S M L

लजीज सी-फूड खाने से पहले जान लें, कहीं आपकी सेहत को नुकसान न हो!

कुछ रोज पहले मैंने फ़र्स्टपोस्ट के इसी कॉलम के लिए लिखा था कि चिकेन फीड(मुर्गे-मुर्गियों को खिलाया जाने वाला चुग्गा) में जान-बूझकर आर्सेनिक मिलाया जा रहा है

Updated On: Nov 28, 2018 10:28 AM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

0
लजीज सी-फूड खाने से पहले जान लें, कहीं आपकी सेहत को नुकसान न हो!

कुछ रोज पहले मैंने फ़र्स्टपोस्ट के इसी कॉलम के लिए लिखा था कि चिकेन फीड (मुर्गे-मुर्गियों को खिलाया जाने वाला चुग्गा) में जान-बूझकर आर्सेनिक मिलाया जा रहा है, जिक्र किया था कि इससे मानव-शरीर को नुकसान पहुंच रहा है. आर्सेनिक का एक स्रोत और भी है. यह जान-बूझकर नहीं मिलाया जाता लेकिन यह सी-फूड (समुद्री आहार) और शेलफिश में भारी मात्रा में पाया जाता है.

आर्सेनिक एक स्वादहीन, गंधहीन तत्व है. इसका इस्तेमाल लकड़ियों के बचाव में होता है और उर्वरक तथा पशु-आहार में भी. इसके औद्योगिक एवं कृषिगत उपयोग भी हैं. सीसा, पारा तथा ऐसे ही अन्य भारी धातुओं की तरह आर्सेनिक भी फसलों में इस्तेमाल होकर मिट्टी में बरसों तक पड़ा रह सकता है. आर्सेनिक दो रूपों में पाया जाता है. एक रूप कार्बनिक है और यह कम हानिकारक माना जाता है. आर्सेनिक का दूसरा रूप अकार्बनिक है और इसे बहुत ज्यादा नुकसानदेह माना जाता है.

रोजमर्रा के भोजन में पाए जाने वाले आर्सेनिक के मुख्य यौगिक हैं मोनोमिथाइलआर्सोनिक एसिड (MMAsV), डाइमिथाइलआर्सोनिक एसिड (DMAsV), आर्सेनोबेटाइन, आर्सेनोकोलाइन, आर्सेनोशुगर तथा आर्सेनोलिपिड्स.

सी-फूड तथा सी-फूड प्रोडक्ट्स में आर्सेनिक के यौगिक उच्च मात्रा में मौजूद होते हैं. यह मुख्य रूप से आर्सेनोबेटाइन के रूप में होता है. DMAsV या फिर MMAsV कई किस्म के फिन फिश, केकड़े तथा घोंघे में मौजूद हो सकता है. आर्सेनोकोलाइन मुख्य रूप से झींगा मछली में पाया जाता है. रासायनिक बनावट के एतबार से यह आर्सेनोबेटाइन की तरह होता है.

हाल में पता चला है कि आर्सेनोशुगर तथा आर्सेनोलिपिड्स समुद्री घोंघे में मौजूद होता है. अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति सी-फूड से बना भोजन खा रहा है तो उसके शरीर में आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित सीमा से बढ़ सकती है. अमेरिका में फिलहाल आर्सेनिक के लिए निर्धारित मात्रा 35 माइक्रोग्राम/प्रतिलीटर (मूत्र में) है.

ये भी पढ़ें: ईश्वर को पाने की सही राह है मांसाहार छोड़कर शाकाहार अपनाना

भारत में अभी कोई मात्रा निर्धारित नहीं की गई है लेकिन हमारे समुद्री जीवों में इतना आर्सेनिक मौजूद है कि उन्हें आहार बनाना सेहत के लिहाज से सुरक्षित नहीं. यों आर्सेनिक सारे सी-फूड में मौजूद होता है लेकिन घोंघा, शंख, सीप, शंबुक, केकड़ा और झींगा आदि कवचदार जीवों में इसकी मौजूदगी ज्यादा मात्रा में होती है. ठंढे पानी और जलागार की तली में रहने वाले फिनफिश, सेवार तथा हिजिकी में भी इसकी खास मात्रा ज्यादा होती है. हिजिकी का चीन और जापान में भोजन में खूब इस्तेमाल होता है.

