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गिरिजा देवी ने मुझे उस कहानी की नायिका बना दिया, जो मेरी नहीं थी

क्या आपको ऐसे शख्स की मौत पर, कोई कीमती चीज खो जाने का अहसास होना चाहिए, जिसे आप उसकी कला के अलावा बिल्कुल नहीं जानते थे?

Anuradha SenGupta Updated On: Oct 31, 2017 11:24 AM IST

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गिरिजा देवी ने मुझे उस कहानी की नायिका बना दिया, जो मेरी नहीं थी

क्या आप किसी ऐसे शख्स के बारे में, जिससे आप कभी मिले भी नहीं, यह कह सकते हैं कि उसकी मौत से आप गमजदा हैं? क्या आपको ऐसे शख्स की मौत पर कुछ खो जाने का अहसास होना चाहिए, जिसे आप उसकी कला के अलावा बिल्कुल नहीं जानते थे? 24 अक्टूबर की शाम गिरिजा देवी का देहांत हो गया. उनकी उम्र 88 साल थी.

अभी पिछले ही महीने मैंने उन्हें दिल्ली सरकार की तरफ से आयोजित ठुमरी फेस्टिवल में गाते सुना था. ठुमरी फेस्टिवल का यह समापन कार्यक्रम था. ठुमरी शास्त्रीय संगीत की एक विधा है, जिसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सभी विधाओं की तुलना में सरल माना जाता है. जानकार इसे अर्ध-शास्त्रीय भी कहते हैं.

लाइव सुनने की ख्वाहिश पूरी हुई

फेस्टिवल में एंट्री मुफ्त थी और मैं समय से पहले ही कमानी ऑडिटोरियम पहुंच कर लाइन में लग गई. लाइन व्यवस्थित थी और मारा-मारी नहीं थी. मैं बमुश्किल 15 मिनट में ऑडिटोरियम के भीतर थी. उनसे पहले दो और प्रस्तुतियां थीं, जिसके बाद उनका नंबर आया. उन्हें सहारा देकर मंच पर लाया गया और बैठ जाने के बाद उन्होंने थोड़ी बातचीत की, कुछ चुटकुले सुनाए और इस तरह हमारे साथ एक रिश्ता कायम कर लिया. वह उस्ताद थीं. वह ये बात जानती थीं, हम भी जानते थे.

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हम अंधेरे में अपनी खुशकिस्मती पर संतोष की सांस छोड़ते हुए अधीर बैठे थे. उनका साथ देने के लिए चंद साजिंदे थे, जो कि उनके शिष्य ही थे, लेकिन डेढ़ घंटे की प्रस्तुति में उन्होंने अधिकांश हिस्से में अपना गायन पेश किया. इस उम्र में भी उनकी आवाज उनकी उम्र को झुठला रही थी.

जब वो गा रही थीं, तो मैंने महसूस किया कि उनको सामने बैठकर सुनने की ख्वाहिश जो उस दिन पूरी हो रही थी, एक मुद्दतों से सहेजी ख्वाहिश थी. मौत से पहले पूरा करने के लिए ख्वाहिशों के संदूक में सहेजी एक ख्वाहिश.

उनकी कहानी की नायिका मैं थी

मुझे गिरिजा देवी का एक गाना अपने मां-पिता के पास रखी म्यूजिक टुडे की सीडी में बस यूं ही मिल गया था. ‘रात हम देखली सपनवा ओ रामा पिया घर आए’ 13 मिनट में उन्होंने इस लाइन को एक कहानी में पिरो दिया, जिसे मेरी कल्पनाशक्ति साथ-साथ भरती चल रही थी. उनके संगीत ने मुझे एक कहानी की नायिका बना दिया था, जो कि मेरी नहीं थी.

