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नवाजुद्दीन मामला: सच्चाई फेयरनेस क्रीम ही है क्योंकि मन तो काला है

दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड रंग, नस्ल और जेंडर के पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं है

Updated On: Jul 19, 2017 02:17 PM IST

Rakesh Kayasth Rakesh Kayasth

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नवाजुद्दीन मामला: सच्चाई फेयरनेस क्रीम ही है क्योंकि मन तो काला है

लगभग पचपन साल हो गए, जब गुलज़ार ने हिंदी सिनेमा के लिए अपना पहला गीत लिखा था— मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे. गीत पूरी तरह रोमैंटिक था, लेकिन गौर करने पर उसमें एक सुर नस्लवाद के विरोध का भी ढूंढा जा सकता है.

आधी सदी बीत गई, लेकिन कहानी अब भी वहीं की वही है. श्याम रंग सिर्फ गाने में अच्छा लगता है. असली जिंदगी का सच तो गोरेपन की क्रीम है. काला रंग किसी को पसंद नहीं. फिल्म बनाने वालों को तो कतई नहीं.

महमूद ने अपने एक गाने में पूछा था— क्या हुआ काले से डर गए क्या? हकीकत ये है कि कॉमर्शियल सिनेमा बनाने वाले काले रंग से सचमुच डरते हैं. मौजूदा दौर के सबसे बड़े अभिनेताओं में एक नवाजुद्दीन सिद्दीकी के एक ट्वीट में बॉलीवुड के इस कड़वे सच को एक बार फिर से उजागर कर दिया है.

`शुक्रिया याद दिलाने के लिए कि मैं काला हूं’

कॉमर्शियल हो या फेस्टिवल सर्किट, हर तरह के सिनेमा की ज़रूरत बन चुके नवाजुद्धीन ने ट्वीट किया है—  शुक्रिया मुझे याद दिलाने के लिए कि मैं गोरे और हैडसम लोगो के साथ काम नहीं कर सकता, क्योंकि मेरा रंग काला है और मैं गुड लुकिंग नहीं हूं.

जो लोग थोड़ी-बहुत संवेदनशीलता रखते हैं और जिन्हें इंसान की बुनियादी बराबरी में यकीन है, उनके दिल पर नवाजुद्दीन का ये ट्वीट हथौड़े की तरह जा लगा. हर कोई पूछ रहा है कि आखिर नवाज ने ऐसा ट्वीट क्यों किया?

कहानी ये सामने आई है कि नवाज ने अपने ट्वीट के जरिये फिल्म बाबू मोशाय बंदूकबाज के कास्टिंग डायरेक्टर संजय चौहान के बयान का जवाब दिया है. संजय चौहान ने कहा था कि हम नवाजुद्दीन जैसे काले रंग वाले अभिनेता के साथ किसी गोरे और गुड लुकिंग एक्टर को कास्ट करेंगे तो बहुत अजीब लगेगा. इसलिए हम इस बात का ध्यान रखते हैं कि ऐसा मिसमैच ना हो.

सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री में पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं

Nawazuddin

यह हाल उस बॉलीवुड है, जहां दुनिया भर में सबसे ज्यादा फिल्में बनती हैं. प्रोफेशनलिज्म के हिसाब से ये बॉलीवुड का सबसे अच्छा दौर है, जहां हर तरह की फिल्में बन रही हैं और स्टीरियो टाइप सिनेमा से अलग फिल्मों के लिए भी दर्शक मौजूद हैं. इसके बावजूद मौजूदा दौर के एक बहुत बड़े अदाकार को इस एहसास के साथ जीना पड़ रहा है  कि वो दिखने में अच्छा नहीं है, इसलिए गुड लुकिंग लोगों के साथ काम करने के उसके रास्ते बंद हैं.

कुछ लोगों को यह लग सकता है कि कास्टिंग डायरेक्टर का काम कहानी और किरदार के हिसाब से अभिनेताओं को कास्ट करना है. अगर ऐसे में संजय चौहान ने ईमानदारी से अपनी बात कही तो इसमें गलत कुछ नहीं है. लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं है. सवाल ये है कि भारत जैसे विशाल और बहु-सांस्कृतिक समाज में बनने वाली फिल्मों में डायवर्सिटी कहां है?

बॉलीवुड में डायवर्सिटी कब आएगी?

