Co Sponsor
In association with
In association with
S M L

असली दाऊद से भी ज्यादा खतरनाक था 'गुजरात का दाऊद'

9 नवंबर, 1997 को एक एनकाउंटर में लतीफ़ भागते वक्त मारा गया. जितनी तेजी से गुजरात का दाऊद लतीफ़ अपराध जगत की ऊंचाईयों पर पहुंचा था, उतनी ही तेजी से नीचे भी आया.

Avinash Dwivedi Updated On: Nov 29, 2017 11:33 AM IST

0
असली दाऊद से भी ज्यादा खतरनाक था 'गुजरात का दाऊद'

दुर्भाग्यपूर्ण रूप से आजाद भारत के आखिरी तीन दशकों की सर्दियां बेहद ही खतरनाक रही हैं. इनके दौरान कई दंगे हुए, प्राकृतिक आपदाएं आईं. आतंकवादी हमले हुए. ऐसे में अपराध और त्रासदी का डर अक्सर नए साल की आमद के पहले कुछ सालों से भारतीयों को जकड़ लेता है. इन्हीं दो-तीन महीनों में कई चर्चित हस्तियों का जन्मदिन और बरसी भी देश मनाता है. अच्छी और बुरी घटनाओं से भरे इन महीनों में 29 नवंबर भी विशेष मायने रखता है क्योंकि इसी दिन गुजरात पुलिस ने डॉन अब्दुल लतीफ़ को मार गिराया था.

अब्दुल लतीफ को यूं तो 'गुजरात का दाऊद इब्राहिम' भी कहा जाता था. पर देखें तो वो दाऊद से ज्यादा खतरनाक था. दाऊद ने अक्सर अपने काले कारोबार में मुनाफे के लिहाज से हिंसा और भय का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया है पर लतीफ़ इतना सोचता नहीं था, वह इमोशनल ज़्यादा था. इसी वजह से कहीं ज्यादा खतरनाक भी. यही नहीं उसने दाऊद को मारने के एकाधिक प्रयास भी किए. हालांकि बाद में दाऊद ने बिजनेस के नुकसान के चलते उसे माफ कर हाथ मिला लिया था.

शायद इमोशनल होना ही वह वजह रही कि जब दाऊद, आज भी दुबई और पाकिस्तान के बीच कई काले-सफेद कारोबारों में मुब्तिला है, अब्दुल लतीफ इस दुनिया से ठीक दो दशक पहले ही विदा हो चुका है. हालांकि अब तक लतीफ़ के ऊपर दो फिल्में आ चुकी हैं. 2014 में आई 'लतीफ़: द किंग ऑफ क्राइम' और 2017 में आई 'रईस' पर फिर भी लतीफ़ के बारे में काफी कुछ कहा जाना बाकी है.

लतीफ़ चीज क्या रहा होगा, इसका अंदाजा इसी से लगाइए कि 'रईस' में लतीफ़ का किरदार खुद शाहरूख ने निभाया था. हालांकि फिल्म निर्माताओं ने एक बयान में ये भी कहा था कि फिल्म पूरी तरह से लतीफ़ पर केंद्रित नहीं है, इसमें उसकी जिंदगी के कुछ ही हिस्से लिए गए हैं. वैसे पिछले दिनों एक कार्यक्रम में मुझे दिल्ली के भूतपूर्व कमिश्नर और लंबे वक्त तक सीबीआई से भी जुड़े रहे नीरज कुमार को सुनने का मौका मिला, जो फिल्म निर्माताओं के अधकचरे रिसर्च की आलोचना कर रहे थे.

ये भी पढ़ें: तमिलनाडु आत्महत्या: बच्चों से ज्यादा हमारे टीचर्स को सबक की जरूरत है

नीरज कुमार ने 'डायल डी फॉर डॉन' नाम की एक किताब भी लिखी है. जो उनके सीबीआई से जुड़े ऑपरेशनों की गाथा है. नीरज इस किताब में लतीफ़ को पकड़ने का जिक्र भी करते हैं. इस लेख में पढ़िए कि आज इतिहास में दफन लतीफ़ दरअसल किरदार क्या था और जानिए वह रोमांचक किस्सा जब नीरज कुमार ने लतीफ़ को अचानक से पकड़कर पूरी दुनिया भर में धूम मचा दी थी. ये किस्सा आपको ये तसल्ली भी देगा कि भले ही फिल्मों का प्रसिद्ध डायलॉग हो, 'पुलिस हमेशा घटना के बाद पहुंचती है' पर नीरज कुमार और उनकी टीम ने सही टाइमिंग का जो खेल रचाया था वो आज भी भारतीय अपराध जगत में एक मिसाल बना हुआ है.

