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पशु-हिंसा: हमें 'नेचुरल सोर्स' के नाम पर बरगलाया जा रहा है

अगर आप शिकायत करते हैं और जोर देते हैं कि किसी उत्पाद का ऐसा विकल्प पेश किया जाय जिसमें जंतुओं का इस्तेमाल नहीं हुआ तो आपके इस कदम से लाखों जानवरों की जिंदगी बचाई जा सकती है

Updated On: Dec 12, 2017 04:53 PM IST

Maneka Gandhi Maneka Gandhi

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पशु-हिंसा: हमें 'नेचुरल सोर्स' के नाम पर बरगलाया जा रहा है
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शाकाहार का मतलब मात्र इतने भर तक सीमित नहीं कि आप जानवर का मांस नहीं खाते. इसमें दूध को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि दूध और कुछ नहीं जंतु का तरल मांस ही है. लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि उद्योग जगत आपको किसी न किसी रूप में जानवर के अंग या ग्रंथि(ग्लैंड) के तौर पर क्या कुछ खाने के लिए परोस रहा है?

अलग-अलग उद्योगों जानवर के दिमाग, रीढ़ की हड्ड़ी, पैंक्रियाज(अग्नाशय), उदर(स्टॉमक), जिगर(लीवर), फेफड़े, गुर्दे, गर्भाशय, एंडोक्राइन ग्लैंड(अंतःस्रावी ग्रंथि), पीयूष ग्रंथि(पिट्यूटरी) थॉयरॉयड, पैराथॉरॉयड तथा एड्रिनल ग्लैंड का इस्तेमाल होता है.

ग्रंथियों(ग्लैंड्स) को निकालकर उन्हें जमा लिया जाता है. ग्रंथियों पर लगे ऊपरी वसा और योजक-कोशिकाएं(कनेक्टिव टिश्यूज) हटा दिए जाते हैं. फिर ग्लैंडस् को एक मोमिया पन्ने पर −18 °सेंटीग्रेड तापमान में रखा जाता है. ग्लैडस् जब दवा बनाने वाले कारखाने में पहुंचते हैं तो उन्हें कई टुकड़ों में काटकर अलग-अलग घोल में डाला जाता है ताकि उनका सत्व निकाला जा सके या फिर टुकड़ों में कटे हुए ग्लैंडस् को वैक्यूम ड्रायर में रखकर सुखाया जाता है. सूखने के बाद इन टुकड़ों को महीन पाउडर में बदल दिया जाता है. इससे कैप्सूल बनाए जाते हैं या फिर उन्हें तरल रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

जंतु का दिमाग और रीढ़ की हड्डी कोलेस्ट्रोल का स्रोत है. यही वह कच्ची सामग्री है जिसके जरिए विटामिन डी कोलेकैलसिफेरोल बनाया जाता है. विटामिन डी का इस्तेमाल डेयरी उत्पाद, जूस तथा अनाज से बनी चीजों में होता है और ऐसी चीजों पर एक लकब जड़ दिया जाता है कि उनमें विटामिन डी की शक्ति है.

कोलेस्ट्रोल एक मोमिया वसानुमा चीज है. इसका इस्तेमाल आंख और चेहरे के मेकअप के सामान, शेविंग के प्रसाधन तथा शैंपू तैयार करने में होता है.

पित्त(बाइल) की प्राप्ति का स्रोत जंतु का पित्ताशय(गॉल ब्लैडर) है. इसका इस्तेमाल अपच, कब्ज और पित्त की नली की बीमारियों के उपचार में होता है. इसे जिगर(लीवर) की काम करने की ताकत बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. गाय-बैल या सूअर जैसे जानवरों के पित्त का सत्व(एक्स्ट्रैक्ट) सूखे या तरल रूप में बिकता है. पित्त के कुछ तत्व जैसे प्रेडनिसोन और कॉर्टिसोन को अलग-अलग निकाला जाता है और उनका व्यवहार दवा के रूप में होता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (रायटर इमेज)

पशुओं में उनका जिगर(लीवर) सबसे बड़ा ग्लैंड होता है. गाय-बैल जैसे प्रौढ़ पशु के जिगर का वजन लगभग 5 किलो होता है जबकि प्रौढ़ सूअर के जिगर का आकार 1.4 किलोग्राम. जिगर के सत्व को तैयार करने के लिए उसके कच्चे रूप में अम्लीय(एसिडीफाइड) गर्म पानी मिलाया जाता है. इस मिश्रण को निर्वात(वैक्यूम) में कम तापमान पर गाढ़ा करके पेस्ट बना लिया जाता है. दवा-उद्योग इस पेस्ट का इस्तेमाल विटामिन बी12 के स्रोत के रूप में करता है.

