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Teachers Day: जिन्हें पढ़कर मैंने खुद को और दूसरों को समझना सीखा

'अज्ञेय' मेरे लिए मेरे वो गुरु बने जिसने हिंदी सिखाई, खुद को समझना सिखाया और साथ ही साथ उनके बाद के भी कई लेखकों को पढ़ने और समझने की समझ बनाई

Updated On: Sep 05, 2017 01:23 PM IST

Nidhi Nidhi

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Teachers Day: जिन्हें पढ़कर मैंने खुद को और दूसरों को समझना सीखा

आपकी जिंदगी का वो हर शख्स, हर जगह, हर शहर, वो हर चीज जिससे आप कुछ सीखते हैं वो आपके लिए आपका टीचर है. जाहिर सी बात है शुरुआत हमेशा घर और मां-पापा से ही होती है.

सबकुछ सामान्य सा चल रहा होता है जिसमें अचानक किसी की कोई बात, कोई किस्सा, कहानी कोई लेखक जो कुछ अलग सिखा जाता है. जो आपको सवाल करना, अपने सपनों के पीछे भागना सिखा जाता है. वो मेरे लिए कुछ लेखक और उनकी किताबें रहीं हैं.

12वीं के एक्जाम के ठीक बाद जब स्कूलिंग खत्म होने और कॉलेज जाने के बीच में होते हैं... खुशी और अपने आगे कौन से विषय का चुनाव करना है, कौन से कॉलेज जाना है जैसी भविष्य की बहुत सारी चिंताएं लिए होते हैं, ठीक उसी वक्त मुझे किसी ने तोहफे में तीन किताबें दी थीं. एक किताब थी मोहन राकेश की ‘आषाढ़ का एक दिन’ दूसरी मैक्सिम गोर्की की ‘माँ’ और तीसरी किताब थी हिंदी का उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’.

वो किताब जो किसी एक की नहीं हम सब की 'जीवनी' है

जब मैंने इन्हें पढ़ना शुरू किया था तो ‘आषाढ़ का एक दिन’ मुझे ठीक-ठीक याद है, एक सांस में पढ़ गई थी.

‘शेखर एक जीवनी’ जैसे ही पढ़ना शुरू किया उसकी भाषा ने इतना डराया कि मैंने उसे छोड़ फिर दूसरी किताब उठा ली. गोर्की की ‘मां’ पढ़ने पर जाने कितने सवाल उठे थे जेहन में? जो व्यवहारिक थे जिन्हें जानना जरूरी था. जिन्हें जानने की आगे भी लगातार कोशिश की मैंने. अभी तक कर रही हूँ. लेकिन फिर जो किताब आती है ‘शेखर एक जीवनी’, मैंने फिर से उठाया था उसे. चूंकि समय था मेरे पास, घर पर खाली बैठी थी तो बस पढ़ लेते हैं सोचकर.

और फिर शुरू हुई वो किताब, हिंदी विषय ही अभी तक मेरे लिए या शायद किसी के लिए भी मजेदार कहानियों, प्यारी-प्यारी कविताएं याद कर लेने जितना ही रोचक विषय रहा होगा. मैंने पहली बार कुछ ऐसा पढ़ना शुरू किया था जिसमें सबसे पहली बात कि हिंदी के वो पुराने उपमान एक-एक पन्ने के साथ टूटते जा रहे थे. पहली बार हिंदी खुशी, दुःख, गरीबी समाज की कहानियों को छोड़ आपका अपना दिमाग समझा रहा था.

खुद के सवालों के जवाब खुद से ढूंढना सिखाया

मैं ठीक-ठीक उसी उम्र थी जिस उम्र में 'शेखर'. शेखर के साथ घट रही कई घटनाएं ठीक मुझतक होकर गुजर रही थी. दिमाग और वाकई झकझोर देने वाली वो किताब मैंने पूरी पढ़ ली. खुद में जिसतरह का बदलाव मैंने महसूस किया था शायद पहले कभी भी नहीं किया.

दिलचस्प बात थी कि इस किताब के लेखक 'अज्ञेय' की यात्रा वृतांत 'ओ यायावर रहेगा याद?' मुझे स्कूल में पढ़ने को मिली थी. तब मैंने सिर्फ किताब के मुश्किल चैप्टर की तरह पढ़ कर खत्म किया था 'अज्ञेय' का पूरा नाम याद करके ही खुश हो गई थी क्योंकि उससे ज्यादा कुछ समझ नहीं आया था. लेकिन अब उन्हें फिर से पढ़ने के बाद मैं वो सब पढ़ जाना चाहती थी जो उन्होंने लिखा. इतनी क्लिष्ट हिंदी लिखने वाले, जिसकी हिंदी में हिंदी साहित्य के तय किए गए उपमान से अलग मनोविज्ञान और दर्शन पढ़ने को मिलता था. जो मेरी तो दूर मैंने देखा कई ऐसे टीचर मिले जिन्हें 'अज्ञेय' समझ ही नहीं आते थे. वहीं वो मेरे लिए मेरी समझ का एकमात्र जरिया बन गए थे. बाद में अपना विषय भी हिंदी साहित्य ही चुना था मैंने.

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'अज्ञेय' मेरे लिए मेरे वो गुरु बने जिसने हिंदी सिखाई, खुद को समझना सिखाया और साथ ही साथ उनके बाद के भी कई लेखकों को पढ़ने और समझने की समझ बनाई. आगे भी हिंदी में 'निर्मल वर्मा' की किताबों में ठीक-ठीक उसी तरह की हिंदी का स्तर दिखा. 'अज्ञेय' ने अपनी एक कविता में लिखा है...

'यह अनुभव अद्वितीय, जो केवल मैंने जिया, सब तुम्हें दिया.' मेरे लिए उनको पढ़ना कुछ ऐसा ही रहा है.

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