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हसीनाबाद: बेवफाई, अत्याचार और अय्याशी के किस्से

आप अपनी बेवफाई को कुछ भी नाम दे सकते हैं, परम्परा, विरासत, संस्कृति का अभिन्न अंग या प्राचीनकाल की रवायतें

Updated On: Jan 23, 2018 03:25 PM IST

FP Staff

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हसीनाबाद: बेवफाई, अत्याचार और अय्याशी के किस्से

हिंदी साहित्य की दुनिया में गीताश्री चिर-परिचित नाम हैं. उनकी किताब हसीनाबाद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है. हम वाणी प्रकाशन के सहयोग से उसका ये अंश आपको पढ़वा रहे हैं. 

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गोलमी को हुसैनाबाद का मौसम पसन्द आ रहा था. दिन में हल्की गर्मी और शाम को पहाड़ियों और जंगलों से छन-छनकर आती ठण्डी हवाएं. उसे असोई गांव की लम्बी-चौड़ी नदी याद आने लगी जिसके किनारे नदी की देह को छूकर ऐसी ही ठण्डी हवाएं चला करती थीं. कमी थी तो पहाड़ियों की. उसे हाजीपुर का कोन्हारा घाट याद आया, जहां चबूतरे पर बैठकर शामें पुरसुकून गुज़रा करती थीं. जंगल देखकर गांव की घनी गाछियां याद आयीं, जिसकी डालियों पर झूले डालकर सावन के गीत गाये जाते थे. उसे हुसैनाबाद का भौगोलिक परिवेश बहुत पसन्द आ रहा था. मनोरम दृश्यों वाली रमणीक बस्ती में कैसा खेल चलता रहा था सदियों से. शायद इसके पीछे भौगोलिक परिवेश का भी हाथ रहा हो कि पहाड़ियों और जंगलों ने इसे बाहरी दुनिया से काटकर रखा हो.

इलाके की खूबसूरती कितनी देर बांधती गोलमी को. वह तो हसीनाबाद उर्फ हुसैनाबाद के किस्से सुन-सुनकर बौखला रही थी.

ओह, यह भी एक दुनिया थी? ठाकुरों के अत्याचार के किस्से सुने थे, मगर चतुर्भुज स्थान के अलावा दौ सौ किलोमीटर दूर अय्याशी का एक ऐसा ठिकाना भी होगा, ये नहीं पता था. समय अपने पन्ने पलट रहा था और गोलमी हैरान होती जा रही थी. अतीत और वर्तमान दोनों साफ़-साफ़ दिखायी दे रहे थे. उसे वहां के लोकल कार्यकर्ता बता रहे थे कि पहले ठाकुरों के ऐसे बच्चों के जीवनयापन के लिए उत्तरदायित्व उनके परिवार वाले ले लेते थे पर धीरे धीरे सबने पल्ला झाड़ दिया. यहां के लोगों की दुर्गति शुरू हो गयी थी.

ज़मींदारी गयी तो अय्याशी भी ख़त्म होने के कगार पर आ गयी. कुछ ठाकुरो ने परम्परा समझकर सँभाला, तो कुछ ने ज़मीनें बेचकर अय्याशियाँ की. उनकी अय्याशियों से पैदा हुए कुछ बच्चे वहीं रहकर गुण्डों में बदल गये, तो कुछ दूसरे शहरों में पहुँचकर खप गये. ज़माना बदला, टीवी आये तो जागरूकता बढ़ी, राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ा और यहां के लोग बतौर मतदाता शामिल किये गये तो सारा बाज़ार बदल गया. कालान्तर में बस्ती का नाम भी बदल दिया गया.

हसीनाबाद यानी हुसैनाबाद में उस शाम काफ़ी चहल-पहल थी. मन्त्री जी के काफिले को सुनकर लोग बहुत ही उत्साहित हुए थे.

वहां कुछ-बची खुची औरतें जिनमें कुछ भीख मांगने के लिए मजबूर थीं तो कुछ देह बेचकर काम चला रही थीं, उनके चेहरों पर उम्मीद की महीन रेखाएं उभर आयी थीं.

उस शाम समय एक मुलाकात की प्रतीक्षा कर रहा था. ठाकुर सजावल सिंह के अलावा कोई नहीं आया था उस ठाकुरबाड़ी के नीचे, जिस पर कभी हसीनाबाद की सरहद ख़त्म हुआ करती थी. सुन्दरी ने झुककर प्रणाम भर किया. सुन्दरी का प्रस्थान बिन्दु वहीं था. उसकी मुक्ति का मार्ग वहीं से शुरू हुआ था.

सुन्दरी ने मुंह से पल्लू नहीं हटाया. गोलमी अपनी अम्मा की इस भाव भंगिमा से चकित थी. वह अपनी अम्मा से ठाकुर साहब को मिलवाना चाहती थी. मगर वे तो सहमी, सिकुड़ी सिमटी-सी चली जा रही थीं. भीतर कोई तूफान थमा हो जैसे. अचानक आगे बढ़कर ठाकुर साहब ने सुन्दरी का पल्लू खींच दिया. सुन्दरी भरभराकर उनकी देह पर गिर पड़ी. वह बिलख रही थी...

“तुम बेवफा काहे निकली सुन्दरी. कौन बात का कमी किये थे हम, जीवन भर का ठेका लिए थे हम तुम्हरा...हम फिर दोसर औरत नहीं रखे अपने लिए...”

बेवफा शब्द छन्नाक से गोलमी के सिर पर लगा.

सुन्दरी रोते-रोते चुप हो गयी.

“हम आपके लिए ठेका ही तो थे सरकार, ठेकेदारी हमेशा नहीं चलती है. हम कोई सड़क या मकान नहीं थे कि खाली ईंट, सीमेन्ट से खड़े रहते. हमारे साथ हमारी बेटी भी थी. हम उसको किसी जन्म में सुन्दरी बाई नहीं बनने देते, चाहे जो हो जाए. किसी ठाकुर की दूसरी औरत नहीं बनने देते अपनी बेटी को. आप लोगों को कोई परवाह थी कभी, सारे बच्चे वहीं पैदा होते हैं, वहीं खप जाते हैं. कोई ठाकुर साहब अपनी सन्तान को वारिस नहीं मानता सरकार...रमेस को छोड़कर चले तो आये थे, क्या बना दिया आपने...? देखिए, हमने एक गोलमी को क्या बनाया...कुछ भी हो, आज समाज में उसकी एक जगह तो बनी है. नाचती है, गाती है, मगर इज़्ज़त से. मेरी तरह रखैल...”

सुन्दरी उत्तेजित थी, कभी रोती, कभी बिसुरती, कभी दहाड़ती, कभी शिकायत, सारे मिले, जुले भाव आ जा रहे थे.

“हां, मैं बेवफा हूं! ज़माना चाहे जो समझे! मेरी आत्मा जानती है कि मैं क्या हूं...मैं एक वफादार रखैल बनने के बजाय वफादार प्रेमिका और मां बनना ज़्यादा पसन्द किया और आज उसी रूप में आपके सामने खड़ी हूं...”

वह थोड़ी देर रुकी, फिर बोली-“और हां...आप भी मुझसे इसी रूप में बात करिए तो बड़ी कृपा होगी.”

सुन्दरी के आंसू सूख चुके थे. वह सख़्त स्त्री में बदल चुकी थी जिसके चेहरे पर स्वाभिमान टपक रहा था.

गोलमी के लिए ये सब एकदम नया काण्ड था! उसकी अम्मा और ठाकुर साहब का कनेक्शन चौंका गया उसे. वह अम्मा की तरफ सवालिया निगाह से देख रही थी. सुन्दरी तनकर उसके सामने खड़ी थी. मानो कह रही हो-“पूछ, क्या पूछना है तुझे! ये है मेरा सच. यही थी मेरी परदेदारी. यही छुपाती रही ज़िन्दगी भर तुझसे...”

गोलमी क्या पूछती, उसे अन्दाज़ा तो था ही. दबी ज़ुबान में टोले के कुछ लोग बोल ही देते थे. सौतेले भाइयों और मां से मिलने गयी थी तब भी वहां किसी की फुसफुसाहट सुनायी दी थी. अपनी धुन में मग्न वह किसी बात पर ध्यान ही नहीं देती थी. अम्मा का बात-बात पर चौंकना उसे इशारा तो कर ही गया था.

कभी कल्पना नहीं की थी कि ज़िन्दगी कभी इस तरह सामने अपने सीवन उधेड़कर खड़ी हो जाएगी. जहां उसकी मां की ज़िन्दगी के पन्ने इस तरह खुलेंगे. अतीत के काले साये इस तरह सामने आकर खड़े हो जायेंगे. गोलमी को इन सायों से डर नहीं लगा, न ही उसे घृणा हुई. उसने अम्मा की तरफ देखा.

उसके सामने एक कद्दावर स्त्री खड़ी थी जो किसी भी तरह के साये से मुक्त और अपराधबोध से परे थी. अम्मा को इस तरह देख गोलमी से नहीं रहा गया. वह अम्मा से लिपट गयी.

वह आज अपनी अम्मा से ही नहीं, ऐसी स्त्री से मिल रही थी जिसने उसे बचाने के लिए कई ज़िन्दगियों को खतरे में डाल दिया था. जो उसे अपनी तरह नहीं बनने देना चाहती थी. इसीलिए उसे नाच-गाने से रोकती थी. इसीलिए उसे पढ़़ा-लिखाकर नौकरीशुदा देखने का सपना पाल रही थी.

“अम्मा...”

गोलमी के आंसू झरझर गिरने लगे.

“मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं अम्मा कि मैं इस गली की पैदाइश हूं या मेरी अम्मा क्या थी. तुम पहले भी बता देती तो मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता अम्मा...मेरे लिए तुम मां हो, औरत हो...जिसने महल का जीवन छोड़कर हमेशा अभाव में जीवन जिया...दुख इस बात का है अम्मा कि तुम अपराधबोध या भय से जीवन क्यों जीती रही? तुम इतना अच्छा गाती हो, तुम्हारी कला नष्ट हो गयी? अम्मा...अब तुम गाओ मेरे साथ...मेरी मण्डली के साथ...हम मिलकर तिरहुत प्रमण्डल के लोकगीतों को बचायेंगे...हमें उद्देश्य मिल गया है!!”

सुन्दरी की छाती भीग रही थी. उसे लग रहा था कि सीने पर धरा कोई बड़ा पत्थर खण्ड-खण्ड होकर हवा में विलीन हो गया है.

गोलमी ने खुद को अम्मा से अलग किया. पर्स से रूमाल निकालकर आंसू पोंछे. सुन्दरी भी आंचल से अपने आंसू पोंछ रही थी. वह लगभग सामान्य हो चली थी. अभिशापमुक्त चेहरा बहुत दमकता है. आंखें गीली थीं, उनमें ‘रमेश, रमेश...’ की पुकार गोलमी साफ़ पढ़़ सकती थी.

वह ठाकुर साहब की तरफ मुख़ातिब थी.

“ठाकुर साहब...आपका शुक्रिया, हम आपकी वजह से इस दुनिया में आये. लेकिन हम आज जो कुछ भी हैं, वह अपने पिता सगुन महतो और अम्मा सुन्दरी देवी के कारण हैं. मैं कुछ बातें कहना चाहती हूं, ध्यान से सुन लीजिए. मेरी अम्मा बेवफा नहीं हैं. बेवफा तो वह पितृसत्ता है, सामन्त और ज़मींदार है जिसने अपनी बेवफाई के लिए शहर और मोहल्ले बसाये, बेवफाई के स्मारक बनवाये, उन्हें ऐतिहासिक धरोहर घोषित करवाया. पुरुषों के लिए बेवफाई पराक्रम और मर्दानगी का परिचायक रही है. और स्त्री के लिए-पवित्रता की देवी, वफा की मूर्ति. हमारे लिए जगहंसाई, देश निकाला, मन-निकाला और बेदखली...”

“बेटी...हसीनाबाद हमारी परम्परा का हिस्सा है, विरासत में मिली है हमें...हम तो सिर्फ़ उसका पालन करते रहे...हमारी मर्ज़ी से नहीं बसा था

यह नगर...तुम तो वैशाली में पली-बढ़ी हो, वहां का तो इतिहास रहा है! कुछ उसका अध्ययन भी कर लो...हमारा क्या दोष? दम तोड़ती ज़मींदारी के बीच भी हमें दो-दो परिवारों का बोझ उठाना पड़ता है.”

