भारत ने सुना था.

26 जनवरी, 1950 को भी उस्ताद ने शहनाई बजाई

उस्ताद की शहनाई से रसधुन 26 अगस्त, 1950 को भी निकली थी जिस दिन देश का संविधान लागू हुआ था. उस दिन शहनाई बजाने के लिए उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खास तौर पर न्योता दिया था.

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बेटे नाजिम हुसैन बताते हैं कि यह पहली बार नहीं था जब पंडित जी के स्नेह निमंत्रण पर उस्ताद तुरंत दिल्ली चल पड़े थे. पहले भी कई मौकों पर अचानक ही पंडित जी का संदेश आ जाता था. उस्ताद ने कभी उनको निराश नहीं किया.

नाजिम याद करते हैं कि एक बार तो अब्बा कहीं से घर आए ही थे कि तभी पंडित नेहरू का संदेश आ गया, तुरंत आ जाओ. उस्ताद ने शहनाई संभाली, निकल पड़े अपनी साधना पर. कभी शहनाई के प्रति उनकी इस इबादत में कमी नहीं आई. कहते हैं कि बीमारी के समय भी शहनाई हमेशा उनके पास ही रहती थी.

Jawahar Lal Nehru

पंडित जवाहरलाल नेहरू

सोने-चांदी नहीं शहनाई में ही देखा सुख

आजादी की 70वीं वर्षगांठ पर एक बार फिर हड़हा सराय के उस पुराने घर में पुरानी बातों का दौर चलने लगा है. उस्ताद की बेटी ज़रीना बताती हैं अब्बा अपनी मर्जी के रहे ताउम्र. कभी शहनाई को कमाई का जरिया नहीं माना, बल्कि साधना समझा. यही वजह थी कि जब किसी समारोह में शहनाई बजाने का न्योता आता था, उस्ताद रुपए की बात ही नहीं करते थे.

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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के लिए शहनाई ही सबसे बड़ा सुख था, जो उन्हें सोने-चांदी में नहीं मिलता था. एक बार काशी के एक बड़े रसूखदार परिवार में वह शादी समारोह में शहनाई बजाने गए थे. पूरी महफिल उनके साज की कायल हो उठी. शहनाई हटाई तो उस परिवार ने उनको डेढ़ लाख रुपए दिया. उस्ताद ने जिस बेटी की शादी थी, उसे बुलाया और पूरे रुपए उसे उपहार में दे दिया. ऐसे थे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां. वह काशी और पूरे देश के अनमोल रत्न हैं, जिनकी शहनाई अमर है. यही वजह रही कि उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान के साथ सरकार ने उन्हें न जाने कितने सम्मान से नवाजा.

उस्ताद के साथ चली गई शहनाई की आवाज

हड़हा सराय के जिस घर में भोर की पहली किरण और रात की पहली चांदनी शहनाई के संग आती-जाती थी, वहां आज यह खामोश है. उस्ताद के बाद अब इस घर में कोई शहनाई नहीं बजाता. उनके बड़े बेटे ने जरूर पिता की इस विरासत को आगे बढ़ाया. लेकिन उस्ताद तो उस्ताद ही थे जो सदियों-युगों में एक बार ही कोई आता है. शहनाई 21 मार्च, 1916 को उनके जन्म से पहले भी थी और उनके दुनिया से रुखसत होने के बाद भी है, लेकिन वह कशिश कहीं खो सी गई है.

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उस्ताद बालाजी घाट पर शहनाई का रियाज करते तो उनके साथ के कई लोग खफा हो गए थे. उनके समाज में ही विरोध के स्वर उठने लगे थे लेकिन उस्ताद ने कभी इसकी परवाह नहीं की. वह कहते थे, तुम मस्जिद में इबादत करते हो, मैं इस शहनाई के साथ.

मणिकर्णिका घाट

वाराणसी शहर में गंगा किनारे के घाट का नजारा (फोटो : रॉयटर्स)

वीरान पड़ा है घर, म्यूजियम भी नहीं बन पाई

बेनिया से लेकर हड़हा सराय की तंग गलियां आपको सोचने को मजबूर करेंगी कि यही राह आपको उस उस्ताद के वीराने घर तक ले जाएंगी, जिन्हें कभी अमेरिका में रहने का निमंत्रण मिला था, और उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि अमेरिका में उन्हें मां गंगा की निर्मल धारा लेकर दे दें तो वो खुशी-खुशी वहां रहने को तैयार हो जाएंगे. ये तो उन्हें भी मालूम था कि ये नामुमकिन है.

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आज वो घर वीरान पड़ा है, जहां कभी न जाने कितने ही बड़े नेताओं, कलाकारों का जमावड़ा हुआ करता था. आज तो बस उस्ताद के कमरे में लगीं तस्वीरें ही उनके इस घर के होने का एहसास कराती हैं, शहनाई की धुन नहीं. अब तो उनके खानदान और बेटों में भी खींचतान हो गई है. पिछले दिनों उस्ताद की शहनाई चोरी हो गई, बाद में बात सामने आई कि उन्हीं के खानदान में से ही किसी ने शहनाई छिपाई थी, इससे उनके खानदान की बड़ी रुसवाई हुई.

सरकार ने भी उस्ताद से बड़ी बेरुखी दिखाई. कई साल तक उनकी कब्र को मकबरे का रूप नहीं दिया जा सका था, हालांकि अब यह काम पूरा हो रहा है. मुलायम सिंह की सरकार ने उस्ताद बिसमिल्ला खां के नाम से म्यूजियम बनाने की बात कही थी, जो आज तक नहीं बन पाया है.

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