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डलमऊ: जहां होली खुशी का त्योहार नहीं मातम का मौका है

500 सालों से डलमऊ वाले होली आते ही मातम मनाने लगते हैं

Updated On: Mar 02, 2018 09:08 AM IST

Sanjeev Kumar Singh Chauhan Sanjeev Kumar Singh Chauhan

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डलमऊ: जहां होली खुशी का त्योहार नहीं मातम का मौका है

जग-जाहिर है कि हिंदुस्तान और बाकी दुनिया भर में होली रंग-गुलाल, हर्षोल्लास-भाईचारे का त्योहार है...लेकिन अगर कोई आपसे कहे कि यह त्योहार 'मातम' का है. तो आपको कदापि विश्वास नहीं होगा. आप न कुछ करिए. न बहुत ज्यादा दिमाग पर जोर देकर सोचिए. सच यही है. वो कड़वा सच जिसे, निभाते-ढोते हुए 500 साल में न मालूम कितनी पीढ़ियां-जमाने बदल गए. हम बात कर रहे हैं पूर्वी उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे स्थित खूबसूरत एतिहासिक नगर पंचायत डलमऊ की 'गमी' के होली पर्व के अतीत और वर्तमान की.

हजारों मील की रियासत 80 गांव में सिमट गई

पूर्वी उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित डलमऊ नगर पंचायत है. डलमऊ वासियों के मुताबिक उत्तर प्रदेश सूबे की जो दो पहली नगर पंचायतें बनी थीं, उनमें से एक आगरा की नगर पंचायत और दूसरी डलमऊ नगर पंचायत थी. एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त डलमऊ नगर पंचायत में 80 गांव आते हैं. साथ ही डलमऊ ग्राम सभा भी है. यहां के स्थानीय निवासियों का मुख्य व्यवसाय कृषि है. डलमऊ, राजा डलदेव की कभी सबसे बड़ी रियासत हुआ करती थी. इतिहासकारों के मुताबिक 1402 ईस्वी से लेकर 1421 ईस्वी तक यहां राजा डलदेव (डलदेव) ने अपनी सत्ता कायम रखी.

कमजोरियां, जिनकी जद में आकर राजा बचा और न रियासत

इस बात की चर्चा आज भी होती है कि अपने समय में डलमऊ के राजा डलदेव सा दिलेर राजा और डलमऊ से मजबूत-खूबसूरत और बड़ी रियासत दूसरी न थी. रियासत के ही दो गद्दारों की गद्दारी और राजा की कुछ कमजोरियों के चलते वक्त ने जब पलटा मारा तो राजा बचा न रियासत. परिणाम सामने है...500 साल पहले हजारों मील में फैली रियासत 80 गांव की नगर पंचायत तक सिकुड़कर रह गई है.

सलमा की चितवन, जिसने डस ली जिंदगी और जागीरदारी

dalmau sad holi (1)

डलमऊ निवासियों और दस्तावेजों में दर्ज इतिहास के मुताबिक राजा डलदेव बहादुर थे. बड़ी रियासत को और बढ़ाना उनका बाएं हाथ का खेल था. आलम यह था कि कि राजा डल से भयभीत या उनकी बहादुरी की कायल तमाम छोटी रियासतें तो खुद ही डलमऊ के साथ आकर मिल गयीं थीं. यह अलग बात है कि वक्त ने जब करवट ली तो, उसी बहादुर पराक्रमी शूरवंशी राजा डल के ऊपर बाबर सैय्यद (कई जगह उल्लेख मिलता है कि बाबर सैय्यद, बाबा हाजी सैय्यद के नाम से भी मशहूर था. वह जौनपुर के बादशाह इब्राहिम शाह शर्की का मुलाजिम था) की बेटी सलमा की एक अदद चितवन भारी साबित हुई.

किवदंतियों के मुताबिक, एक बार प्रतापगढ़ इलाके में शिकार पर निकली सलमा और राजा डलदेव की आंखें मिलीं. राजा डल ने सलमा को डलमऊ ले जाना चाहा. मौके पर बात नहीं बनी तो, सलमा को पाने की चाहत पाले राजा डल ने उसके पिता बाबर सैय्यद के पास अपने सेनापति से पैगाम भिजवा दिया. सलमा और बाबर सैय्यद को राजा का वो पैगाम इस कदर नागवार गुजरा कि उसी पैगाम के चलते राजा डलदेव और उनकी नाक यानि उस जमाने की सबसे बड़ी रियासत डलमऊ आज खंडहर में तब्दील हुई खड़ी है, राजा डल की बहादुरी से लेकर रियासत की बर्बादी तक के सिसकते किस्से-कहानियां और इतिहास को टूटी मजबूत दीवारों की बाहों में समेटे हुए, बेटी सलमा और पिता बाबर सैय्यद की बदले की जानलेवा जिद और दुश्मनी.