ठाकुर साहब बोलते-बोलते हांफने लगे थे. आवाज़ बेदम थी. किसी अपराधी की तरह अपने गुनाहों की सफाई दे रहे हों जैसे. जीवन भर केस ही लड़ते रहे, बाप-दादाओं ने कितने केस-मुकदमे भी विरासत में सौंपे थे, जिनकी फाइलें कभी ख़त्म नहीं होती थीं. आज वे अजीब मुकदमे में फँस गये थे जहां उन्हें सज़ा भले न मिले, गुनाह का अहसास चैन नहीं लेने देगा. वे भरसक अपनी बात कहने की कोशिश कर रहे थे.

“ठाकुर साहब...आप अपनी बेवफाई को कुछ भी नाम दे सकते हैं, परम्परा, विरासत, संस्कृति का अभिन्न अंग या प्राचीनकाल की रवायतें...पर सच तो यह है कि आपकी छाया में ही पनपती है बेवफाई. आप लोगों ने अपनी बेवफाई के लिए उन स्त्रियों को चुना जिनका जीवन पुरुष-विहीन था. जब स्त्रियों ने अपने लिए साथी चुना, तो वे बेवफा हो गयीं...कैसा न्याय है पितृसत्ता का...”

“आपको मेरी मां से इस शब्द के लिए माफी मांगनी चाहिए. वे बेवफा नहीं थीं, उन्होंने अपने मन का साथी चुना. ये हक़ है उनका! यह हर स्त्री का हक़ है, जिसे कोई नहीं छीन सकता. जब चाहे, वह अपने मन का साथी चुन सकती है. हालात नहीं बदलेंगे, सोच नहीं बदलेंगे तो हर स्त्री एक दिन बेवफा नज़र आयेगी आपको!”

गोलमी ने दोनों हाथ जोड़ लिए. चेहरा कठोर था, लेकिन आंखों में आंसू लरज रहे थे.

ठाकुर साहब ने गौर से इस बहसबाज़ लड़की को देखा. भागलपुरी प्रिण्टेड सिल्क की साड़ी में वह भव्य लग रही थी. उनकी बेटी थी, उनकी ही हूबहू थी.

वैसे ही जुड़ी हुई भौंहे, गोरा रंग. कहते हैं अगर बेटी की शक्ल बाप से मिलती है, तो वह बहुत भाग्यशाली होती है. गोलमी का भाग्य देख रहे थे.

“तुमने बहुत अच्छी परवरिश दी है.” ठाकुर सजावल सिंह ने भर्राए स्वर में कहा.

सुन्दरी के बोल न फूटे.

उन्होंने गोलमी की तरफ मनुहार भरी आंखों से देखा.

मगर गोलमी की आंखें तो तर्कों के बादल से भरी सावन-भादों बनी हुई थीं. उन्हें रोकना और उनके साथ बात करना सम्भव नहीं रह गया था.

ठाकुर सजावल सिंह उसे गले लगाना चाहते थे. वे जानते थे कि उन्हें ठुकरा दिया जाएगा. वह उसकी आंखों में नफरत और तमाम सवाल नहीं देखना चाहते थे. रमेश के ही सवालों से नहीं उबर पाये थे तो गोलमी के सवाल? नहीं-नहीं! वह बिना कुछ और कहे पलटकर वापस लौट गये. कदम लड़खड़ा रहे थे.

गोलमी को गीत याद आया-

“अँखिया तो नदिया भई, मन भयो बारु रेत...”

उसे लगा, पाँव रेत में धँसते चले जा रहे थे. चलना मुश्किल हो रहा था. वह तेज-तेज चलकर रेत पार करना चाहती थी, मगर पाँव थे कि धँसते चले जा रहे थे. कुछ छूट गया था बहुत पीछे.

उसे किसी की तेज याद आने लगी. कोई था जिसे उसका इन्तज़ार था. उस तक पहुँचना था उसे.

रेत पर छोटी-छोटी इच्छाओं के बहिष्कृत टीले वह देख रही थी. उसे लगा, रेतीली आंधी उठ रही है, कोई पुकार से संचालित है, उसने अपने कान बन्द कर लिए. कान के अन्दर समन्दर की लहरें उठाकरती हैं. बाहर रेत की आंधी और अन्दर समन्दर की लहरें...!

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