LATIF RAEES

पढ़ाई-लिखाई के अभाव में अपराध ही जल्दी पैसे कमाने का जरिया बना

अब्दुल लतीफ 24 अक्टूबर, 1951 को कालूपुर में पैदा हुआ था. कालूपुर अहमदाबाद का एक मुस्लिम बहुल इलाका है. उसका परिवार बहुत गरीब था. बाप अब्दुल वहाब शेख तम्बाकू बेचता था. उसी से सात बच्चों का पेट पलता था. ऐसे में लतीफ स्कूल से आगे पढ़ नहीं पाया. और अपने पिता की उनके कारोबार में मदद करने लगा. उसे रोजाना मेहनताने के दो रुपए मिलते थे. वह बाप से और पैसे मांगता था. जिसके चलते दोनों में रोज झगड़ा होता था. बीस बरस की उम्र में उसकी शादी हो गई. जिससे उसकी जरूरतें और बढ़ गईं. ऐसे में उसने खुद का धंधा करने का सोचा. उसे कोई ढंग का काम नहीं मिला. इसलिए वह अल्लाह रक्खा नाम के एक छोटे क्रिमिनल के साथ हो लिया. अल्लाह रक्खा अवैध शराब का व्यापार करता था. और साथ में जुए का अड्डा भी चलाता था.

एक मामूली जुआरी इलाके का सबसे बड़ा गुंडा बना

इसी बीच उसके टैलेंट को पहचाना मंजूर अली ने. मंजूर अली अल्लाह रक्खा का प्रतिद्वंदी था. पर उसने अच्छा मेहनताना दिया. लतीफ उसके अड्डे का सुपरवाइजर बन गया. दो-तीन साल बाद लतीफ पर पैसा चोरी करने का आरोप लगा. और उसने मंजूर अली का अड्डा छोड़ दिया. वह खुद अब अवैध शराब के धंधे में आ गया. गुजरात में शराब तब भी प्रतिबंधित थी, आज भी है. ऐसे में तमाम तिकड़म भिड़ाकर जो गैंग पड़ोसी राज्यों से शराब को गुजरात लाता था, उसे अच्छा मुनाफा होता था. ऐसे में लतीफ भी ऐसे एक गैंग का सक्रिय सदस्य हो गया. लतीफ के अंदर हमेशा से हिंसा के प्रति रुझान था. जिसका सहारा लेकर वह तेजी से बढ़ा. और जल्द ही खुद एक बड़े गिरोह का मुखिया बन गया. हत्या, फिरौती के लिए अपहरण, धमकाकर वसूली जैसे कई गोरखधंधे करने लगा.

अंडरवर्ल्ड लतीफ के पास खुद चलकर आया

अहमदाबाद में एक रोज उसकी मुलाकात मुंबई के पठान गिरोह के दो लोगों से हुई. जिनके नाम अमीन खान नवाब खान और आलम खान जंगरेज़ खान थे. लतीफ को इनसे पता चला कि पठानों का दाऊद से झगड़ा है. झगड़े की वजह है सोने की एक खेप. जिसके चलते पठानों ने 1981 में दाऊद के बड़े भाई सबीर इब्राहिम को मार दिया था. लतीफ ने दोनों को पनाह दी. और इस तरह वह पठान गिरोह से जुड़ा और अंडरवर्ल्ड का हिस्सा हो गया. पठान गिरोह के मुखिया आलमज़ेब और अमीरज़ादा दो भाई थे. इसके बाद लतीफ भी दाऊद का दुश्मन हो गया था. उसकी और दाऊद की मुठभेड़ के किस्से चर्चित रहे हैं.

