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नागरिक अधिकारों के अव्वल पैरोकार थे जस्टिस राजिंदर सच्चर

यूपीए सरकार अपने दस साल लंबे शासन के बावजूद सच्चर कमेटी की सिफारिशों को हूबहू लागू नहीं कर पाई. इसका अफसोस जस्टिस सच्चर को शायद मरते दम तक रहा

Updated On: Apr 20, 2018 06:24 PM IST

Anant Mittal

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नागरिक अधिकारों के अव्वल पैरोकार थे जस्टिस राजिंदर सच्चर

देश में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सबसे मुखर पैरोकारों में शुमार जस्टिस राजिंदर सच्चर अपनी बढ़ती उम्र और शारीरिक दुर्बलता के बावजूद आखिरी दम तक अन्याय और विषमता के खिलाफ आवाज उठाते रहे.

आजादी के बाद पंजाब के पहले मुख्यमंत्री पंडित भीमसेन सच्चर के बेटे राजिंदर सच्चर ने अपने पिता से मिले आजादी की विरासत के सिद्धांतों का आजीवन शिद्दत से पालन किया. उनका बचपन आजादी के वीरों की संगत में ही बीता जिसने उनके भीतर स्वतंत्रता और समानता की ऐसी लौ जगाई जो उनकी अंतिम सांस तक जागृत रही. राजिंदर सच्चर दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश और फिर चीफ जस्टिस भी रहे. उनके पता भीमसेन सच्चर पंजाब के दो बार मुख्यमंत्री और फिर ओडिशा के राज्यपाल भी रहे.

उन्होंने अपने फैसलों से आम आदमी के लिए न्याय की परिपाटी डाली और देश में लोकतंत्र और सामाजिक समानता की जड़ें मजबूत कीं. देश में चाहे फूलन देवी के संसद में निर्वाचित होने पर उनके कायाकल्प को रेखांकित करके उन्हें सामाजिक मान्यता दिलाने की बात हो अथवा नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के विरोध का मौका हो जस्टिस सच्चर परिवर्तनकामी ताकतों का साथ देने से कभी नहीं चूके. इस मुहिम में उन्हें अनेक बार सरकारी मेहमान भी बनना पड़ा मगर वे उससे भी कभी नहीं कतराए.

सच्चर कमिटी की सिफारिशों से आए थे सुर्खियों में

जस्टिस सच्चर अपने अन्य क्रियाकलापों के अलावा सुर्खियों में सच्चर कमिटी के गठन और उसकी रिपोर्ट के कारण भी आए. यह सात सदस्यीय कमिटी उनकी अध्यक्षता में यूपीए-1 के कार्यकाल में 2005 में मुसलमानों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए गठित की गई थी. इस कमेटी का महत्व इसलिए और बढ़ गया क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश के संसाधनों पर मुसलमानों के पहले हक जैसी साहसिक बात कह दी थी.

सच्चर कमेटी ने 1947 में देश के मजहबी बिना पर बंटवारे और आजादी के बाद भारत में ही रह गए मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का पहली बार विस्तृत अध्ययन करके उन्हें मुख्यधारा में लाने के ठोस उपाय सुझाए थे.

यूपीए सरकार अपने दस साल लंबे शासन के बावजूद सच्चर कमेटी की सिफारिशों को हूबहू लागू नहीं कर पाई. इसका अफसोस जस्टिस सच्चर को शायद मरते दम तक रहा. निजी बातचीत में इस लेखक से भी उन्होंने माना था कि यूपीए सरकार ने मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने का ऐतिहासिक मौका गंवा दिया.

यूपीए सरकार और डॉ. मनमोहन सिंह के अपने वायदे से मुकरने के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को जिम्मेदार ठहराया गया. ऐसा माना जाता है कि कांग्रेस के कुछ प्रभावशाली नेताओं को यह सिफारिश लागू होने पर हिंदू वोटरों के पार्टी से कट जाने का भय सता रहा था. यह बात दीगर है कि 2014 के आम चुनाव में बीजेपी और नरेंद्र मोदी यूपीए के भ्रष्टाचार के साथ ही हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति के बूते ही सत्ता झटकने में कामयाब रहे और कांग्रेस हाथ मलती रह गई.

MANMOHAN SINGH HAPPY

मुसलमानों की हालत को लेकर दिया था विस्तृत रिपोर्ट

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट को मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में असंवैधानिक करार देते हुए चुनौती दी थी. साथ ही बीजेपी ने भी उसमें मुसलमानों को बराबरी पर लाने के लिए सुझाए गए उपायों को तुष्टिकरण करार दिया था. हालांकि जस्टिस सच्चर ने इन बातों को जबरन किसी सामाजिक मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास बताकर खारिज किया था.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार देश में मुसलमानों को भले ही सवैधानिक रूप में बराबरी का हक हासिल हो मगर सरकारी नौकरियों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक सुविधाओं की उपलब्धता के मामले में उनकी हालत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों से भी बदतर है.

बहरहाल जस्टिस सच्चर की पढ़ाई-लिखाई लाहौर में हुई थी. लेकिन 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनका परिवार नई सरहद के इस पार वाले पंजाब में आ गया. उन्होंने 1952 में शिमला में वकालत शुरू की और फिर आजीवन नागरिक अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्थाओं के पालन के पैरोकार रहे. जस्टिस सच्चर 1985 में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद से रिटायर होने के बाद भी लगातार तीन दशक तक गरीबों और मजलूमों की आवाज बन कर उनके साथ खड़े रहे.

उनके पिता भीमसेन सच्चर ने कभी कांग्रेसी होने के बावजूद आपातकाल में इदिरा गांधी का खुलेआम विरोध किया था. उन्हीं की परंपरा के अनुरूप उन्होंने पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के साथ सामाजिक अन्याय के अनेक मामलों की स्वतंत्र जांच करके उसकी वैकल्पिक रिपोर्ट जारी की और उपेक्षितों को न्याय दिलाने की कोशिश जारी रखी.

गरीबों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाला समर्पित सिपाही

इसके अलावा वे सूचना के अधिकार, सबको शिक्षा के अधिकार और सबको भरपेट भोजन के अधिकार दिलाने की लड़ाई में भी अपनी बढ़ती उम्र से पैदा परेशानियों के बावजूद डटे रहे.

अन्ना हजारे ने जब 2011 में जन लोकपाल की नियुक्ति के लिए राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर सत्याग्रह और उपवास किया था तब भी जस्टिस सच्चर ने वहां जाकर उन्हें न सिर्फ समर्थन दिया बल्कि पुलिस के हाथों गिरफ्तार भी हुए. साल 2012 में राष्ट्रपति चुनाव से पहले देश के चुनिंदा न्यायविदों, शिक्षकों, रिटायर नौकरशाहों और नागरिक अधिकारों के पैरोकारों ने जस्टिस सच्चर को राष्ट्रपति बनाने के लिए ऑनलाइन पिटीशन जारी किया था जिसका लोगों ने बड़ी संख्या में समर्थन भी किया मगर हमारे राजनीतिक दलों के कान पर जूं नहीं रेंगी.

देश की राजनीति में आई गिरावट से चिंतित थे सच्चर

पिछले कुछ सालों में अपनी बढ़ती उम्र और गिरती सेहत के कारण उनका बाहर निकलना तो कम हो गया था मगर अपने मुलाकातियों को वे भरसक निराश नहीं करते थे. उन्होंने किसी सार्वजनिक मुद्दे पर अपनी अंतिम प्रतिक्रिया 2017 में गुजरात चुनाव में मणिशंकर अय्यर के घर हुई पूर्व पाकिस्तानी राजनयिकों की बैठक को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा षड्यंत्र बताने पर जताई थी.

उस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे और उसका मकसद मोदी सरकार के दौरान लगातार बिगड़ते भारत-पाक रिश्तों को सुधारने के उपायों पर चर्चा करना था. लेकिन पीएम मोदी ने उसे कश्मीर में हालत बिगाड़ने का षड्यंत्र बताकर गुजरात में बह रही बीजेपी विरोधी हवा को अपने पक्ष में करने की कोशिश की थी. जस्टिस सच्चर ने इस हरकत को देश की राजनीति में आई सबसे अधिक गिरावट का प्रतीक बताया था.

उनका कहना था कि लोहिया और नेहरू और कम्युनिस्ट नेताओं और नेहरू के बीच भी राजनीतिक मतभेद पर गहन आलोचनात्मक बयान आते थे मगर उन्होंने एक-दूसरे को देशद्रोही कभी नहीं कहा. संसद और उसके बाहर भारतीय राजनीति के गिरते स्तर और छिछली होड़ से वे खासे चिंतित थे. कुल मिलाकर जस्टिस सच्चर ने 94 साल की उम्र तक देश में नागरिक अधिकारों की अलख जगाई मगर उनके समर्पण और संकल्प के साथ ही सच कहने के साहस की भरपाई वर्तमान हालत में असंभव है.

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