और फिर मैं उनके गीतों की तलाश में रहने लगी. मैं उन्हें छिपाकर रखती और उन्हें बार-बार सुनना मेरी सबसे बड़ी गोपनीय खुशी थी. गोपनीय इसलिए क्योंकि हर गाना, वो चाहे कजरी हो या चैती या टप्पा (और मैं अब भी दावा नहीं कर सकती कि मैं इनमें फर्क कर पाती हूं) बेहद दिलफरेब होता था, मेरी नसों में दौड़ जाता और इनके माध्यम से मैं बिना शर्म या झिझक के अपने दिल की बात कह सकती थी. उनके गाने, और वह चाहे जिस भी जोनर का प्रतिनिधित्व करते हों, ऐलान करते थे कि दिल की ईमानदारी और साफगोई पर गर्व करना चाहिए.

मेरी भावनाओं को मिली गिरिजा देवी की आवाज

लबरेज आरजुएं, बेलगाम ख्वाहिशें इतनी धारदार कि कई बार दर्द देने लगें, कभी मजा देने वालीं, कभी खिलवाड़ करतीं, जितनी तकलीफ देने वालीं उतनी ही मजा देने वालीं, उनका गायन मुझे हमेशा अहसास से भर देता था और यह बताता था कि हम क्या और कैसे महसूस करते हैं, यह एक बहुत कीमती आजादी है.

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खासकर औरतों के लिए जिन्हें बहुत कम उम्र में ही अपने जज्बात को छिपाना सिखा दिया जाता है. खासकर मेरे लिए जिसका मानना था कि ज्यादा ख्वाहिशें कमजोरी हैं और आपको असुरक्षित बना देती हैं. उनका संगीत मुझे मेरे जज्बातों के करीब लाया और मेरा दिमाग सोचने लगा कि दिल से सोचना अपने आपको बंधनों से आजाद करना है. कई बार मुझे लगता था कि वो मेरे लिए ही गा रही हैं.

और कई बार मुझे महसूस होता कि वह मेरी तरफ से गा रही हैं और वो बातें कह रही हैं, जिन्हें कहने में मुझे बहुत झिझक होती.

और फिर ऐसी चीजें भी थीं, जिन पर मेरा मन करता था कि मैं नाचने लगूं.

पिछले महीने लाइव परफॉर्मेंस में उन्होंने कहा था, 'ठुमरी को लोगों ने बहुत छोटी-सी चीज मान लिया था; छोटी मतलब यह, बस गाने बजाने वाले गाते बजाते नाचते, कूदते बस यही है. लेकिन ठुमरी इतनी बड़ी चीज है पूरी शक्ति से अपनी भावनाओं से; क्या रस है उसमें, क्या शब्दों का मतलब उन शब्दों को संगीत में डालकर प्रस्तुत किया जाता है, क्योंकि तान और लय, सरगम और रंग, यह तो हम ध्रुपद, धमाल, तराने, ताल, टप्पे, सब चीज में गाते हैं, लेकिन ठुमरी ही ऐसी चीज है कि श्रृंगार रस क्या है; बिरह क्या है; भक्ति क्या है और उत्साह देने की चीज है.'

बाद में जब मैं ऑडिटोरियम के बाहर कैब का इंतजार कर रही थी, एक कार बगल से गुजरी, जिसमें वो बैठी थीं. पलभर को हमारी आंखें मिलीं, मैंने फौरन एक छोटी सी बच्ची, एक फैन, की तरह उनकी तरफ हाथ हिलाया. उन्होंने भी जवाब में हाथ हिलाया.

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तो क्या आप कह सकते हैं कि आप उस शख्स की मौत पर गमजदा हैं, जिससे आप कभी नहीं मिले? क्या आपको ऐसे शख्स की मौत पर, कोई कीमती चीज खो जाने का अहसास होना चाहिए, जिसे आप उसके द्वारा सृजित कला के अलावा बिल्कुल नहीं जानते थे? गिरिजा देवी के संगीत ने मुझे इतना सिखाया है कि मैं बिना झिझक साफगोई से कह सकती हूं- हां, मैं गमजदा हूं. आप मेरे साथ अपनी संवेदनाएं साझा कर सकते हैं.

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