आखिर ऐसा क्यों है कि एक खास शक्ल-सूरत वाले लोग ही हीरो बनते हैं? जो लोग फिल्म इंडस्ट्री को फॉलो करते हैं, उन्हे पता है कि सुंदरता के बने-बनाए खांचे में फिट ना होनेवाले सितारों को किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

सुनील शेट्टी जैसे सांवले रंग वाले हीरो गिनती के हुए हैं. बतौर हीरो मनोज वाजपेयी जैसे लोगों ने जो फिल्में कीं, उनके लिए डिस्ट्रीब्यूटर के आसानी से ना मिल पाने की कहानियां आम हैं. अब जरा उस फिल्म इंडस्ट्री का हाल देखिए जिसके तर्ज पर हिंदी सिनेमा उद्योग का नाम बॉलीवुड रखा गया है.

हॉलीवुड में थोक के भाव अश्वेत अभिनेता-अभिनेत्रियां नजर आते हैं. फिल्में बनती हैं और खूब चलती हैं. अमेरिकी समाज किस तरह अपनी डायवर्सिटी को सेलिब्रेट करता है, वह हॉलीवुड में बनने वाली फिल्मों में भी साफ नजर आता है. लेकिन भारत में वह डायवर्सिटी कहां है?  मैरी कॉम पहली फिल्म थी, जिसके जरिये पूर्वोत्तर के किसी चेहरे को नायक या नायिका बनाया गया. देश के बहुत से हिस्से ऐसे हैं, जिनका कोई प्रतिनिधित्व मेन स्ट्रीम सिनेमा में नहीं है।

आधी-आबादी की अधूरी हिस्सेदारी

जेंडर इक्विलिटी का मामला भी बॉलीवुड में धीमी आवाज में उठता रहता है. बेशक फिल्म किसी हीरोइन के नाम पर चले, लेकिन क्या उसे हीरो के बराबर पैसे मिलते हैं? भारत का सिनेमा बहुत बदला है, इसके बावजूद हीरोइन को लेकर स्टीरियो टाइप सोच खत्म नहीं हुई है.

पिंक और नाम शबाना जैसी फिल्मों में दमदार एक्टिंग कर चुकी तापसी पन्नू ने कई बार खुलकर कहा है कि बतौर महिला उन्हे अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ा है. कांट्रेक्ट साइन होने के बावजूद उन्हे फिल्म से हटा दिया गया क्योंकि फिल्म के सुपर स्टार के दिमाग में हीरोइन का जो खांचा था, उसमें तापसी फिट नहीं बैठती थीं.

कंगना ने चुकाई विद्रोह की कीमत

kangana

कंगना रनौत बॉलीवुड में भेदभाव के सवालों को लेकर बहुत मुखर रही हैं और उन्हें इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी है. पिछले दिनों कंगना ने कहा था कि बॉलीवुड में भाई-भतीजावाद खुलकर चलता है. आउट साइडर होने की वजह से उन्हे इस माहौल में बहुत संघर्ष करना पड़ा.

बात भले ही पूरी तरह सच हो, लेकिन बॉलीवुड की कई हस्तियों ने इसे दिल पर लिया. आईफा अवार्ड के दौरान करन जौहर ने सैफ अली खान और नए-नवेले हीरो वरुण धवन के साथ मिलकर कंगना का भरपूर मजाक उड़ाया.

उन्होंने भाई-भतीजावाद जिंदाबाद के नारे लगवाए,  कंगना पर छींटाकशी करते हुए- `बोले चूड़ियां, बोले कंगना’ गाया. फिर करन ने पूछा— ये कंगना इतना बोलती क्यों हैं?

किसी भी अवार्ड सेरेमनी में हंसी-मजाक आम बात है. लेकिन भाई-भतीजावाद जैसे गंभीर सवाल को हंसी में उड़ाने को क्या कहा जाए?  हालांकि वरुण धवन ने बाद में ट्वीट करके कंगना से माफी मांग ली, लेकिन करन जौहर ने इसकी जरूरत नहीं समझी.

बात बहुत साफ है। अच्छी-अच्छी बातें अपनी जगह, लेकिन भारत की फिल्म इंडस्ट्री भी पूरी तरह वैसी ही है, जैसा समाज है. सिनेमा और समाज दोनों अगर थोड़ा-थोड़ा बदलें तो शायद एक-दूसरे को बदल सकते हैं.

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