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आईएएस की कामयाबी मुबारक, पर बापू को भी पढ़ लीजिए!

गांधी का कहना था कि बीए, एमए, बारोनेट, सर, ऑनरेबल, आईसीएस जैसे सरकारी ओहदे और डिग्रियां बोझ हैं, जिसके नीचे लोग कुचल जाते हैं

Updated On: Jun 06, 2017 11:11 AM IST

Madhukar Upadhyay

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आईएएस की कामयाबी मुबारक, पर बापू को भी पढ़ लीजिए!

किसी के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में चुने जाने पर जिस तरह की खुशी और विश्लेषण से भरी खबरें आज बनती हैं पहले भी बनती थीं. इसे अकारण नहीं कहा जा सकता लेकिन देश में जब दूसरी बड़ी घटनाएं और समस्याएं हों अखबारों के पहले पन्ने और टेलीविजन की सुर्खियों में इतनी जगह मिलना समझ से परे लगता है.

सवा अरब की आबादी में से कुछ सौ में शामिल होने की उपलब्धि छोटी नहीं है और उसका जश्न मनाना चाहिए लेकिन जितना मनाया जाता है शायद उतना नहीं.

जब एक भारतीय बना था आईसीएस

यही स्थिति 100 साल पहले भी थी. तब आईएएस को आईसीएस यानी भारतीय सिविल सेवा कहा जाता था. उस समय अधिकारी बनने वालों की संख्या और कम होती थी. ऊपर से भारतीय आईसीएस तो गिनती के लोग बन पाते थे.

ऐसे में जब गुजरात के नानालाल आईसीएस बने थे तो उनके पिता, परिजन, और पूरा सूबा खुशी से झूम उठा जैसे यह उपलब्धि उनकी व्यक्तिगत हो. ये घटना साल 1915 की है.

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28 नवम्बर को अहमदाबाद में एक बड़ा जलसा आयोजित किया गया. उसमें परिवार के अलावा नगर के सभी प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया गया कि वे इस खुशी में शरीक हो सकें. महात्मा गांधी दस महीने पहले दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और उन्होंने किराए के मकान में कोचरब में अपना आश्रम बना लिया था.

01/00/1998. File pictures of Mahatma Gandhi

तमाम गुजराती लोग आश्रम को आर्थिक मदद दे रहे थे और नानालाल के पिता उनमें शामिल थे. एक निमंत्रण गांधी को भेजा गया कि वे नानालाल की कामयाबी पर दो शब्द बोलें.

मंच पर नानालाल गांधी के ठीक बगल में बैठे थे. कुछ असहज. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि लोग किसी के सरकारी अधिकारी बनने की घटना को इतनी बड़ी बात क्यों मानते  हैं. नानालाल ने धीरे से गांधी से कहा, 'अगर आप इस पर कुछ बोल सकें तो अच्छा होगा. मैं खुद को इस योग्य नहीं समझता.'

गांधी भारत के अपने शुरूआती दिनों में नियमित डायरी लिखते थे लेकिन उनकी डायरी का 28 नवम्बर का पन्ना खाली था. उन्होंने कुछ नहीं लिखा. इस जश्न की खबर 10 दिन बाद गुजराती अखबार 'खेड़ा वर्तमान' में छपी जिसमें जश्न का हिस्सा छोटा गांधी का भाषण विस्तार से था.

गांधी ने बताया किसको बनाए आदर्श

गांधी ने कहा, 'मैं जानता हूँ कि मेरा बोलना आपको पसंद नहीं आएगा लेकिन मैं अपनी बात कहना जरूरी समझता हूं. मुझसे कहा जा सकता है कि अगर आपको यही बोलना था तो आप आए क्यों? मेरा उत्तर होगा कि मैं प्रेमवश आया हूं. और आप खुश हैं इसलिए मैं भी खुश हूं कि आप नानालाल का सम्मान कर रहे हैं.'

गांधी का कहना था, 'नानालाल की कड़ी मेहनत का सम्मान होना चाहिए लेकिन मैं चाहूंगा कि कोई दूसरा विद्यार्थी उनका अनुसरण ना करे. देश को सिविल सेवा की जरूरत है पर उसके लिए ओहदे की जरूरत नहीं है. छात्रों के लिए अगर नागरिक सेवा का कोई उदाहरण हो सकता है तो वो दादा भाई नैरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता हैं कोई आईसीएस अधिकारी नहीं.'

'नानालाल के पिता ने उन्हें आईसीएस बनाने पर 30000 रुपए खर्च किए. इसका इस्तेमाल बेहतर काम में हो सकता था और ऐसे में नानालाल आम आदमी रह गए होते तब भी समाज के लिए उपयोगी होते.'

Mahatma Gandhi

ओहदे नहीं देते हैं विचारों की आजादी 

गांधी का कहना था कि बीए, एमए, बारोनेट, सर, ऑनरेबल, आईसीएस जैसे सरकारी ओहदे और डिग्रियां बोझ हैं जिसके नीचे लोग कुचल जाते हैं. वे बोले, 'मेरा मानना है कि देश को इनकी कोई जरूरत नहीं है.'

गांधी ने कहा कि ये ओहदे विचारों की आजादी नहीं देते. उन्होंने कहा, 'देश को ऐसे लोगों की जरूरत है जो इनसे ऊपर उठ सकें. देश में इस समय खौफ का माहौल है और हालत ऐसी है कि हम अपने विचार व्यक्त करने में भी डरते हैं. ऐसे में सरकारी ठप्पे के प्रति प्यार का कोई मतलब नहीं है. ठप्पा ना होता नानालाल और अच्छा काम कर पाते.'

गांधी ने कहा, 'मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि नानालाल दूसरे अधिकारियों की तरह लोगों को अपना गुलाम ना समझें बल्कि यह मानें कि वे उनकी सेवा के लिए हैं. अगर ऐसा हुआ तो मुझे खुशी होगी. अगर वो दूसरे आईसीएस अधिकारियों की तरह बने तो उन्हें प्रायश्चित करना चाहिए.'

'मैं ये भी कह दूं जिस दिन मुझे पता लगा कि नानालाल दूसरे आईसीएस अधिकारियों की तरह हो गए हैं तो मैं इस समारोह में आने और इसे संबोधित करने के लिए खुद प्रायश्चित करूंगा.'

ऐसे अफसर थे नानालाल 

भाषण के अंत में गांधी ने कहा, 'मैंने आपको अपने मन की बात बता दी है इसमें जो अच्छा लगे उसे मानिए जो कचरा लगे उसे हॉल की खिड़की से बाहर फेंक दीजिए. दोनों स्थितियों में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा.'

गांधी के भाषण का बाकी लोगों पर क्या असर हुआ, नहीं मालूम लेकिन नानालाल ने उसे सकारात्मक रूप से लिया.

आजादी की लड़ाई के दौरान नानालाल सी मेहता आजमगढ़ के कलेक्टर थे और एक बार गांधी आंदोलन के सिलसिले में वहां पहुंचे. सरकारी निर्देश स्पष्ट थे कि गांधी के साथ कैसा व्यवहार किया जाना है. नानालाल ने निर्देशों की उपेक्षा की, रेलवे स्टेशन गए और गांधी को घर ले आए और वहीं रखा.

इस घटना की ब्रितानी अधिकारियों ने आलोचना की लेकिन नानालाल ने उन सबको सिर्फ ये कहकर शांत कर दिया कि गांधी उनके पारिवारिक मित्र हैं.

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