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जब अरुणा साईंराम ने अपने पिता से पूछ लिया था- मुझे संगीत क्यों सिखाया?

अब तक उनके करीब 50 रिकॉर्ड्स तैयार हैं. उन्होंने संगीत से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं. वो कोलकाता में संगीत रिसर्च अकादमी से जुड़ी हुई हैं. संगीत नाटक अकादमी की उपाध्यक्ष हैं

Updated On: Oct 30, 2018 08:44 AM IST

Shivendra Kumar Singh Shivendra Kumar Singh

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जब अरुणा साईंराम ने अपने पिता से पूछ लिया था- मुझे संगीत क्यों सिखाया?
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पचास के दशक की बात है. मुंबई में करीब चार साल की एक बच्ची ने सुबह उठकर संगीत के आकार और अपनी ‘स्केल’ का अभ्यास करना शुरू कर दिया था. चार साल की बच्ची से इतनी गंभीर तैयारी की बात सुनना थोड़ा चौंकाता है. लेकिन चूंकि उस बच्ची की मां खुद भी संगीत से जुड़ी थीं, पिता संगीतप्रेमी थे इसलिए उसमें रियाज के वो संस्कार भी बचपन से ही आ गए थे.

संगीत की बुनियादी बातों का अभ्यास करीब एक घंटे चलता था. उसके बाद ही दूध का पहला घूंट मुंह में जाता था. अभ्यास के दौरान पूरे समय मां साथ में होती थीं. 6-7 साल तक उस बच्ची की सुबह ऐसी ही बीती.

रियाज के बाद स्कूल. फिर स्कूल से लौटकर बाकी कामधाम के साथ संगीत की साधना. जब वो बच्ची सिर्फ आठ साल की थी तो उसने बॉम्बे के एक प्रतिष्ठित संगीत समारोह में पहला पुरस्कार जीता. फिर जब वो बच्ची 14 की हुई तो उसने रामनवमी में बाकयदा अपना कार्यक्रम प्रस्तुत किया.

आज वही छोटी सी बच्ची शास्त्रीय संगीत की दुनिया का बहुत बड़ा नाम है. देश विदेश में उनके चाहने वाले, सराहने वाले हैं. उन्हें तमाम बड़े सम्मानों के साथ साथ पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है. आज उन्हीं अरूणा साईंराम का जन्मदिन है.

चार साल की उम्र से संगीत से है नाता

चार साल की उम्र से संगीत से है नाता

कैसे बनीं गायिका:

अरुणा साईंराम का जन्म 30 अक्टूबर 1952 को मुंबई में हुआ था. बचपन में उन्होंने अपनी मां राजलक्ष्मी सेतुरमन से संगीत सीखना शुरू किया. जो खुद भी संगीत सीख चुकी थीं. पिता को संगीत की समझ थी. वो संगीतप्रेमी थे और रेलवे में अधिकारी थे.

उनके यहां उत्तर और दक्षिण भारत के कलाकारों का आना जाना लगा रहता था. ऐसी ही एक बैठक में उनके यहां थंजावुर वृंदा आई हुई थीं. थंजावुर वृंदा कर्नाटक संगीत की बहुत जानी मानी और प्रतिष्ठित कलाकार थीं. उन्होंने दिग्गज वी धनाम्मल से संगीत सीखा था. थंजावुर वृंदा को 1976 में मद्रास के बेहद प्रतिष्ठित सम्मान संगीत कलानिधि से सम्मानित किया गया था.

खैर, थंजावुर वृंदा उस वक्त कुछ दूसरे कलाकारों को सीखाने के लिए आई थीं. अरुणा को तो बस वहां बैठना होता था. लेकिन उनकी किस्मत में एक महान कलाकार से जुड़ना लिखा था. लिहाजा गुरू के तौर पर थंजावुर वृंदा में अरुणा साईंराम को अपनी गुरू मिलीं. परंपरागत तरीके से उनकी संगीत साधना शुरू हो गई.

गुरु के साथ अरूणा

गुरु के साथ अरुणा

बाद के दिनों में उन्होंने और भी कई दिग्गज कलाकारों से कर्नाटक संगीत के अलग अलग पहलुओं को सीखा. इस परिश्रम और लगन के बाद अरुणा साईंराम एक बेहद परिपक्व कलाकार के तौर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहीं. बावजूद इसके अपनी कला को लेकर शुरूआती दिनों में उन्हें एक भय सा रहता था. 70 के दशक में उन्होंने चेन्नई में स्टेज कार्यक्रम शुरू किए. जिसके लिए गुरू थंजावुर वृंदा ने उन्हें अलग से ट्रेनिंग दी थी. अगले कई साल तक मुंबई और चेन्नई आना जाना लगा रहा.

स्टेज का डर उनके अंदर बैठा था:

अरुणा साईंराम ने शुरू शुरू में जब स्टेज कार्यक्रम देने शुरू किए तो वो काफी परेशान रहती थीं. अपने शुरूआती दिनों को याद करके उन्होंने खुद अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि कई बार तो लगता था कि मेरा संगीत छूट जाएगा. ऐसा इसलिए क्योंकि स्टेज परफॉर्मेस देने के लिए जिस तरह की काबिलयत चाहिए वो उन्हें अपने आप में कम दिखती थी. बाकि कलाकारों से तुलना करने पर वो खुद को उनके मुकाबले उन्नीस आंकती थीं. कई बार तो संगीत के लिहाज से जब कुछ उनके मनमाफिक नहीं होता था तो उन्हें अपनी काबिलियत पर शक होने लगता था.

एक बार तो उन्होंने अपने पिता से जाकर पूछ भी लिया था कि उन्हें संगीत में क्यों डाला गया? इस मुश्किल सवाल का जवाब पिता ने बड़े धैर्य से दिया. उन्होंने कहा कि अरुणा जब चाहें तब संगीत छोड़ सकती हैं. ये अलग बात है कि पिता की तरफ से मिली इस आजादी के बाद भी अरुणा संगीत छोड़ नहीं पाईं.

ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त तक संगीत ही उनकी जिंदगी बन चुका था. एक रोज उन्हें अहसास हुआ कि हो सकता है कि वो स्टेज की एक बहुत सफल कलाकार ना बन पाएं, लेकिन वो एक गायक तो बन ही सकती हैं. बस उसी दिन से अपने संगीत को लेकर मन का संशय दूर हो गया. वो चाहत खत्म हो गई कि स्टेज पर बैठते ही सही सुर लगने लगे और श्रोता वाह-वाह करने लगे.

पुरस्कार लेती हुई अरूणा

पुरस्कार लेती हुई अरुणा

जब डर खत्म हुआ तो फिर छा गईं:

अब ये अभिलाषा मन में आई कि स्टेज पर बैठें तो अपने गुरू और उस शक्ति को याद करें जिन्होंने उन्हें गायकी के गुण दिए. उन्हें समझ आ गया कि स्टेज पर जाने के बाद बहुत सारी बातें कलाकार के हाथ से निकल चुकी होती है और ऊपरवाले के हाथ में होती हैं. इसके बाद उन्होंने अपने श्रोताओं को अपनी गायकी के जरिए सिर्फ प्यार और भरोसा दिया और बदले में उन्हें वही प्यार और भरोसा वापस मिला.

अरुणा साईंराम ने देश दुनिया में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के साथ साथ कई और प्रयोग किए. उन्होंने विदेशी कलाकारों के साथ साथ कई भारतीय कलाकारों को मिलाकर प्रोडक्शंस किए हैं. गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तित्व को लेकर भारत की एकता और अखंडता को भी संगीत के जरिए प्रस्तुत किया है.

अब तक उनके करीब 50 रिकॉर्ड्स तैयार हैं. उन्होंने संगीत से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर विस्तृत लेख लिखे हैं. वो कोलकाता में संगीत रिसर्च अकादमी से जुड़ी हुई हैं. संगीत नाटक अकादमी की उपाध्यक्ष हैं. कर्नाटक संगीत की सेवा, उसके प्रचार प्रसार और अपनी सक्रियता के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.

ये अरुणा साईंराम की सहजता ही है कि कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बाद भी वो संगीत साधिका ही बनी रहना चाहती हैं क्योंकि संगीत ही उनकी जिंदगी के मायने हैं. उनका सफर यूं ही चलता रहे.

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