आर्सेनोबेटाइन को विषैला नहीं माना जाता क्योंकि यह कार्बनिक होता है. लेकिन यही बात तो रोक्जरसोन में पाए जाने वाले आर्सेनिक के बारे में भी कही जा सकती है. पाठकों को याद होगा कि रोक्जरसोन का इस्तेमाल चिकन को तेजी से बढ़ाने (मोटा बनाने) के लिए होता है. रोक्जरसोन के कारण चिकन की रंगत कुछ खास लाल नजर आती है. साल 2011 में यह बात साबित हो गई कि रोक्जरसोन घातक है क्योंकि यह चिकेन के शरीर में कार्बनिक से अकार्बनिक (जो कि विषैला होता है) रूप में परिवर्तित हो जाता है और जब चिकेन को पकाया जाता है तो यह और भी ज्यादा जहरीला हो जाता है.

सी-फूड से हासिल किया जाने वाला कैल्शियम तथा ऐसे अन्य पूरक आहारों में भी उच्च मात्रा में आर्सेनिक मौजूद हो सकता है.

हमारी चिन्ता के केंद्र में ज्यादातर यह बात रही है कि दूषित पेयजल तथा कार्यस्थल के वातावरण में पाए जाने वाले हानिकारक तत्वों के कारण व्यक्ति लगातार आर्सेनिक की चपेट में आ सकता है; लेकिन भोजन के जरिए भी हमारे शरीर में आर्सेनिक का प्रवेश होता है और यह घातक रूप ले सकता है, इस तरफ हमारा ध्यान कम ही गया है. अमेरिका में उपलब्ध आहार में मौजूद आर्सेनिक की कुल मात्रा का 90 फीसद सिर्फ सी-फूड की देन है. इस तथ्य पर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया है.

जेली फिश

जेली फिश

मान लिया जाता है कि आर्सेनिक की बस कुछ ही मात्रा अकार्बनिक रूप में होती है और आर्सेनिक ज्यादातर तो जटिल यौगिकों के रूप में मिलता है और ये यौगिक हानिकारक नहीं होते. बहरहाल, सी-फूड को लेकर हुए हाल के अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि आर्सेनिक चूहों में कैंसरकारक रूप ले सकता है. बोरक तथा हॉसगुड ने अपने शोध-अध्ययन में विश्लेषण के जरिए जानना चाहा कि सी-फूड में पाए जाने वाले आर्सेनिक से जोखिम है या नहीं और निष्कर्ष के रूप में बताया कि सी-फूड में मौजूद आर्सेनिक से सेहत को निश्चित ही जोखिम हो सकता है.

एक अध्ययन 2013 में आस्ट्रिया के ग्रेज यूनिवर्सिटी में हुआ. यह अध्ययन एनालिटिकल केमिस्ट्स के दल ने किया था. इससे पता चला कि सी-फूड में पाए जाने वाले आर्सेनिक के कुछ रूप यों तो नुकसानदेह नहीं माने जाते लेकिन असल में वे सेहत के लिए घातक हो सकते हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक एक परेशान करने वाला तथ्य यह भी है कि कुछ लोगों में आर्सेनिक यों तो शरीर से निकल जाता है लेकिन कुछ लोगों के शरीर में वह बहुत दिनों तक ठहरा रह सकता है.

फ्रांसेस्कोनी और उनके सहकर्मियों ने अपनी युनिवर्सिटी में कार्बनक रूप वाला आर्सेनिक तैयार किया और उसे छह स्वयंसेवकों को खिलाया गया. शोधकर्ता (रिसर्चर्स) दरअसल पचास लोगों पर अपना प्रयोग करना चाहते थे लेकिन चिकित्सा जगत से जुड़े नैतिक मानदंडों के पालन के कारण उन्हें अपना अध्ययन में सीमित स्तर पर ही करना पड़ा. स्वयंसेवकों को कार्बनिक आर्सेनिक खिलाने के चार दिन बाद उनके खून तथा पेशाब की जांच की गई.

जांच से पता चला कि छह में चार स्वयंसेवकों में खाए हुए आर्सेनिक का 85 से 95 प्रतिशत हिस्सा मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकल गया. ज्यादातर में आर्सेनिक पहले ही दिन शरीर से बाहर निकल आया था. शेष दो स्वयंसेवकों में से एक के शरीर से खाए हुए आर्सेनिक का 15 फीसद हिस्सा बाहर निकला जबकि दूसरे स्वयंसेवक के शरीर से मात्र 4 फीसद हिस्सा ही बाहर आया.