पूरक पोषक आहार (न्यूट्रिशनल सप्लीमेंटस्) के तौर पर बी 12 का इस्तेमाल एनीमिया(खून में लौहतत्व की कमी) के उपचार में होता है. हार्पिन का इस्तेमाल मनुष्यों में खून को पतला बनाने के लिए होता है. इसे पशुओं के जिगर, फेफड़े तथा छोटी आंत की ऊपरी परत के उपयोग से बनाया जाता है.

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प्रोजेस्ट्रोन और ओयेस्ट्रोन नाम के हार्मोन सूअर के गर्भाशय से निकाले जाते हैं. इनका इस्तेमाल महिलाओं में प्रजनन संबंधी समस्याओं को दूर करने तथा चेहरे की झुर्रियां दूर करने वाले क्रीम में होता है.

रिलेक्सिन नाम का हार्मोन गर्भवती मादा सूअर के गर्भाशय से निकाला जाता है. इसका इस्तेमाल मनुष्यों में प्रसव के वक्त होता है.

सूअर और गाय के पैंक्रियाज(अग्नाशय) का इस्तेमाल इंसुलिन बनाने में होता है. इंसुलिन शरीर में शुगर के मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित करता है और इसके जरिए मधुमेह की बीमारी में रोकथाम की जाती है. अगर आप मधुमेह के रोगी(डायबेटिक) हैं और इंसुलिन ले रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप गाय या सूअर से निकाले हुए सत्व के सहारे सेहत संभाल रहे हैं (इंसुलिन का ऐसा इस्तेमाल 1921 से जारी है). सिर्फ आठ औंस शुद्ध इंसुलिन निकालने के लिए सूअर के दो टन से ज्यादा अंगों की जरूरत होती है.

ग्लूकेजेन पैंक्रियाज की कोशिकाओं से निकाला जाता है. इसके इस्तेमाल बढ़े हुए ब्लड शुगर, इंसुलिन के ओवरडोज से पैदा हुए असर या फिर शराबखोरी के कारण हुए लो ब्लड शुगर के उपचार में होता है. काइमोट्रिप्सिन और ट्रिप्सिन नाम के एंजाइम पशुओं या फिर मछलियों की पैंक्रियाज से निकाले जाते हैं. इनका इस्तेमाल सर्जरी अथवा चोट से लगे घावों को ठीक करने में होता है. ट्रिप्सिन का इस्तेमाल खून के थक्कों को घुलाने में होता है . ट्रिप्सिन सामान्य सर्दी खांसी के उपचार में भी इस्तेमाल होता है और इसे बेकरी के उद्योग में गूंथे हुए आटे को बेहतर बनाने के लिए भी इसका उपयोग करते हैं. सॉस, चीज, बीयर तथा नॉन-एलर्जिक बेबी फूड बनाने और उसमें स्वाद बढ़ाने के लिए भी ट्रिप्सिन का उपयोग होता है.

एड्रिनेलिन या इपिनेफ्राइन सूअर, गाय-बैल या भेड़ के एड्रिनल ग्लैंड से निकाला जा है. इंजेक्शन के तौर पर इसके इस्तेमाल से मांसपेशियों में रक्त का प्रवाह, हृदय के काम करने की गति, आंख की पुतलियों का फैलना-सिकुड़ा और ब्लड शुगर बढ़ाया जाता है.

आर्केडॉनिक एसिड एक वसीय अम्ल(फैटी एसिड) है. इसे पशुओं के लीवर से निकाला जाता है. यह बॉडी-बिल्डिंग के पूरक आहार के तौर पर बिकता है. एक्जिमा और चकतों को ठीक करने वाले लोशन तथा स्किन क्रीम में भी इसका उपयोग होता है.

इलास्टिन और कोलेजेन एक किस्म का प्रोटीन है जिसे गाय-बैल या सूअर की गर्दन के तंतुओं और रक्तवाही नलिकाओं से निकाला जाता है. इसे स्किन एंटी एजर्स कहलाने वाले उत्पाद के तौर पर बेचा जाता है( जो कि बाजार में प्रचलित बहुत सारे झूठे वादों में से एक है.)

