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मानव तस्करी: देश में व्यापक पैमाने पर पसरा अपराध

पीड़ित लोगों के पुनर्वास में एक बड़ी समस्या यह होती है कि पीड़ित हर स्तर पर इतना अधिक शोषण का शिकार हो चुका होता है कि उसका विश्‍वास सभी पर से उठ जाता है

Sushil K Tekriwal Sushil K Tekriwal Updated On: Dec 17, 2017 09:35 AM IST

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मानव तस्करी: देश में व्यापक पैमाने पर पसरा अपराध

नशीली दवाओं और हथियारों के कारोबार के बाद मानव तस्करी विश्वभर में तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है. भारत में भी यह अपराध व्यापक पैमाने पर अपने पैर पसार चुका है. महानगर से लेकर ग्रामीण स्तर पर मानव तस्करों के जाल फैले हुए हैं. इस जाल के तार विश्व स्तर पर भी जुड़े हुए हैं. भारत के साथ-साथ विश्व स्तर पर कानून की लचरता व लाचारगी ने इस अपराध को खतरनाक स्तर तक पनपने का मौका दिया है.

मानव तस्करी का भावार्थ स्पष्ट रूप से संयुक्त राष्ट्र ने परिभाषित किया है जिसके अनुसार 'किसी व्यक्ति को डराकर, बलप्रयोग कर या दोषपूर्ण तरीके से भर्ती करने, परिवहन करने या शरण में रखने की गतिविधि मानव-तस्करी की श्रेणी में आती है.'

अमेरिकी विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2013 में तकरीबन साढ़े छह करोड़ लोगों की तस्करी की गई. इनमें से अधिकतर बच्चे हैं जिन्हें देह व्यापार, बंधुआ मजदूरी या भीख मांगने के काम में लगाया गया. वॉक फ्री फाउंडेशन के 2014 के ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स के मुताबिक भारत में एक करोड़ चार लाख से अधिक लोग आधुनिक गुलामी में जकड़े हुए हैं.

यह संख्या दुनिया भर में सबसे अधिक है. हालांकि भारत के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक मानव तस्करी की समस्या को बेहद कम करके आंका गया है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो में 2014 में महज 5,466 मामले ही दर्ज हुए हैं.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर इमेज )

भारत में साल 2016 के दौरान तकरीबन 20 हजार महिलाएं और बच्चे मानव तस्करी का शिकार हुए. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने सदन में बताया कि 2016 में तस्करी के 19,223 मामले दर्ज किए गए जो साल 2015 में 15,448 थे. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ये मामले साल 2015 की तुलना में 25 फीसदी बढ़े हैं.

मानव तस्करी (रोकथाम, संरक्षण और पुनर्वास) विधेयक-2016 को कानून का रूप लेना है. इस कानून के मुताबिक मानव तस्करी के अपराधियों की सजा को दोगुना करने का प्रावधान है और ऐसे मामलों की तेज सुनवाई के लिए विशेष अदालतों के गठन का भी प्रावधान है.

इस कानून के मुताबिक पीड़ितों की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जा सकेगा. साथ ही प्रस्तावित कानून में पड़ोसी देशों, मसलन नेपाल या बांग्लादेश के साथ मानव तस्करी की रोकथाम के लिए साझे तौर पर काम करने का प्रावधान भी शामिल है.

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मौजूदा कानून में मानव तस्करी सरीखे गंभीर अपराध की निरंतर अनदेखी हो रही है. प्रस्तावित नए कानून में भारतीय दंड संहिता की उन कमियों को पाटने की कोशिश की गई है जिसमें इससे जुड़े कई और भी अपराधों से भी सकारात्मक और सख्त रूप में निपटा जा सके.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के नए आंकड़ों के अनुसार ट्रैफिकिंग में यह दूसरा सबसे बड़ा अपराध है, जो पिछले 10 सालों में 14 गुना बढ़ा है और वर्ष 2014 में 65% तक बढ़ा है. लड़कियां और महिलाएं ट्रैफिकिंग के निशाने पर रहती हैं, जो पिछले दस सालों में देशभर के ह्यूमन ट्रैफिकिंग केसेस का 76% है.

ह्यूमन ट्रैफिकिंग के अंतर्गत ही अन्य जो केसेस रजिस्टर होते हैं, उनमें वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को बेचना, विदेशों से लड़कियों को ख़रीदना और वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की ख़रीद-फरोख़्त आदि आते हैं. वर्ष 2009 से लेकर 2014 के बीच ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामलों में 92% बढ़ोतरी हुई है.

इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि यह बहुत अधिक मुनाफे का धंधा है, ज्यादा-से-ज्यादा पैसा कमाने का लालच इस तरह के अपराधों के फलने-फूलने की बड़ी वजह बन रहा है. वर्ष 2014 में देशभर में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के रजिस्टर्ड केसेस में 39% की बढ़ोत्तरी देखी गई.

जैसा कि पहले भी हमने बताया है कि पिछले 6 वर्षों में 92% की बढ़ोत्तरी देखी गई है, यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन ओईसीई के मुताबिक हर साल मध्य और पूर्वी यूरोप से सवा लाख से पांच लाख के बीच महिलाओं की तस्करी पश्चिमी यूरोप में की जाती है और इन्हें देह व्यापार में धकेला जाता है. इनमें से अधिकतर लड़कियां बालिग नहीं होती.

इम्मॉरल ट्रैफिकिंग प्रिवेंशन एक्ट (आईटीपीए) के अनुसार अगर व्यापार के इरादे से ह्यूमन ट्रैफिकिंग होती है, तो 7 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा हो सकती है. इसी तरह से बंधुआ मजदूरी से लेकर चाइल्ड लेबर तक के लिए विभिन्न कानून व सजा का प्रावधान है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या कानून को क्रियान्वित करने की ही है. बात अगर सजा की की जाए, तो पिछले 5 सालों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के फाइल्ड केसेस में 23% में ही दोष सिद्ध हुआ है और 77 प्रतिशत अभियुक्त रिहा कर दिए गए हैं.

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बीते 17 अक्टूबर को जर्मनी की राजधानी बर्लिन में मानव तस्करी के खिलाफ प्रदर्शन की एक तस्वीर. (रायटर इमेज)

ट्रैफिकिंग का अर्थ होता है बहुत-से मानवाधिकारों का उल्लंघन, ऐसे में उनका पुनर्वास बहुत ही संवदेनशील मुद्दा होता है. चूंकि पीड़ित न सिर्फ शारीरिक, बल्कि बहुत-से मानसिक शोषण और प्रताड़ना से गुजरते हैं, इसके अलावा उन्हें ढेरों यौन संक्रमण भी हो जाते हैं.

सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि परिवार भी इन्हें अपनाने से कतराते हैं, क्योंकि इसे वो समाज में बदनामी से जोड़कर देखते हैं, वहीं दूसरी ओर एक संभावना यह भी होती है कि परिवार खुद ही इस धंधे में लिप्त होता है. ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की होती है कि पीड़ित को सुरक्षा मिले. मानसिक रूप से भी उसे सामान्य किया जाए, उसे बेहतर भविष्य की ओर आशान्वित किया जाए, तब कहीं जाकर पूरी तरह से कामयाबी मिल पाएगी.

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पीड़ित लोगों के पुनर्वास में एक बड़ी समस्या यह होती है कि पीड़ित हर स्तर पर इतना अधिक शोषण का शिकार हो चुका होता है कि उसका विश्‍वास सभी पर से उठ जाता है, उसमें फिर से आशा जगाना बेहद चुनौतीभरा काम है. यही वजह है कि जहां पहले प्रज्वला जैसी संस्थाएं रेस्क्यू का काम करती थीं, वहीं वे अब पुलिस की अधिक मदद लेती हैं और अधिक ध्यान पुनर्वास की प्रक्रिया पर देती हैं, ताकि पीड़ितों को पूरी तरह से इससे बाहर निकाला जा सके.

(लेखक प्रद्युम्न हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट में प्रद्युम्न परिवार के वकील हैं)

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