ये भी पढ़ें: चिकन-मटन के जरिए आपके शरीर में पहुंच रहा है हानिकारक आर्सेनिक

सवाल यह है कि जो आर्सेनिक शरीर से बाहर नहीं निकला उसका क्या हुआ ? जाहिर है, यह शरीर में ठहरा रह गया और यह कोई अच्छी खबर नहीं. अगर छह में से 2 लोगों के शरीर में आर्सेनिक ठहरा रह जाता है तो प्रतिशत के पैमाने पर इसे बहुत ऊंचा माना जाएगा.

शोध-अध्ययन के निष्कर्षों से ये भी पता चलता है कि पाचन-क्रिया के दौरान सिंथेटिक आर्सेनिक ने टूटकर विषैला रूप ले लिया. इस निष्कर्ष से सी-फूड में मौजूद आर्सेनिक को लेकर नए सिरे से चिन्ता पैदा हुई हैं.

आर्सेनिक की मात्रा बहुत उच्च स्तर पर पहुंच जाए तो जानलेवा हो सकती है. आर्सेनिक शरीर में कम मात्रा में हो तो मिचली और उल्टी आ सकती है. शरीर में उजले और लाल रक्तकणों की मात्रा घट सकती है. इससे हृदय गति अनियमित हो सकती है, रक्तवाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है तथा हाथ और पैर में सूई चुभने जैसा एहसास हो सकता है.

अगर आर्सेनिक की कम मात्रा किसी व्यक्ति में लंबे समय तक मौजूद रहे तो उसे क्या परेशानी पेश आएगी? बाल्टीमोर के जॉन्स हॉपकिन्स व्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ का कहना है कि आर्सेनिक का रिश्ता त्वचा, मूत्राशय तथा फेफड़े के कैंसर से है. शरीर में आर्सेनिक कम मात्रा में लंबे अरसे तक मौजूद रहे तो हृदय रोग हो सकता है, फेफड़े को नुकसान पहुंच सकता है और सांस की तकलीफ हो सकती है.

fish

शरीर अगर ज्यादा वक्त तक आर्सेनिक के संपर्क में रहता है तो हाथ-पैर तथा गर्दन की त्वचा पर मस्सों की शक्ल में उभार पैदा होता है. नाखूनों पर उजली धारियां नजर आती हैं तथा बांह और छाती के ऊपरी हिस्से पर झाइयां (पिग्मेंटेशन) बन जाती हैं. बाल झड़ने लगते हैं और नेत्र-शोथ (आंख आना, कंजेक्टिवाइटिस) हो सकता है.

बच्चों और गर्भवती महिलाओं को जोखिम कहीं ज्यादा है. डिवीजन ऑफ नेशनल टॉक्सिलॉजी प्रोग्राम के माइकल वाकिज का कहना है, 'आर्सेनिक से होने वाले कुछ अतिरिक्त असर के बारे में जानकारी जैसे-जैसे बढ़ रही है, मेरी चिन्ता भी बढ़ती जा रही है. बचपन के शुरुआती चरण में या फिर जन्म से पहले भ्रूण की अवस्था में आर्सेनिक की चपेट में आने पर जो असर पड़ता है उससे होने वाले नुकसान दशकों बाद सामने आते हैं.'

वाकिज 2012 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के लेखकों में हैं. इस रिपोर्ट की तैयारी में खर्च हुई राशि में कुछ अंशदान नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने किया था. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने ही अपने शोध-अध्ययन में यह निष्कर्ष दिया आर्सेनिक की चपेट में ज्यादा दिनों तक रहने पर कई किस्म के कैंसर तथा अन्य रोग हो सकते हैं.

आर्सेनिक थॉयराइड ग्रंथि के कामकाज पर असर डालता है. इस वजह से थॉयराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन(टीएसएच) का ज्यादा मात्रा में स्राव होता है. यह हार्मोन पीयूष ग्रंथि(पिट्यूटेरी ग्लैंड) से निकलता है. इस हार्मोन के कारण ही थॉयरायड खून में मिले आयोडिन को ग्रहण करता है. ऐसा होने पर शरीर के लिए जरुरी एन्जाइम बनते हैं.

