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22 अगस्त: इस तारीख से होकर गुजरता है इंदिरा की सत्ता-वापसी का रास्ता

इसी तारीख को 1979 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने छठवीं लोकसभा को भंग करके सातवीं लोकसभा के लिए चुनाव कराए जाने का ऐलान किया था

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Aug 22, 2017 08:31 AM IST

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22 अगस्त: इस तारीख से होकर गुजरता है इंदिरा की सत्ता-वापसी का रास्ता

22 अगस्त की तारीख इतिहास में खास स्थान रखती है. इसी तारीख को 1979 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने छठवीं लोकसभा को भंग करके सातवीं लोकसभा के लिए चुनाव कराए जाने का ऐलान किया था. यह आजाद भारत में दूसरी बार मध्यावधि चुनावों की घोषणा थी.

इससे पहले इंदिरा गांधी ने भी दिसंबर 1970 में मध्यावधि चुनावों की सिफारिश की थी लेकिन तब उन्हें और उनकी सरकार को वामदलों का बाहर से समर्थन प्राप्त था. उनकी सरकार बहुमत के अभाव में गिरी नहीं थी. बस उन्हें वामदलों के समर्थन की वैशाखी पसंद नहीं थी और वे किसी के दवाब में सरकार नहीं चलाना चाहती थीं.

1971 में हुए मध्यावधि चुनावों का फायदा इंदिरा गांधी को मिला था और 1980 में हुए चुनावों का भी. दोनों बार इंदिरा गांधी ने अपने विरोधियों को पस्त किया और प्रचंड बहुमत से सत्ता में वापसी की थी. सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने दोनों बार अपने धुर विरोधियों खासकर मोरारजी देसाई को राजनीतिक रूप से मात दी.

इस वजह से हुआ था देश में पहला मध्यावधि चुनाव

इंदिरा गांधी को 1971 में मध्यावधि चुनाव इस वजह से करवाना पड़ा था क्योंकि मोरारजी देसाई समेत कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने उनका नेतृत्व मानने से इनकार कर दिया था. कांग्रेस पार्टी में टूट हो गई थी. यह टूट 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनावों में साफ-साफ दिखाई दी थी. जब इंदिरा गांधी ने वीवी गिरी का समर्थन किया था और कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी थे.

वीवी गिरि

वीवी गिरि

इंदिरा गांधी के समर्थन से वीवी गिरि राष्ट्रपति चुनाव में जीत गए और कांग्रेस पार्टी टूट गई. इंदिरा गांधी के लिए यह मुश्किल वक्त था. संसद में उनके गुट के पास पूर्ण बहुमत नहीं और वामदलों के सहारे सरकार चल रही थी.

इंदिरा गांधी ने ऐसे मुश्किल वक्त में मध्यावधि चुनाव का रास्ता अपनाया और ‘इंदिरा हटाओ’ के नारे के खिलाफ ‘गरीबी हटाओ’ का नारा बुलंद करते हुए प्रचंड बहुमत से सत्ता पर काबिज हुईं. इंदिरा की इस जीत से उनके विरोधी सकते में थे. 1971 के भारत-पाक के बीच हुए बंगलादेश युद्ध में हुई जीत ने इंदिरा गांधी को और भी शक्तिशाली बनाया.

जब कायम हुई 'जनता सरकार'

इंदिरा गांधी को यह लगने लगा कि अब उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता. वे विपक्ष को कुचलने में लग गईं. इसी बीच 1975 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी लोकसभा में हुई जीत को अवैध करार दिया. विपक्षी दलों ने इंदिरा से इस्तीफे की मांग की लेकिन इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर अपने विरोधियों को जेल में डाल दिया. इस तानाशाही के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश में आंदोलन खड़ा हो गया.

Morarji Desai

मोरारजी देसाई

राजनीतिक दलों के बीच भी इंदिरा विरोध के नाम पर एकता कायम हुई और जनता पार्टी का गठन हुआ. इसमें समाजवादी धड़े की पार्टियों के साथ-साथ इंदिरा गांधी और कांग्रेस से अलग हुए बड़े-बड़े नेता जैसे मोरारजी देसाई और जगजीवनराम भी शामिल हुए. जनसंघ भी इस पार्टी में शामिल हुई.

1977 में हुए चुनावों में जनता पार्टी को भारी बहुमत मिला. इंदिरा गांधी अपने परंपरागत सीट इलाहाबाद से हार गईं. इस चुनाव के बाद कई लोगों ने इसे कांग्रेस और इंदिरा गांधी के राजनीतिक अंत के रूप में भी देखा.

जल्द ही टूट गया 'भानुमति का कुनबा'

लेकिन जनता पार्टी एक ऐसा ‘भानुमति का कुनबा’ था जिसमें अलग-अलग विचारधारा और महत्वाकांक्षा वाले नेताओं का जमावड़ा था. जल्दी ही इनके आपसी मतभेद सामने आने लगे. हर बड़े नेता का अपना-अपना गुट था. जेपी भी इस मतभेद को सुलझाने में असमर्थ थे.

‘जनता-सरकार’ के संकट का यह लम्हा अपनी पूरी नाटकीयता के साथ ‘फ्रॉम फार्म हाऊस टू राष्ट्रपति भवन’ नाम की किताब में इन शब्दों में दर्ज है- 'इसके पहले कि सदन में अविश्वास प्रस्ताव बहस और मतदान के लिए पेश हो, जनता संसदीय दल के एक घटक भारतीय लोकदल के नेता राजनरायण सत्तापक्ष की कुर्सी से उठकर दूसरी तरफ आ गये, स्पीकर हेगड़े (रामकृष्ण) से कहा कि हमें विपक्षी दल की तरफ बैठने के लिए अलग सीट दी जाए, हमलोग अब से जनता दल (सेक्युलर) कहलाएंगे. दिलचस्प बात यह हुई कि भारतीय लोकदल के प्रमुख चरण सिंह जनता-सरकार में उप-प्रधानमंत्री के रुप में बने रहे, उनके पास वित्त मंत्रालय भी था...’

'स्थिति अपने निरालेपन की हद लांघते जा रही थी आखिरकार मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, इसके बाद चरण सिंह जनता पार्टी छोड़कर जनता (सेक्युलर) में आ गए और लोकसभा में इसके नेता बन गए.'

सत्ता बदलाव और उतार-चढ़ाव से भरपूर इस पूरे घटनाक्रम का जिक्र फर्स्टपोस्ट में ‘हमारे राष्ट्रपति’ सीरिज के तहत नीलम संजीव रेड्डी पर छपे लेख में भी किया गया है.

चौधरी चरण सिंह के साथ चंद्रशेखर

चौधरी चरण सिंह के साथ चंद्रशेखर

बने कई रिकॉर्ड

बहरहाल इंदिरा गांधी ने पहले तो यह कहा कि उनकी पार्टी चौधरी चरण सिंह को समर्थन दे रही है लेकिन 1979 के अगस्त महीने में होने वाले विश्वास मत परीक्षण में इस वादे से मुकर गईं. लिहाजा किसी भी दल या नेता के पास प्रधानमंत्री बनने लायक समर्थन नहीं था.

ऐसे में तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने 22 अगस्त, 1979 को लोकसभा को भंग करके अगले लोकसभा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी. साथ ही नई सरकार के चुने जाने तक चौधरी चरण सिंह को कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम करने का निर्देश दिया.

बंटे हुए विपक्ष की वजह से इंदिरा गांधी को जनवरी, 1980 में हुए इस मध्यावधि चुनाव में भारी बहुमत मिला और कांग्रेस को कुल 351 सीटें मिलीं. इस तरह एक लंबे राजनीतिक उठापटक के दौर के बाद इंदिरा गांधी एक बार फिर से अपने राजनीतिक विरोधियों को मात देने में सफल हुईं.

इस राजनीतिक उठापटक के दौर में कई रिकॉर्ड भी बने. नीलम संजीव रेड्डी भारतीय इतिहास में निर्विरोध चुने जाने वाले पहले राष्ट्रपति बने. और चरण सिंह ऐसे प्रधानमंत्री बने जो प्रधानमंत्री रहते हुए कभी संसद नहीं गए.

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