फोटो रोहित मिश्रा

फोटो रोहित मिश्रा

राजा डल की एक अदद उस चाहत भरी नजर के बदले हासिल हुई तबाही की दिल दहला देने वाली चीत्कारें आज भी खंडहर बन चुके डलमऊ किले में सुनाई पड़ती हैं... अक्सर सूनसान रातों को... डलमऊ रियासत के खंडहरों में तब्दील हो चुके किलों की चार-दिवारी के भीतर और बाहर.

दो गद्दार, जो भारी पड़े बहादुर राजा और मजबूत रियासत पर

यह अलग बात है कि राजा और डलमऊ की राजशाही दोनो की तबाही की वजह अगर राजा की कुछ कमजोरियां बनी तो, उस जमाने में इस बर्बादी में आग में घी का काम किया रियासत के ही दो गद्दारों जुम्मन और जुनैदा ने. कहते हैं कि यह दोनो शरीर से नपुंसक थे. राजा डल की गुस्ताखी की सजा देने के लिए डलमऊ रियासत के इन दोनों बाशिंदों को सलमा और उसके पिता बाबर सैय्यद ने ‘खरीद’ लिया. दोनो गद्दारों को जिम्मेदारी दी गई कि वे सलमा को उस सही वक्त की खबर करेंगे जब, डलमऊ रियासत पर हमला बोला जाए...ऐसा हमला जिसमें राजा डल की मौत और रियासत की तबाही 100 फीसदी तय हो.

तबाही के लिए तय हुआ होली का दिन

फोटो रोहित मिश्रा

फोटो रोहित मिश्रा

डलमऊ निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग जनक दुलारी के मुताबिक, ‘सलमा का पिता बाबर सैय्यद पराक्रमी राजा डलदेव का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा सका. खरीदे गए दोनो गद्दारों जुम्मन और जुनैदा ने सलमा और उसके पिता को राजा डल और उनकी रियासत को घेरने का सही वक्त बता दिया. खास होली के दिन जब राजा डल रियासत के बाशिंदों के साथ शराब-शबाब में धुत्त होकर होली के रंग-ओ-गुलाल की मौज-मस्ती में सराबोर हों तब.’ यानि आज से पांच सौ साल बाद डलमऊ में होली वाले दिन ‘मातम’ मनाया जाएगा, यह पांच साल पहले ही डलदेव के इन दो गद्दारों ने इतिहास के काले पन्नों में दर्ज करवा दिया था. क्योंकि उनके बताए दिन तिथि और समय पर ही राजा डल की होली के त्योहार वाले दिन ही धोखे से नृशंस हत्या कर दी गई थी.

जिद्दी सलमा, डरपोक बाबर सैय्यद और पराक्रमी राजा डलचंद

सलमा और बाबर सैय्यद को डलमऊ रियासत के गद्दारों ने जब राजा डलचंद और उनकी रियासत पर हमले का वक्त दिन बता दिया, तो भी उनकी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि सलमा और बाबर अकेले ही जाकर राजा डल और डलमऊ पर हमला कर सकें. बाप-बेटी जौनपुर के बादशाह इब्राहिम शाहशर्की के पास पहुंचे. पहले से ही राजा डल से बदला लेने के इंतजार में बैठे क्रूर और मौकापरस्त शाहशर्की ने सलमा के साथ खास होली वाले दिन डलमऊ रियासत को घेरकर उस पर हमला बोल दिया. शराब के नशे में बेसुध राजा डलदेव अचानक हुए हमले से निपटने को कतई तैयार नहीं थे. फिर भी उस बहादुर पराक्रमी अंतिम शूरवंशी ने चंद सैनिकों के साथ किले से बाहर निकल दुश्मन से मोर्चा लेना शुरु कर दिया. टेढ़ी चितवन वाली खतरनाक सलमा से दिल्लगी की तमन्ना और उसके बाद नशे की हालत में निहत्थे ही किले के बाहर निकल आना राजा डलदेव (डलचंद) की दर्दनाक असमय मौत और डलमऊ रियासत की तबाही की वजह साबित हुई.

बिना गर्दन का राजा डलदेव का धड़ कत्लेआम मचाता रहा

फोटो रोहित मिश्रा

फोटो रोहित मिश्रा

इतिहास में दर्ज दस्तावेज गवाह हैं इस बात के कि नशे की हालत में भी राजा डल ने सलमा और शाहशर्की की जान के लाले डाल दिए. रणनीति के तहत शाहशर्की निहत्थे राजा डल को युद्द के लिए उकसाता हुआ किले के बाहर निकाल ले गया. आमने-सामने आते ही शाह और सलमा की सेना ने राजा डल की गर्दन काट दी. लोक कथाएं हैं कि गर्दन कटने के बाद भी पराक्रमी राजा डलदेव का बिना सिर का रक्त रंजित धड़ काफी देर तक दुश्मनों के दांत खट्टे किए रहा. किवदंतियों के अनुसार बाद में युद्ध मैदान से मौका पाकर, क्रूर सलमा राजा डल का कटा हुआ सिर उठाकर भाग गई.

राजा डलदेव की दर्दनाक मौत और डलमऊ की ‘मातमी’ होली

कहते हैं कि 500 साल पहले जिस दिन धोखे से होली त्योहार पर सलमा और शाहशर्की ने राजा डल की हत्या की थी, उसी दिन से डलमऊ की होली ‘मातमी’ हो गई. यही प्रमुख वजह है जिसके चलते डलमऊ और उसके आसपास के 80 गांवों में आज भी होली (बड़ी होली जिस दिन रंग खेला जाता है पूरे देश में) वाले दिन ‘मातम’ मनाया जाता है. डलमऊ निवासी और पेशे से पुरोहिती करने वाले 45 वर्षीय पंडित पुकुन पंडा के मुताबिक, इतनी पुरानी पंरपरा को हम आज भी निभाने में डलमऊवासी निरंतर जुटे हैं. हम चाहते हैं कि अपने इतने बहादुर राजा की याद में कम-से-कम एक त्योहार तो उसकी यादगार के रुप में किसी न किसी तरह मनाकर याद रख सकें. कहा जाता है कि जिस स्थान पर (सूरजपुर) राजा डलदेव का धड़ गिरा, उस स्थान पर राजा डलदेव की खंडित मूर्ति वाला मंदिर बना है. हर चौमास (जुलाई) माह में बुधवार के दिन इस मंदिर पर आज भी मेला लगता है.

एक परंपरा सौ मुंह और हजार बातें

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कहते है कि जब पूरे देश में होली का रंग खेला जाता है. घरों में पकवान बनते हैं. होली मिलन होता है. उस दिन डलमऊ नगर पंचायत के करीब 80 गांवों में ‘मातम’ मनता है. न रंग-गुलाल. न ही गोली मिलन. हर घर, कोने गली-मुहल्ले में सिर्फ ग़म ही ग़म...अपने राजा डलचंद की याद में. डलमऊ निवासी 44 वर्षीय पेशे से किसान विनोद निषाद के मुताबिक, जिस दिन पूरा देश होली मनता है, हम लोग उसके ठीक तीन दिन बाद होली मनाते हैं. अगर इन तीन दिन बाद भी अगर मंगल, वृहस्पतिवार या शनिवार आता है, तो इन तीनो ही दिन में होली न मनाकर उसके बाद आने वाले शुभ दिन (बुधवार, शुक्रवार, रविवार या सोमवार) में होली त्योहार मनाते हैं. विनोद के मुताबिक डलमऊ में बाहर से आकर बसे कुछ परिवार, खास होली वाले दिन एक ही रोज का शोक रखकर अगले दिन ही होली त्योहार मना लेते हैं.

झूठ है होली के दिन महिलाओं का विधवा रुप रखने की बात

गाहे-ब-गाहे मीडिया रिपोर्टस में छपने वाली डलमऊ से संबंधित ऊट-पटांग परंपराओं संबंधी खबरों से डलमऊवासी खासे खिन्न नजर आते हैं. 40 साल की उषा देवी के मुताबिक, ए कोरी अफवाह है कि राजा डल की याद में मनाई जाने वाली गमी (मातमी) की होली वाले दिन हमारे यहां महिलाएं श्रंगार (बिछुआ, चूड़ी, महावर, मेंहदी, मांग का सिंदूर) उतार कर विधवा रुप धारण करती हैं. उषा के मुताबिक, यह सब मनगढ़ंत और मीडिया वालों की रची-गढ़ीं वे कहानियाँ हैं, जिनसे डलमऊ की पुरानी परंपराओं पर कहीं न कहीं दुनिया जहां में विपरीत असर पड़ता है.

पुरानी परंपरा जो नई पीढ़ी को लगने लगी बोझ!

बुजुर्ग जहां इस परंपरा को आज भी बदस्तूर नियमित रखने में ही समाज की भलाई समझते हैं, वहीं नई पीढ़ी को कभी-कभार यह अजीब-ओ-गरीब परंपरा अखरने लगती है. कक्षा 12 की इस वर्ष बोर्ड परीक्षा दे रहे किशोर अभय निषाद के मुताबिक सदियों से चली आ रही परंपराओं को निभाने में कोई ऐतराज नहीं है. मगर उसी हद तलक जहां तक वे नई युवा और शिक्षित पीढ़ी के ऊपर बोझ न बनने लगें. बताया जाता है कि इस परंपरा को लेकर अतीत में अक्सर टकराव के हालात भी बनते रहे हैं. नौबत जब खून-खराबे की आई तो रंग में भंग होने से बचाने के लिए कई बार पुलिस भी बुलानी पड़ी.

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