कई अध्ययनों में सामने आया है कि आर्सेनिक का ज्यादा मात्रा में सेवन किया जाय तो इससे थॉयरायड ग्रंथि के काम में बाधा आती है. हाल के एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सी-फूड में मौजूद आर्सेनिक के असर को समझने पर ध्यान केंद्रित किया. यह अध्ययन जर्नल ऑफ ट्रेस एलीमेंट्स इन मेडिसीन एंड बॉयलॉजी में छपा है.

ये भी पढ़ें: जेलीफिश की संख्या बनी दुनिया के लिए मुश्किल का सबब, हम क्या करेंगे?

बीस से चालीस साल के कुल 38 स्वस्थ पुरुषों का चयन हुआ और उन्हें 14 दिनों तक लगातार 150 ग्राम सैल्मन, कॉड तथा सीपी सरीखे समुद्री-आहार खाने को दिये गए. ऐसा ही एक दूसरा समूह बना जिसे 150 ग्राम आलू खाना था. आहार संबंधी इस प्रयोग के पहले और तुरंत बाद दोनों समूह के सदस्यों के खून के नमूने लिये गए ताकि आर्सेनिक, आयोडिन तथा सेलेनियम की मौजूदगी जांची जा सके. ये सभी रासायनिक तत्व थॉयराइड ग्रंथि की सक्रियता का पता देते हैं. खून की जांच में उन एन्जाइम्स की भी मौजूदगी और मात्रा जांची गई जिससे पता चलता है कि थॉयराइड ग्रंथि किस हद तक सक्रिय है.

चौदह दिनों तक लगातार सी-फूड खाने के बाद पहले समूह में शामिल व्यक्तियों के शरीर में आर्सेनिक की मात्रा 20 से 60 फीसद तक बढ़ गई थी. खून के प्लाज्मा में मौजूद आर्सेनिक के कारण टीएसएच का स्तर बढ़ गया था और थायराइड ग्रंथि भी सक्रियता में इजाफा हुआ था.

आर्सेनिक सिर्फ शक्तिशाली कैंसरकारक ही नहीं बल्कि यह बच्चों को कई अन्य किस्म की बीमारियां दे सकता है. द एन्वायर्नमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी का मानना है कि आर्सेनिक शरीर में चाहे जिस मात्रा में मौजूद हो, इसे सुरक्षित नहीं माना जा सकता. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे स्वास्थ्य को खतरा पहुंचाने वाली दस बड़ी वजहों में शुमार किया है.

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने आर्सेनिक को उन 100 चीजों में शामिल किया है जिन्हें ग्रुप-1 श्रेणी का कैंसरकारक माना जाता है. सी-फूड में दो तरह के कार्बनिक आर्सेनिक डीएमए तथा एमएमए पाये जाते हैं. इन्हें भी इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने संभावित कैंसरकारकों में एक माना है.

लोरेंजेना, येइलो, कॉलमैन तथा चौधरी का एक शोध-अध्ययन इस बात पर केंद्रित है कि सी-फूड में किस सीमा तक आर्सेनिक पाया जाता है. इस अध्ययन का निष्कर्ष है: '... विश्व स्तर पर संबंधित साहित्य के अध्ययन से पता चलता है फिनफिश में कार्बनिक आर्सेनिक 7.3 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होता और शेलफिल में यह 25 प्रतिशत तक पहुंच सकता है बशर्ते शेलफिश संदूषित पानी वाले इलाके में ना हो. लेकिन संदूषित पानी वाले क्षेत्र के समुद्री जीवों तथा सेवार आदि में आर्सेनिक की मात्रा इससे भी ज्यादा हो सकती है. ताजे पानी के फिनफिश में अकार्बनिक आर्सेनिक की मात्रा 10 फीसद तक होती है लेकिन यह बढ़कर 30 फीसद तक पहुंच सकती है.'

river fish

आप मछली, शेलफिश तथा सी-वीड खाते हैं-तो क्या आपको इस बात से चिन्ता करनी चाहिए? हां, आपको जरुर ही चिन्ता करनी चाहिए. लेकिन भारत में ना तो सरकार ही चिन्ता करती है और ना ही जनता को ही यह चिन्ता सताती है. सभी मछलियों में फार्मेलिन का इस्तेमाल होता है लेकिन फार्मेलिन की जांच की तरकीब तैयार करने में ही हमें तीस साल लग गए. हम जो खाते हैं वो खाते रहे और जीवन गंवाते रहे. जिंदगी इसी ढर्रे पर चलती रही!

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi