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70 से 90 के दशक में एक्शन सीन की जरूरत हुआ करता था यह एक्टर

गुरबचन सिंह एक ऐसे ही कलाकार हैं. यह लगभग असंभव है कि एक्शन के दृश्यों में गुरबचन सिंह को न देखा गया हो. आज भी सक्रिय गुरबचन 70 से 90 के दशक एक्शन दृश्यों की जरूरत हुआ करते थे

Updated On: May 06, 2018 02:38 PM IST

Satya Vyas

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70 से 90 के दशक में एक्शन सीन की जरूरत हुआ करता था यह एक्टर

ओपरा और पुराने थिएटर के जानकार ‘स्पियर-कैरियर’ शब्द से परिचित होंगे. ‘स्पियर-कैरियर’ का शाब्दिक अर्थ होता है ‘भाला वाहक’, अर्थात वह चरित्र जो मुख्य चरित्र के पीछे ध्वज अथवा भाला लेकर चलता हो.

हिंदी फिल्मों में इसका उपयोग उन चरित्रों के लिए किया जाता है जिनकी भूमिकाएं अत्यंत ही छोटी होती हैं. इन किरदारों के हिस्से दो-एक संवाद ही आते हैं. वह फिल्म के मूल भाव के लिए महत्वपूर्ण किरदार नहीं होते. इन्हीं भूमिकाओं को कोई किरदार यदि प्रभावशाली ढंग से निभा जाता है तो फिर उसे कभी छोटी तो कभी सशक्त भूमिकाओं की कमी नहीं रहती.

गुरबचन सिंह एक ऐसे ही कलाकार हैं. यह लगभग असंभव है कि एक्शन के दृश्यों में गुरबचन सिंह को न देखा गया हो. आज भी सक्रिय गुरबचन 70 से 90 के दशक एक्शन दृश्यों की जरूरत हुआ करते थे.

पहलवानी में जाना और फिर फिल्मों के प्रति गुरबचन का आकर्षण अस्वाभाविक नहीं था. वह उस पंजाब में जन्मे थे जहां दारा सिंह और रंधावा जैसे विश्व प्रसिद्ध पहलवान पैदा हुए थे और सौभाग्य से वह उस गुरदासपुर में जन्में थे जिसने देवानन्द जैसा अदाकार और राज खोसला जैसा फिल्मकार पैदा किया था. फिल्मों का आकर्षण क्योंकर न होता.

सो कोई आश्चर्य नहीं कि अपने तहसीलदार पिता से धर्मेंद्र के नाम की एक सिफारिशी चिट्ठी लेकर गुरबचन सिंह मुंबई आ गए. उस मुंबई में जहां कहा जाता है कि जगह की बहुत कमी है. मगर जगह की कमी तब नहीं खलती जब दिलों में जगह हो और फिर धर्मेंद्र के बारे में तो प्रचलित ही था कि आप यदि पंजाब से आए हैं तो धर्मेंद्र के दरवाजे आपके लिए हमेशा खुले हैं. गुरबचन वहां कुछ दिन रुके और संघर्ष के दिन शुरू हुए.

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धर्मेंद्र के प्रभाव से ही गुरबचन को अपनी पहली फिल्म कच्चे धागे में डकैत का एक छोटी सी भूमिका में दिखे तो दिखे ही नहीं. स्पियर कैरियर तब तक भाला वाहक ही रहा. कई फिल्मों में वह कभी धर्मेंद्र तो कभी मनोज कुमार के बॉडी डबल के रूप में काम करते रहे.

धर्मेंद्र ने ही फिर उन्हें फाइट मास्टर रवि खन्ना से मिलाया. रवि खन्ना गुरबचन के लिए ज्यादा तो कुछ नहीं कर सके मगर हां, उन्होंने गुरबचन को वीरू देवगन से मिलवा दिया. वीरू देवगन फिल्म रोटी कपड़ा और मकान के साथ स्वतंत्र रूप से फाइट डाइरेक्शन संभालने जा रहे थे, उन्हें भी एक सहायक की जरूरत थी. गुरबचन ताकत और मेहनत से तो पीछे हटने वाले थे ही नहीं. सो यह जोड़ी जम गई. गुरबचन वीरू देवगन के साथ सालों सहायक रहे.

गुरबचन बॉडी डबल की भूमिकाओं को संभाल तो बखूबी रहे थे. मगर उनमें पर्दे पर आने की भी चाहत बरकरार थी. उन्होंने यह बात वीरू को बताई. वीरू ने फिर फाइट की छोटी भूमिकाओं में ही गुरबचन को पर्दे के सामने भी किया. गुरबचन फिर भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे थे. भूमिकाएं पलक झपकते खत्म हो जाती थीं. इन्हीं दिनों फिर एक फिल्म आई– इनकार. यह भूमिका भी अनदेखी चली जाती यदि फिल्म का ‘मूंगड़ा’ गीत हिट न हुआ होता. शराब से तर जिम वेस्ट पहने गुरबचन इस गाने में पहली दफा दर्शकों की नजर पर चढ़े. गीत खत्म होते ही अमजद खान से साथ उनका एक्शन दृश्य काफी चर्चित रहा. नायकों के लिए फ्लाइंग किक का अलग ही अंदाज गुरबचन लेकर आए थे.

इनकार के बाद आई नटवर लाल में अमिताभ बच्चन के साथ लंबे एक्शन दृश में भी गुरबचन काफी सराहे गए. उसके बाद तो उन्होंने लगभग हर अभिनेता के बरक्स काम किया. कारण यह भी था कि बहुधा फिल्मों के एक्शन डायरेक्टर वीरु देवगन होते या फिर रवि वर्मा या फिर मोहन बग्गड़. इन तीनों को ही गुरबचन का काम प्रिय था.

गुरबचन को फिल्मोद्योग से कोई मलाल नहीं है. वह कहते हैं उन्हें जरूरत से ज्यादा प्यार मिला. धर्मेंद्र की फिल्मों के अभिन्न अंग गुरबचन हालांकि दिलीप कुमार के लिए क्रांति फिल्म में की गई उनकी बॉडी डबल की भूमिका को सबसे संतोषप्रद मानते हैं. गुरबचन ने बॉक्सर, हफ़्तेबाज़, शोहदे, डकैत और खलनायक के वफादार जैसी भूमिकाएं अदा की. मिस्टर इंडिया के एक आंख वाले कैप्टन जोरो की भूमिका कौन भूल सकता है.

नब्बे के दशक में जब राजश्री मार्का फिल्मों का दौर आया तो एक्शन फिल्मों में कमी आई. इस कमी को पूरा करने के लिए जब धर्मेंद्र जैसे दिग्गज भी कान्ति शाह मार्का फिल्मों की ओर मुड़े तो गुरबचन भी साथ हो लिए. उन्होंने छोटी-बड़ी कुल 250 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में छोटे-बड़े रोल किए. गुरबचन पंजाबी फिल्मों में भी समान रूप से दखल रखते हैं.

लगभग तीन दशक तक फिल्मी नायकों को महानायक दिखाने की कवायद में जिन लोगों का हाथ रहा है उनमें गुरबचन सिंह की भूमिका चाहकर भी कम नहीं की जा सकती. अपनी जान पर खेलकर नायकों के लिए स्टंट कर उन्हें लोकप्रिय कर खुद गुमनामी में जीना इन स्पीयर कैरियरों की नियति है. गुरबचन खुशनसीब हैं कि उनका चेहरा ही उनका नाम है. उनका काम ही उनकी पहचान और इसी कारण तीन दशकों के बाद भी वह आज तक फिल्मों में सक्रिय हैं.

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