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प्रतीकात्मक तस्वीर ( रायटर इमेज)

लाइपेज और रेनेट नाम के दो एंजाइम बछड़े और मेमनों (भेड़ का बच्चा) के पेट तथा जीभ से निकाले जाते हैं. इनका इस्तेमाल चीज बनाने में होता है. अपच दूर करने और खून के थक्के बनने में मददगार दवाइयों में भी इसका इस्तेमाल होता है. पेप्सिन सूअर के पेट से निकाला जाता है. इसका भी वही उपयोग है जो रेनेट का.

पाल्मिटिक एसिड और ओलेइक एसिड भी फैटी एसिड हैं. इन्हें जंतु-वसा या फिर वनस्पति वसा से हासिल किया जाता है. ओलेइक एसिड अमूमन टैलो से निकाला जाता है जो कि एक जंतु वसा है(इसका इस्तेमाल मोमबत्ती बनाने में भी होता है). आपको यह वसा कैंडी, आईसक्रीम, शरबत, चटनी, साबुन, शैंपू, वेव साल्यूशन, क्रीम, नेलपॉलिस, लिपिस्टिक तथा स्किन क्रीम में भी पाएंगे.

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ओलेइल अल्कोहल ओसेनॉल के नाम से बिकता है. यह एक वसा है जो फिश-ऑयल में मिलता है. ओलेइल अल्कोहल का इस्तेमाल डिटर्जेंट के रुप में होता है. कपड़े के रेशों को मुलायम बनाने तथा दवा ले जाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चीजों में भी इसका उपयोग होता है.

पैंथोनॉल को प्रो विटामिन बी-5 भी कहते हैं. यह सामान्य तौर पर स्किन केयर प्रोडक्ट में मॉश्चराइजिंग एजेंट के रुप में इस्तेमाल होता है. कॉस्मेटिक्स, हेयर स्प्रे, शैंपू, कंडीशनर, नजल स्प्रे, आई ड्राप्स तथा कांटेक्स लेंस के क्लीनिंग सॉल्यूशन(साफ करने वाला घोल) में भी यह इस्तेमाल में आता है. टैटू गुदवाने के बाद टैटू आर्टिस्ट इसका इस्तेमाल माश्चराइजिंग क्रीम के रूप में करने की सलाह देते हैं. पैथोनॉल जंतुओं के जिगर और गर्दे, लॉबस्टर, फिश शेलफिश तथा मुर्ग से निकाला जाता है. इसे वनस्पति, मशरुम और दाल से भी हासिल किया जा सकता है. अगर प्रॉडक्ट पर विशेष रूप से यह ना लिखा हो कि उसे गैर-जंतु स्रोत से प्राप्त चीजों को मिलाकर बनाया गया है तो समझिए निश्चित ही उसमें जंतु स्रोत का इस्तेमाल हुआ है.

स्क्वालीन एक किस्म का चिपचिपा तेल होता है. इसे शार्क मछली के जिगर से निकाला जाता है. सौदर्य-प्रसाधनों का उद्योग जगत स्क्वालीन को खूब पसंद करता है क्योंकि स्क्वालिन चमड़ी में आसानी से जज्ब हो जाता है और चिपचिपाहट भी नहीं रहती. इस कारण ढेर सारे मॉश्चराइजर्स, सनस्क्रीन, तेल, हेयर डाई में इसका इस्तेमाल होता है. शार्क के लीवर ऑयल से प्रिस्टेन नाम की एक चीज और निकाली जाती है. प्रिस्टेन शब्द लैटिन के प्रिस्टिस से बना है जिसका अर्थ होता है शार्क. प्रिस्टेन का इस्तेलाम लुब्रिकेंट, स्किन तथा हेयर कंडीशनर तथा कॉस्मेटिक्स में एंटी-कोरोसिव एजेंट के तौर पर होता है.

एमिनो एसिड की कड़ियों को पॉलिपेप्टाइड कहते हैं. एमिनो एसिड प्रोटीन निर्माण की बुनियादी चीज है. व्यावसायिक तौर पर इनका उत्पादन जंतु-प्रोटीन से होता है और हेयर कंडिशनिंग के काम में इसका उपयोग होता है.

पॉलिजोरबेट एक सुनहले रंग का लसलसा द्रव(लिक्विड) होता है. इसे डिहायड्रेटेड एल्कोहल और ओइलिक एसिड से बनाया जाता है जो कि फैटी एसिड के रूप में गाय, सूअर या भेड़ से निकाला जाता है. इसे पेड़-पौधों से भी हासिल किया जा सकता है. लेकिन फिर ऐसी बात प्रॉडक्ट पर लिखी होनी चाहिए. पॉलिजोरबेट 60 और 80 का व्यवहार खाद्य-पदार्थों के उत्पादन में होता है. इस एडिटिव के इस्तेमाल से खाद्य-पदार्थ को ज्यादा दिनों तक बचाया जा सकता है और उसके रंग तथा आकार को भी बेहतर बनाया जा सकता है. फ्रोजेन डेजर्ट(मिठाई), बेकरी के उत्पाद तथा इमिटेशन कॉफी क्रीमर में पॉलिजोरबेट का इस्तेमाल धड़ल्ले से होता है. कास्सेटिक्स में जरुरी तेलों को पानी में घुलनशील बनाने के लिए भी इसका इस्तेमाल होता है.

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स्टेरिक एसिड अगर जंतुओं से निकाला गया हो तो समझिए उसमें स्रोत के रूप में गाय, सूअर और भेड़ का इस्तेमाल हुआ है. विदेशों में इसके लिए बधिया बनाकर रखे गए कुत्ते-बिल्ली का भी इस्तेमाल किया जाता है. स्टेरिक एसिड का उपयोग कॉस्मेटिक्स, साबुन, लुब्रिकेंट्स, कैंडल, हेयरस्प्रे, कंडीशनर, डियोड्रन्ट, क्रीम, च्यूइंग गम में होता है और खाद्य-पदार्थों में स्वाद पैदा करने के लिए भी.

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प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर इमेज)

किन्ही अंगों या ग्लैडस् के लिए सिर्फ सूअर, गाय या भेड़ को ही नहीं मारा जाता. एक नर हिरण मस्क डियर(कस्तूरी मृग) कहलाता है. कस्तूरी नाम के सुगंधित द्रव इसी मृग की ग्रंथियों से निकलता है. इस मृग के शिश्न के पास एक गेंदनुमा रोयेंदार थैली होती है. इसी थैली(एक ग्लैंड) में कस्तूरी का द्रव एकत्र होता है. इसे हासिल करने के लिए कस्तूरी मृग को मार दिया जाता है.

ग्लैंड को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं और टुकड़ों को उच्च शक्ति के एल्कोहल में डालकर छोड़ दिया जाता है ताकि वह पूरी तरह से तैयार हो जाय. कस्तूरी का इस्तेमाल इत्र-सुंगध के उद्योग में अब भी जारी है. इत्र-सुंगध के उद्योग(परफ्यूम इंडस्ट्री) में कैसटोरियम का भी इस्तेमाल होता है. ऊदबिलाव(बीवर) के पेल्विस और पूंछ के ऊपरले हिस्से में पाई जाने वाली एक ग्रंथि से इसे हासिल किया जाता है. इसके लिए ऊदबिलाव को मारना होता है.

'प्राकृतिक स्रोत' जैसा शब्द बहुत भ्रामक है. अगर कोई खाद्य-पदार्थ शाकाहार के तौर पर पेश किया गया है तो साफ-साफ लिखा रहता है कि उसे वनस्पतिक स्रोतों से तैयार किया गया है. लेकिन सेहत और भोजन से संबंधित उद्योगों, खासकर कॉस्मेटिक्स के मामले में अक्सर प्राकृतिक स्रोत का मतलब होता है कि कोई उत्पाद जंतुओं के वसा, प्रोटीन, ग्लैंड, तेल या फिर अंग के इस्तेमाल से बनाया गया है.

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यही वजह है जो कंपनियां अपने उत्पाद के ऊपर सूचना बड़ी छोटी-छोटी लिखाई में दर्ज करती हैं लेकिन ऐसा हो, तब भी आपको पढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. अगर आप शिकायत करते हैं और जोर देते हैं कि किसी उत्पाद का ऐसा विकल्प पेश किया जाय जिसमें जंतुओं का इस्तेमाल नहीं हुआ तो आपके इस कदम से लाखों जानवरों की जिंदगी बचाई जा सकती है.

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