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रोज़ा रखें न रखें इफ्तार के बारे में ज़रूर जान लीजिए

इफ्तार का मूल रूप तो एक ही है लेकिन सुविधा या सामाजिक सरोकारों के चलते कई बदलाव आ गए हैं

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Jun 09, 2018 11:28 AM IST

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रोज़ा रखें न रखें इफ्तार के बारे में ज़रूर जान लीजिए

आओ कि तुम्हें देखकर इफ्तार कर लें हम,

एक मुद्दत हुई है आंखों को रोज़ा रखे हुए.

सियासत में ज़रूरी है रवादारी समझता है वो,

रोज़ा तो नहीं रखता मगर इफ्तारी समझता है.

ये दो अलहदा मिजाज़ के शेर रोज़ा और इफ्तार की बात करते हैं लेकिन, इन दोनों में बहुत सी अलग-अलग बातें छिपी हैं. हर साल रमज़ान में इफ्तार से जुड़ी बहुत खबरें पढ़ने, देखने और सुनने में आती हैं. सियासत करने वालों की इफ्तार पार्टियों के अपने ज़ायके होते हैं. समाज के ऊंचे तबके के लोगों की इफ्तार की दावत में कौन आया और कौन गया के अलग मायने होते हैं. सिर्फ खजूर खाकर रोज़ा खोलने वाले वाले वर्किंग क्लास की अपनी कहानियां हैं और बिना रोज़ा रखे इफ्तार की दावतों में पहुंचने वालों की अपनी. मगर इफ्तार में बहुत कुछ है जो सिर्फ 12 घंटों तक निराहार रहने के बाद खाने तक सीमित नहीं है.

 

क्योंकि हर त्योहार का खाने से नाता है

दुनिया भर में चाहे कोई भी त्योहार हो, उसका अपना कुछ न कुछ खाना ज़रूर होता है. होली आएगी तो गुझिया, दिवाली के बाद अन्नकूट, क्रिसमस के केक, ईद की सिवईं, व्रत की साबूदाने की खिचड़ी. नौरोज़, ईस्टर, बकरीद या शब-ए-बरात हर त्योहार का कुछ स्पेशल खाना होता है. ज्यादातर त्योहार में खाने की मनाही होती है. रमज़ान एक महीने का ऐसा मौका है जहां खाने का समय लोगों की दिनचर्या तय करता है.

वैसे तो इफ्तार और खजूर एक दूसरे के पर्यायवाची हैं लेकिन कुछ और भी चीजें हैं जो समय या सामाजिक परिवेश के चलते इफ्तार का हिस्सा बन गई हैं. आपको उत्तर भारत के ज्यादातर इफ्तार में फ्रूट चाट, समोसा, पकौड़े, रूह अफज़ा का शर्बत और काले चने मिल ही जाएंगे. इनके अलावा चिकन या मांस के साथ रुमाली रोटियां पेट भरने के काम आती हैं. खाने का ये कॉम्बिनेशन हमें बहुत कुछ बताता है. इफ्तार में खजूर के शामिल होने के दो कारण हैं, एक तो ये अरब से आया फल है. इस्लाम की जड़ों से खजूर का सीधा संबंध है. पैगम्बर मोहम्मद खजूर के साथ रोज़ा इफ्तार किया करते थे.

(फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

(फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

खजूर से जुड़ी सुन्नत के दूसरी तरफ एक फल के तौर पर खजूर, कम जगह में लंबे समय तक रखा जाने वाला फल है. इसे आप सफर के दौरान साथ रख सकते हैं. खजूर में अच्छी खासी कैलोरी होती हैं जो तुरंत ताकत देती है. ठीक इसी तरह समोसा भले ही मध्य एशिया के रास्ते भारत आया हो, आज के इफ्तार में समोसा भी हर इफ्तार का हिस्सा होता ही है. इसके पीछे भी वही वजह हैं जो खजूर के साथ हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में समोसा हर जगह मिल जाता है, 1 रुपए से 25-30 रुपए के बीच किसी भी कीमत का हो सकता है. इसे साथ लेकर जाना आसान है. देर तक चल जाता है. ठंडा हो तो भी खा सकते हैं.

खजूर और समोसे के अलावा मौसमी फल हर इफ्तार का हिस्सा होते हैं. दुनिया के अलग-अलग देशों में इफ्तार का खाना उसके परिवेश से तय होता है. मसलन पाकिस्तान में इफ्तार लगभग हिंदुस्तान जैसा ही है. वहां रमज़ान पर हर साल 'दाग अच्छे हैं' वाले विज्ञापन बनते हैं. इनमें खस्ता, जलेबी और समोसा होता ही है. इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे मुल्कों में प्रॉन (झींगा) से बनी चीजें इफ्तार का अहम हिस्सा हैं. मिस्र में अंगूर की पत्तियों में मीट भर कर एक खास स्नैक बनता है. यमन वगैरह में समोसे से मिलता जुलता संबोसा इफ्तार खोलने का जरिया है. अमेरिका में पाई, इटली में पिज़्जा और फ्रांस में ब्रेड होना स्वाभाविक है.

मीना बाजार. (फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी)

मीना बाजार. (फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी)

इफ्तार में सिर्फ खाना ही नहीं है जिसमें समय और समाज के हिसाब से बदलाव आया. इफ्तार करने और करवाने के तरीकों में भी काफी बदलाव हुए हैं. उनपर बात करने से पहले एक बार बात पुरानी दिल्ली में होने वाले इफ्तार की.

दिल्ली शहर का सारा मीना बाज़ार लेकर

कहते हैं शाहजहां के समय में दिल्ली में लोगों का हाजमा सही नहीं रहता था. हकीमों ने बादशाह को सलाह दी कि शहर में कुछ ऐसा इंतज़ाम करें कि लोग खाने में मसाले ज्यादा खाएं. मानते हैं कि इसके बाद पुरानी दिल्ली के बाज़ार में शाम को चाट वगैरह का चलन बढ़ा. शाहजहां से लेकर अबतक दिल्ली कई बार बदली. लेकिन जामा मस्जिद के आस-पास इसके बाज़ार पुश्त दर पुश्त मजबूत होते गए. आज के समय में पुरानी दिल्ली की नाइट लाइफ या शाम के बाज़ार की रौनक देखते ही बनती है. रमज़ान के मौके पर इसमें और इज़ाफा हो जाता है. ये बाज़ार सूरज ढलने के बाद ही शुरू होता है और कम से कम रात 12 बजे तक अपने पूरे शबाब पर रहता है. जिन्हें लगता है कि नाइट लाइफ केवल पब में हो सकती है, उन्हें इस बाज़ार में आना ही चाहिए.

(फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी)

(फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी)

शमशाद बेग़म के 'कजरा मोहब्बत वाला' गाने में एक लाइन आती है, 'दिल्ली शहर का सारा मीना बाज़ार लेकर', जामा मस्जिद के पूरब की ओर यही मीना बाज़ार है. इसमें अमूमन अब सस्ता चायनीज़ सामान और सस्ते से कपड़े ही मिलते हैं लेकिन, शाम के समय इसके सामने से मटिया महल तक खाने-पीने की तमाम रंगत निखर कर आती है. इसमें नॉनवेज के शौकीनों के लिए तो तमाम चीज़ें हैं ही, शाकाहारियों के लिए भी कुछ बेहतरीन खाने के ऑप्शन हैं.

जामा मस्जिद में खाने की सबसे खास चीज़ की बात करें तो वो मावे की 'काली जलेबी' है. उत्तर भारत के बाकी राज्यों से दिल्ली आए लोगों की खास शिकायत रहती है कि दिल्ली में सुबह-सुबह गर्म जलेबी नहीं मिलती. पुरानी दिल्ली इस दर्द को कुछ कम करती है लेकिन यहां की काली जलेबी अपने आप में खास है. सामान्य जलेबी से अलग इसे खोए से बनाया जाता है. जिसके चलते मूल रूप से मध्य प्रदेश की ये मिठाई गुलाब जामुन और जलेबी के बीच का स्वाद देती है.

मावा जलेबी. (फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

मावा जलेबी. (फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

सबसे खास 'शाही टुकड़ा'

दिल्ली के इस इलाके की दूसरी खासियत है शाही टुकड़ा. शाही टुकड़ा मूल रूप से ब्रेड पुडिंग का भारतीय वर्ज़न है. ब्रेड डीप फ्राई करके उसे चाशनी या शहद में डुबोते हैं. इसके बाद ऊपर से रबड़ी लगाकर खाने के लिए पेश किया जाता है. यह सवाल रह-रहकर उठता है कि क्या ये मध्यकालीन भारत की देन है या ब्रिटिश शासन के समय की कोई उपज. शाही टुकड़ा के शुरुआती दावों में इसके मिस्र में पहली बार बनाए जाने की कहानी मिलती है. वहीं कुछ दूसरे किस्से बताते हैं कि शाही टुकड़ा मुगल शासकों की पसंदीदा मिठाइयों में से एक था. इसी के चलते शाही टुकड़ा उनके इफ्तार का हिस्सा बना और धीरे-धीरे मुगलों की एक मिठाई बन गया. शाही टुकड़े को थोड़े बदलाव के साथ हैदराबाद में बनाया जाता है. वहां इसका नाम 'डबल का मीठा' है. इसमें डबल शब्द डबल रोटी से आया है. वैसे पाकिस्तान हमेशा की तरह दुनिया भर में बताता है कि 'मुगल' शाही टुकड़ा पाकिस्तान की खासियत है. इतना ही नहीं पाकिस्तानी फूड ब्लॉगर हलीम और रूह अफ़ज़ा पर भी पाकिस्तानी ठप्पा लगा देते हैं.

(फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

(फोटो क्रेडिट- अनिमेष मुखर्जी)

पाकिस्तान की इस हिमाकत का हिसाब फिर कभी करेंगे. शाही टुकड़े और रूह अफ़ज़ा के अलावा पुरानी दिल्ली की खासियत फालूदा है जिसको लेकर आप बहस कर सकते हैं कि फालूदा ड्रिंक है या मिठाई. साथ ही साथ खजूर शेक भी एक ऐसी चीज है जिसे आपको कम से कम एक बार ट्राय करना ही चाहिए. अगर आप शाकाहारी हैं और सिर्फ मीठा नहीं खाना चाहते हैं तो, गोलचा सिनेमा के पीछे 'सुविधा' में जाइए. शुद्ध शाकाहारी इस रेस्त्रां में सुविधा स्पेशल दाल मिलती है जिसे 24 घंटे में पकाया जाता है. इसको खाकर लगता है कि यहां की दाल मुर्गी के बराबर स्वादिष्ट हो सकती है.

खैर वापस आते हैं इफ्तार पर. इफ्तार का मूल रूप तो एक ही है लेकिन सुविधा या सामाजिक सरोकारों के चलते कई बदलाव आ गए हैं. हिंदुओं में श्राद्ध पक्ष में बरसी पर भोज करवाने का चलन है. इसी तरह से कुछ मुस्लिम परिवार भी किसी की बरसी पर इफ्तार या भोज का आयोजन करते हैं. इसी तरह इफ्तार पूरे खानदान के एक साथ मिलने का मौका भी है. अगर जामा मस्जिद जाएंगे तो वहां जमुनापार के सीलमपुर जैसे इलाकों से आए परिवार इफ्तार करते मिल जाएंगे. आम तौर पर इनके घरों में इतनी जगह नहीं होती कि पूरा खानदान एक साथ बैठकर इफ्तार कर सके, ऐसे में जामा मस्जिद में सबको बुलाकर इफ्तार करवाना आसान तरीका है.

फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी

फोटो क्रेडिट- भारती द्विवेदी

इन इलाकों में जो दुकानदार या छोटे-मोटे कामगार रहते हैं, स्थानीय सम्पन्न परिवार उनका भी खयाल रखते हैं. ज्यादातर दुकानों वगैरह के परिवार होते हैं जहां से पूरे महीने इफ्तारी आती रहती है. ये व्यवस्था सिर्फ मुस्लिम परिवारों तक सीमित नहीं है. कई जगह जहां इफ्तार के समय काम छोड़ना संभव न हो वहां किसी भी धर्म के लोग रोज़ेदार के लिए इफ्तार की व्यवस्था कर देते हैं. इस तरह की व्यवस्था में पारंपरिक खजूर और फल के साथ-साथ पिज़्जा या छोले भटूरे जैसा कुछ भी हो सकता है.

इफ्तार करने और करवाने वालों के बीच

जैसे गणपति विसर्जन और करवाचौथ सिनेमा और मीडिया का त्योहार बन गया, इफ्तार से राजनीति जुड़ गई. तमाम नेताओं ने इफ्तार पार्टियां दीं. ईद पर टोपी पहनी या न पहन कर तमाम संदेश दिए. इसके बाद एक दौर आया जब सीधे-सीधे कहा गया कि मैं ईद नहीं मनाउंगा. चुनाव का सियासी गणित बदला तो नागपुर शहर 'पार्टी मुख्यालयों' में भी पार्टी और ईद की तैयारी होने लगी हैं. इन सबके बीच मरहूम अंकित सक्सेना के पिता का इफ्तार भी है और 'इफ्तार फॉर ऑल' चलाने वाले एनजीएओ भी. ऐसे में कभी मौका मिले तो किसी इफ्तार में शामिल होकर देखिए. हो सके तो ईद पर किसी ज़रूरतमंद अमीना को हामिद की तरह एक चिमटा खरीद कर दीजिए.

(लेखक स्वतंत्र रूप से लेखन का कार्य करते हैं)

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