एक ऐसी ही घटना उस वक्त की है, जब दाऊद कोफेपोसा (तस्करी-विरोधी कानून) में जेल में था. उसे अहमदाबाद की साबरमती सेंट्रल जेल में रखा गया था. पेशी के लिए उसे बड़ौदा की अदालत ले जाया जाता था. पुलिस वालों ने ले-देकर उसे रास्ते में एक होटल में सुस्ताने और मन बहलाने की छूट दे रखी थी. लतीफ को दाऊद के पेशी पर जाने की खबर मिली. रास्ते में ही पुलिस की गाड़ी रोककर लतीफ के गुर्गों ने फायरिंग शुरू कर दी. उनके जाने के बाद गाड़ी में छिपा दाऊद तो बच गया था. पर उसके दो गुर्गे बुरी तरह घायल हो गए थे. इसके बाद दोनों के बीच खूनी गैंगवार शुरू हो गया. दाऊद पर हमले का बदला उसके शूटर डेविड परदेसी ने लिया. उसने सितंबर, 1983 में मुंबई की एक अदालत के बाहर अमीरज़ादा को मार दिया. कुछ दिन बाद डेविड को भी अहमदाबाद में लतीफ़ के शूटर शरीफ़ खान ने मार दिया.

लतीफ़ ने बचने के लिए पॉलिटिक्स का रास्ता चुनना चाहा

लतीफ़ के धंधे और इस गैंगवार के खून-खराबे के चलते इलाके में उसका आतंक था. साथ ही जरूरतमंदों और गरीबों की मदद करके उसने इलाके में रॉबिनहुड जैसी छवि बना रखी थी. ऐसे में 1987 में जब वह जेल में बंद था, उसने चुनाव लड़ने की ठानी. उसने पांच वार्डों से अहमदाबाद नगरपालिका का चुनाव लड़ा. और पांचों वार्डों से जीत गया. आठवें दशक के आखिरी सालों के आते-आते उसे 'गुजरात का दाऊद इब्राहिम' कहा जाने लगा था. दोनों ओर से खूनी गैंगवार के चलते कारोबार खराब होने से दाऊद को निराशा थी. ऐसे में नवंबर, 1989 में लतीफ़ को दाऊद की ओर से एक पैगाम मिला. दाऊद ने उसे गुर्गों समेत दुबई आने का न्यौता दिया था. यह एक शांति का प्रयास था.

abdul latif

दुबई पहुंचने पर दोनों को कुरान के सामने एक मौलवी ने दोस्ती की कसम दिलाई. दाऊद ने लतीफ़ से अवैध शराब का धंधा बंद कर सोने की तस्करी करने को कहा. लतीफ़ कुख्यात तस्कर 'मामूमिया पंजूमिया' के साथ तस्करी में लग गया. लतीफ़ अब और ज्यादा हिंसक और खतरनाक हो चुका था.

राधिका जिमखाना कांड ने लतीफ़ को बनाया बर्बरता का प्रतीक

इसी बीच शाहजादा नाम के मुंबई के एक गुंडे से लतीफ़ की दुश्मनी हो चुकी थी. एक रोज लतीफ़ को शराब कारोबारी हंसराज त्रिवेदी के बारे में ये पता चला कि उसने शहजादा को अपने यहां पनाह दी है. 3 अगस्त, 1992 को एक खुफिया सूचना के आधार पर लतीफ़ ने बंदूकधारियों का एक दल अहमदाबाद के ओधव इलाके में राधिका जिमखाना भेज दिया. जहां हंसराज अपने आठ दोस्तों के साथ ताश खेल रहा था. लतीफ़ के गुर्गे हंसराज को पहचान नहीं पा रहे थे. यह बात जब उन्होंने लतीफ़ को बताई तो लतीफ़ ने वहां मौजूद सारे लोगों को मारने का आदेश दे दिया. एके- 47 से तड़ातड़ गोलियां चलाकर की गई इन नौ लोगों की बर्बर हत्या ने सारे गुजरात को ही नहीं बल्कि देश को भी हिला दिया.

ये भी पढ़ें: क्या टाइगर मेमन ने समुदाय विशेष का 'हीरो' बनने के चक्कर में अपनी जिंदगी तबाह कर ली?

गोलियां मारने वाले गिरफ्तार हुए. पूछताछ में उन्होंने लतीफ़ का नाम भी ले लिया. लतीफ़ को अब फरार होना पड़ा. लतीफ़ ने बहुत हाथ-पैर मारे और राजनीतिक संरक्षण के प्रयास किए पर कोई फायदा नहीं हुआ. रऊफ वलीउल्लाह नाम के एक भूतपूर्व राज्यसभा सांसद उसके राजनीतिक संरक्षण में सबसे बड़ी बाधा बन रहे थे. ऐसे में लतीफ को दाऊद का साथ मिला. जिसने उसे दुबई बुला लिया. इसके बाद लतीफ़ ने रऊफ वलीउल्लाह को भी दिनदहाड़े मरवा दिया. और इस तरह लतीफ़ से जुड़े किसी केस की जांच पहली बार सीबीआई को सौंपी गई.

मुंबई बम धमाकों में भी लतीफ़ का हाथ था

इसके बाद लतीफ़ कराची में रहने लगा. जहां वो सोने-चांदी के तस्कर तौफ़ीक जल्लियांवाला का मेहमान था. यहीं टाइगर और दाऊद के साथ मिलकर उसने भी मुंबई बम धमाकों की योजना बनाई. 9 जनवरी, 1993 को महाराष्ट्र के दिघी पोर्ट पर पहुंची हथियारों और गोला-बारूद की खेप उठाने और उसे षड्यंत्रकारियों तक उसे पहुंचाने का काम लतीफ़ का ही था. संजय दत्त तक पहुंचे हथियार और गोलाबारूद इसी खेप का हिस्सा थे. नीरज कुमार अपनी किताब 'डायल डी फॉर डॉन' में लिखते हैं कि जब मुंबई में 12 धमाकों की खबर कराची पहुंची तो तीनों ने मिलकर इसका जश्न मनाया था.

'अईसा क्या?' के तकिया-कलाम ने करवा दिया लतीफ़ का अंत

सभी समझते थे कि लतीफ़ अभी भी कराची में है. इसी बीच 22 सितंबर, 1995 को गुजरात एटीएस को अहमदाबाद के दो व्यापारियों ने बताया कि लतीफ़ उन्हें धमका रहा है. एटीएस ने सीबीआई की मदद मांगी. कई दिनों की जांच के बाद पता चला कि लतीफ़ दिल्ली के 'चूड़ीवालान' इलाके के पास से फोन कर रहा है. काफी मेहनत-मशक्कत के बाद एक कॉल रिकार्ड की सुविधा का इंतजाम पुलिस कर सकी. ये वह वक्त था जब भारत में मोबाइल नहीं आए थे. इसके बाद एक रोज चूड़ीवालान के उस फोन बूथ से पुलिस वालों ने उदयपुर में किसी से बात कर रहे एक व्यक्ति को सुना. पुलिस को उसकी आवाज लतीफ़ जैसी लगी. पुलिस को अभी शक हो ही रहा था कि बात कर रहे आदमी ने किसी बात के बीच में कहा, 'अईसा क्या?'

पुलिस को अब किसी सुबूत का इंतजार नहीं था. ये लतीफ़ का ही तकिया कलाम था. वायरलैस पर फोन बूथ के पास खड़े पुलिस वालों को खबर की गई. पुलिस वालों ने दौड़कर उसे पकड़ने की कोशिश की. लतीफ़ ने भिड़ने की कोशिश की पर पुलिस वालों ने उसे जकड़ लिया. नीरज कुमार अपनी किताब में लिखते हैं, लतीफ़ को उस तंग इलाके के बीच से कोई दो फर्लांग तक लोगों के सामने से घसीटते हुए पुलिस के वाहन तक ले जाया गया और फिर वाहन में लादकर दरियागंज के एसीपी के ऑफिस ले जाया गया.

जेल जाने के बाद 29 नवंबर, 1997 को दो साल बाद एक एनकाउंटर में लतीफ़ भागते वक्त मारा गया. तब वह नरोदा रेलवे क्रासिंग के पास पुलिस को धोखा देकर भाग रहा था. जितनी तेजी से गुजरात का दाऊद लतीफ़ अपराध जगत की ऊंचाईयों पर पहुंचा था, उतनी ही तेजी से नीचे भी आया. लतीफ़ केस भारतीय पुलिस की जाबांजी की एक बेहतरीन कहानी है, जो भारतीय पुलिस में फिर से विश्वास तो पैदा करती है. पर भारत जैसे देश को गरीबी और बदहाली में बड़े अरमानों वाले युवाओं के लिए अवसर सृजन के लिए चेतावनी भी देती है ताकि फिर लतीफ़ पैदा न हों.

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
AUTO EXPO 2018: MARUTI SUZUKI की नई SWIFT का इंतजार हुआ खत्म

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi