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ह्यू हेफनर: प्लेबॉय के संपादक पत्रकारिता के अहम सबक भी सिखाते हैं

प्लेबॉय पुरुषों का मनोरंजन करती थी. वो बेहद गंभीर लेख छापते, राजनीति, अर्थव्यवस्था, साहित्य पर शानदार इंटरव्यू करते और कवर पर एक खूबसूरत महिला की उत्तेजक तस्वीर छापते

Updated On: Sep 27, 2018 07:07 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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ह्यू हेफनर: प्लेबॉय के संपादक पत्रकारिता के अहम सबक भी सिखाते हैं

ह्यू हेफनर को हम सभी प्लेबॉय के संपादक, संस्थापक के तौर पर ही पहचानते हैं. 27 सितंबर को उनकी मौत के बाद उनके बारे में दो तरह से लिखा गया. बड़े तबके के लिए वो एक रंगीनमिजाज बुज़ुर्ग थे, जिसने पूरी उम्र 'अय्याशी' की. दूसरी तरफ फेमिनिज्म के पैरोकारों के लिए वो नारी समानता के दुश्मन, औरतों को भोग की वस्तु बना देने वाले एक सनकी थे. दोनों ही तस्वीरें अपनी-अपनी जगह सच हैं, लेकिन इन दोनों पहचानों से ऊपर ह्यू की एक और पहचान है, जिस पर कम ही बात होती है.

ह्यू हेफ्नर दुनिया में सबसे लंबे समय तक किसी पत्रिका के एडिटर इन चीफ रहे हैं. बतौर संपादक उन्होंने जितनी शिद्दत से रंगभेद और सरकारी सेंसरशिप के खिलाफ आवाज बुलंद की उसकी बराबरी शायद ही किसी पत्रिका या चैनल ने की हो. 2017 में ह्यू की मौत के बाद जब फेसबुक का कैंब्रिज एनालिटिका वाला मामला सामने आया तो विरोध में प्लेबॉय ने अपना फेसबुक पेज हटा दिया.

प्लेबॉय इस समय अपनी गिरती हुई बिक्री से जूझ रही है और करोड़ो की फॉलोइंग वाला उसका पेज प्लेबॉय के लिए बड़ा सहारा था. इस फैसले के पीछे भी ह्यू की विरासत का हवाला दिया गया.

प्लेबॉय एंटरप्राइजेस ने बयान जारी कर बताया कि 91 साल के हेफनर का उनके घर 'प्लेबॉय मेंशन' में निधन हुआ है.

प्लेबॉय इस समय अपनी गिरती हुई बिक्री से जूझ रही है

सिर्फ पुरुषों का मनोरंजन

ह्यू हेफ्नर ने जब 50 के दशक में प्लेबॉय का विचार सामने रखा तो अमेरिका एक तरह की सामाजिक क्रांति के मुहाने पर था. दो विश्वयुद्ध, मंदी और चर्च की सामाजिकता को पीछे छोड़ 'नया दौर' सामने आ रहा था. इसका सबसे बड़ा हिस्सा था, महिलाओं के अंदर खुलापन. हॉलीवुड में बिकिनी और पिनअप से आगे न्यूडिटी सामान्य चीज बन रही थी. शादी से पहले संबंध, लिव-इन जैसी चीजें समाज में आम हो रही थीं. कुल मिलाकर आज भारत में जिस पश्चिमी सभ्यता का रूपक दिया जाता है, वो सामने आ रही थी. हेफनर ने इस सामाजिक क्रांति को सही समय पर पहचाना और इसके मसीहा बन गए.

उनकी पत्रिका पुरुषों का मनोरंजन करती थी. वो बेहद गंभीर लेख छापते, राजनीति, अर्थव्यवस्था, साहित्य पर शानदार इंटरव्यू करते और कवर पर एक खूबसूरत महिला की उत्तेजक तस्वीर छापते. इसके साथ ही प्लेबॉय के ठीक बीच वाले पेज में भी एक ऐसी ही तस्वीर होती थी. इस फॉर्मूले ने प्लेबॉय को पहले ही साल में जबरदस्त मुनाफा दिया. आज भी अगर आप देखें तो दुनिया भर के अखबार (खास तौर पर टैब्लॉएड और वेबसाइट) इसी लकीर पर चलते हैं. और यही प्लेबॉय की समस्या भी बनी कि वो सिर्फ पुरुषों के बारे में पुरुषों के नजरिए से ही सोचती थी.

सन् 1953 में मैगजीन लॉन्च के 7 साल बाद हेफनर ने प्लेब्वॉय क्लब की शुरुआत की. कहा जाता है कि हेफनर बर्टन ब्राउन के गैसलाइट क्लब से प्रभावित थे.

सन् 1953 में मैगजीन लॉन्च के 7 साल बाद हेफनर ने प्लेब्वॉय क्लब की शुरुआत की. कहा जाता है कि हेफनर बर्टन ब्राउन के गैसलाइट क्लब से प्रभावित थे.

रंगभेद और नागरिक अधिकार

जब भी कभी फेमिनिस्ट आंदोलन हेफनर की आलोचना करता है, तो अश्वेत महिलाओं का बड़ा तबका उनके समर्थन में आता है. हेफनर ने सिविल राइट्स के लिए 25,000 डॉलर (लगभग 17 लाख रुपए) का एक पुरस्कार शुरू किया, जो सरकारी ज्यादती के पीड़ित या नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाने वालों को मिलता है. उन्होंने रंगभेद के दौर में अपना पहला चीफ इंटेरोगेटर एक अश्वेत को बनाया और उसे हर विषय पर बात करने के अधिकार दिए.

प्लेबॉय ने जब अपना पहला टीवी शो शुरू किया तो उसमें कई अश्वेत जैज संगीतकार, कॉमेडियन शामिल हुए. ये रंगभेद विरोधी आंदोलन से पहले की बात है. अमेरिका के कई राज्यों ने कहा कि अगर टीवी पर अश्वेतों को दिखाया गया तो वो प्रसारण रद्द कर देंगे. हेफनर ने नुकसान के बाद भी अश्वेतों को शामिल रखा. इसी तरह उन्होंने अश्वेत कॉमेडियन लाइव शो के लिए बुलाए, जो सीधे सरकार का मजाक उड़ाते थे. तमाम खतरों के बाद भी ये जारी रहा. उन्होंने 60 के दशक से प्लेमेट (प्लेबॉय पर छपने वाली मुख्य मॉडल) के तौर पर अश्वेत महिलाओं की तस्वीरें छापी. इस कदम की अहमियत जानने के लिए सोचिए कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अभी भी कितनी गहरे रंग की सुपर स्टार हैं.

मार्टिन लूथर किंग के साथ

प्लेबॉय ने सबसे पहले मोहम्मद अली जैसे अश्वेत सितारों के इंटरव्यू छापे. अमेरिका के गांधी कहे जाने वाले मार्टिन लूथर किंग का सबसे लंबा इंटरव्यू प्लेबॉय के साथ है. प्लेबॉय ने अमेरिका के अलग-अलग शहरों में अपने क्लब खोले. कुछ शहरों के क्लबों ने अश्वेत सदस्यों को आने से मना कर दिया. हेफनर ने उनकी फ्रेंचाइज़ी खत्म कर दी. मार्टिन लूथर किंग को आर्थिक और संपादकीय दोनों तरह से सहयोग देने के अलावा प्लेबॉय ने 'रेप किट' विकसित करने में भी पैसे दिए.

रेप किट घरेलू यौन शोषण का शिकार होने वाली महिलाओं को फॉरेंसिक जांच के लिए सबूत जुटाने में सहयोग करती है. श्वेत महिलाएं भले ही हेफनर की कितना भी कोसती हों, रिबेका जैक्सन जैसी कई अश्वेत कलाकार और फेमिनिस्ट खुलकर कहती हैं कि अगर हेफनर ने उनके अधिकारों, उनकी सेक्सुअल्टी को समर्थन न देते तो वो आज भी हाशिए पर ही होतीं.

प्लेबॉय मैगजीन की शुरुआत 60 साल पहले 1953 में हुई थी. ये मैगजीन अपने कॉन्टेंट को लेकर पुरुषों के बीच काफी लोकप्रिय है.

प्लेबॉय मैगजीन की शुरुआत 60 साल पहले 1953 में हुई थी. ये मैगजीन अपने कॉन्टेंट को लेकर पुरुषों के बीच काफी लोकप्रिय है.

मगर वो संत नहीं थे

हेफनर ने गे राइट्स के समर्थन में आवाज उठाई. अश्वेतों के लिए वो सबसे ज्यादा काम करने वालों में से हैं. इसके अलावा उन्होंने नागरिक अधिकारों के लिए लड़ने वालों को काफी पैसा दिया. 60 के दशक में अमेरिकी समाज में सेक्स को लेकर जो नई सोच पनपी उसे एक शक्ल दी. उनके आलोचक कहते हैं कि हेफनर ने ये सारे काम इसलिए किए कि उनकी कड़ी आलोचना न हो सके.

फेमिनिज्म के लिए हेफ एक शातिर दुश्मन हैं. हो सकता है ये बात सच हो लेकिन हेफनर संत नहीं थे. वो एक कारोबारी थे, जिन्होंने हर तरह के पुरुषों के लिए एक साम्राज्य खड़ा किया. जिन्हें स्टाइल, स्टेटस और फैशन चाहिए था, उनके लिए भी उनके पिटारे में कुछ था. जिन्हें खूबसूरत महिलाओं का साथ चाहिए था, वे उन्हें भी खुश करना जानते थे. जो कुंठित थे हेफनर उन्हें भी कुछ न कुछ बेच देते थे. इसीलिए प्लेबॉय इरॉटिका से पॉर्न तक पहुँची.

तमाम अच्छी बुरी बातों के बाद भी ये याद रखना चाहिए एक संपादक, और पत्रकार (आप मानें या न मानें) के तौर पर उन्होंने ऐसे कई लेख, रिपोर्ट और इंटरव्यू छापे, जो सरकार, सत्ता या समाज के बहुमत के खिलाफ थे. जो कारोबारी हितों के विपरीत हाशिए पर खड़े लोगों की बात करते थे. आज प्लेबॉय की शुरू की गई 'देखें हॉट तस्वीरें' वाली परंपरा को लगभग हर कारोबारी समूह अपनाता है, क्योंकि ऐसा करने की कई संस्थागत मजबूरियां होती हैं. लेकिन कितने लोग हैं, जो ह्यू हेफ्नर या प्लेबॉय के दूसरे पहलू से सबक लेंगे. निदा फाजली कह गए हैं कि हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी... इस मिसरे को समय-समय पर दोहराते रहना चाहिए.

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